सुभद्रा
कुमारी चौहान
झाँसी की रानी
सुभद्रा
कुमारी चौहान का जन्म 1904 में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में
हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा प्रयागराज में हुई। अपने समय की प्रसिद्ध रचनाकार होने
के साथ-साथ वह एक स्वतंत्रता सेनानी भी थीं जिसके कारण उन्हें दो बार जेल भी जाना
पड़ा था। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से जनमानस में राष्ट्रीय चेतना जगाई।
उनके
लेखन में देशप्रेम, स्त्री-केंद्रित विषयों और स्वाधीनता
संग्राम के प्रति गहन प्रतिबद्धता दिखाई देती है। उनकी भाषा की सहजता ने उनकी
रचनाओं को व्यापक लोकप्रियता दिलाई। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं- मुकुल, त्रिधारा (कविता संग्रह), बिखरे मोती, उन्मादिनी, सीधे-सादे चित्र (कहानी संग्रह), कदंब का पेड़, सभा का खेल (बाल साहित्य)। सुभद्रा
कुमारी चौहान को उनके कविता संग्रह मुकुल तथा कहानी संग्रह बिखरे मोती के लिए दो
बार 'सेकसरिया पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। सन् 1948 में उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई। भारतीय
डाक विभाग ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।
झाँसी की रानी – कविता का सारांश
“झाँसी
की रानी” प्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित एक वीर-रस प्रधान कविता है।
इस कविता में 1857 के
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के साहस, देशभक्ति और बलिदान का वर्णन किया गया
है।
कविता में बताया गया है कि रानी
लक्ष्मीबाई बचपन से ही निर्भीक, साहसी
और युद्ध-कला में निपुण थीं। विवाह के बाद वे झाँसी की रानी बनीं। अंग्रेजों ने
झाँसी पर अधिकार करने का प्रयास किया,
लेकिन रानी लक्ष्मीबाई ने इसका दृढ़तापूर्वक विरोध किया।
कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य
साहस और देशप्रेम को प्रेरणादायक रूप में प्रस्तुत किया है। कविता की प्रसिद्ध
पंक्ति “खूब
लड़ी मर्दानी, वह
तो झाँसी वाली रानी थी” उनकी वीरता और अमर गाथा को दर्शाती है।
मुख्य संदेश:
- देश के लिए त्याग और बलिदान सबसे बड़ा कर्तव्य है।
- नारी शक्ति किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं है।
- साहस, आत्मविश्वास और देशभक्ति जीवन को महान बनाते हैं।
झाँसी
की रानी
सिंहासन
हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े
भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी
हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर
फ़िरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
भृकुटी तानी थी: गुस्सा किया था / विद्रोह के लिए तैयार हुए थे।
बूढ़े भारत: लंबे समय की गुलामी के कारण कमजोर और निराश हो चुके
देश के लिए।
गुमी हुई: खोई हुई।
फ़िरंगी: विदेशी अंग्रेज शासक।
मन में ठानी थी: पक्का संकल्प लिया था।
सन् सत्तावन: वर्ष 1857
(प्रथम
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का साल)।
बुदेले: बुंदेलखंड
के निवासी।
हरबोलों: बुंदेलखंड
के लोकगायक जो राजाओं के यश की गाथा गाते थे।
मर्दानी: पुरुषों की तरह वीरता से लड़ने वाली।
प्रस्तुत पद्यांश में वीर रस से ओतप्रोत 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई के
साहस का वर्णन किया गया है।
व्याख्या –
जब अंग्रेजों के अत्याचार बहुत
बढ़ गए, तो भारत
के राजाओं के सिंहासन
हिल गए और
उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह
की तैयारी कर ली।
सालों की गुलामी से निराश हो चुके भारत में
फिर से नया जोश और उत्साह जाग उठा।
सभी देशवासियों को अपनी खोई हुई
आजादी की कीमत समझ आ गई
थी और सबने मिलकर अंग्रेजों
को देश से बाहर निकालने का पक्का इरादा
कर
लिया था।
इसी संकल्प के साथ साल 1857 में भारत
की वह पुरानी तलवार (वीरता) फिर से चमक उठी।
बुंदेलखंड के लोकगायकों के मुँह से हमने यह कहानी सुनी है कि झाँसी की रानी
लक्ष्मीबाई पुरुषों की भांति युद्ध के मैदान में वीरता से लड़ी थीं।
भावार्थ-
सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित 'झाँसी की रानी' कविता
की इन पंक्तियों में 1857 की क्रांति के समय पूरे भारत में उपजे
राष्ट्रीय आक्रोश और रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का वर्णन किया गया है। इन पंक्तियों
के माध्यम से कवि ने बताया है कि कैसे लंबे समय से गुलामी का दंश झेल रहे भारत में
एक नई चेतना जागी और सबने मिलकर अंग्रेजो को खदेड़ने का संकल्प लिया, जिसमें
रानी लक्ष्मीबाई की मुख्य भूमिका थी।
कानपूर
के नाना की मुँहबोली बहन 'छबीली' थी,
लक्ष्मीबाई
नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना
के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाजी की गाथाएँ
उसको याद ज़बानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
मुँहबोली:
सगी न होने पर भी बहन के रूप में मानी गई।
छबीली:
सुंदर और चंचल
बरछी: एक धारदार नुकीला हथियार (भाले जैसा)।
ढाल:
तलवार
के वार को रोकने वाला लोहे या चमड़े का रक्षा-कवच।
कृपाण:
छोटी
तलवार।
कटारी: एक छोटा चाकू
प्रस्तुत
पद्यांश उनके निर्भीक व्यक्तित्व को उजागर करता है-
अर्थ- लक्ष्मीबाई
अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थीं। कानपुर के पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्र
नाना साहब (धोंडूपंत) उन्हें अपनी सगी बहन की तरह मानते थे। लक्ष्मीबाई का बचपन का
नाम 'छबीली' था क्योंकि वे बेहद
सुंदर, चंचल और कुशाग्र बुद्धि की थीं। · नका बचपन
आम लड़कियों की तरह घरों में बंद रहकर नहीं बीता। वे नाना साहब के साथ ही
घुड़सवारी, शास्त्र-ज्ञान
और अन्य विद्याएँ सीखती थीं और उन्हीं के साथ खेलती थीं। · जहाँ उस
समय की सामान्य लड़कियाँ गुड़ियों और खिलौनों से खेलती थीं, वहीं लक्ष्मीबाई के खिलौने और सहेलियाँ युद्ध के
हथियार थे। वे बचपन से ही बरछी, ढाल, तलवार और कटार चलाने का अभ्यास करती थीं। उन्हें
मराठा साम्राज्य के गौरव वीर शिवाजी महाराज की बहादुरी और युद्ध कौशल की कहानियाँ
पूरी तरह कंठस्थ (याद) थीं। शिवाजी के आदर्शों ने उनके भीतर बचपन से ही देशभक्ति
का बीजारोपण कर दिया था।
भावार्थ-
कविता
के दूसरे छंद में रानी लक्ष्मीबाई के बचपन और उनकी वीरता का वर्णन है। पंक्तियों
में उनके बचपन का नाम 'छबीली' बताया गया है, जो नाना साहेब के साथ खेलती-पढ़ती थीं
और पारंपरिक हथियारों से लगाव रखती थीं। इस तरह यह कविता बुंदेलखंड के लोकगायकों
के हवाले से उनकी बहादुरी और युद्ध कौशल को रेखांकित करती है, जिसमें शिवाजी की वीरता की कहानियों का
भी उल्लेख है।
लक्ष्मी
थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख
मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली
युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य
घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी
भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
लक्ष्मी – धन और सौभाग्य की देवी
दुर्गा – शक्ति और साहस की देवी
अवतार – रूप या स्वरूप
मराठे – महाराष्ट्र के वीर योद्धा
पुलकित – प्रसन्न और उत्साहित
व्यूह – युद्ध की रणनीति या सेना की विशेष
व्यवस्था
सैन्य – सेना
दुर्ग – किला
खिलवार – खेल या मनोरंजन
आराध्य – पूजनीय
भवानी – देवी दुर्गा का एक रूप
हरबोले – वीरों की गाथाएँ गाने वाले लोकगायक
व्याख्या –
कवयित्री
कहती हैं कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का व्यक्तित्व इतना अलौकिक था कि उन्हें
देखकर यह तय करना मुश्किल था कि वे धन-वैभव की देवी लक्ष्मी हैं या दुष्टों का
संहार करने वाली साक्षात देवी दुर्गा। वे किसी सामान्य स्त्री की तरह नहीं, बल्कि स्वयं 'वीरता' का साक्षात रूप (अवतार) बनकर इस धरती पर आई थीं। जब वे छोटी उम्र में ही
अपनी तलवार घुमाती थीं और तेजी से प्रहार करती थीं, तो उनकी उस अद्भुत
युद्ध-कला को देखकर मराठा साम्राज्य के बड़े-बड़े वीर योद्धा भी गर्व और प्रसन्नता
से भर उठते थे। सामान्य बालिकाएँ जहाँ गुड़िया-गुड्डों और घरेलू
खेलों में व्यस्त रहती थीं, वहीं
लक्ष्मीबाई के खिलौने और खेल बिल्कुल अलग थे। बचपन में उनके पसंदीदा खेल
थे—कृत्रिम (नकली) युद्ध का अभ्यास करना, चक्रव्यूह
जैसी सैन्य रचनाएँ बनाना, जंगलों
में शिकार खेलना, दुश्मन
की सेना को घेरने की रणनीति तैयार करना और मिट्टी या पत्थरों के नकली किलों
(दुर्ग) को ढहाना। जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज और संपूर्ण
महाराष्ट्र के राजवंशों की कुलदेवी माता दुर्गा (भवानी) थीं, ठीक उसी प्रकार रानी लक्ष्मीबाई की भी परम पूजनीय और
आराध्य देवी माता भवानी ही थीं। उनसे ही रानी को शक्ति और राष्ट्र रक्षा की
प्रेरणा मिलती थी। बुंदेलखंड
के लोकगायकों (हरबोलों) के मुख से हमने हमेशा यही गौरवगाथा सुनी है कि महलों की वह
रानी युद्ध के मैदान में पुरुषों के समान अदम्य साहस और पराक्रम के साथ अंग्रेजों
से लोहा लेती हुई वीरगति को प्राप्त हुई थी।
भावार्थ –
कवयित्री कहती हैं कि
रानी लक्ष्मीबाई में देवी लक्ष्मी की कोमलता और देवी दुर्गा की शक्ति का अद्भुत
समन्वय था। वे स्वयं वीरता की साक्षात प्रतिमूर्ति थीं। उनकी तलवार के प्रहारों को
देखकर मराठा योद्धा गर्व और उत्साह से भर उठते थे।अंत में कवयित्री गर्व के साथ
कहती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई ने अद्भुत साहस के साथ युद्ध किया और वे सचमुच झाँसी
की वीर रानी थीं।
काव्य-सौंदर्य: इस अंश में वीर रस की प्रधानता है। उपमा
और अतिशयोक्ति अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है। भाषा सरल, ओजपूर्ण और प्रभावशाली है।
हुई
वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह
हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल
में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट
बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया,
शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
वैभव: धन-दौलत, ऐश्वर्य, या समृद्धि
सुभट: वीर
योद्धा या महान सैनिक
बुंदेलों:
बुंदेलखंड के निवासी
विरुदावलि: यशोगान, कीर्ति-गाथा, या प्रशंसा के गीत
चित्रा: महाभारत की एक साहसी राजकुमारी (अर्जुन की पत्नी)
भवानी: माता पार्वती (भगवान शिव की पत्नी)
हरबोलों: बुंदेलखंड की एक जाति जो राजाओं का यशोगान गाती थी
मर्दानी: पुरुषों के समान साहस रखने वाली वीर स्त्री
व्याख्या-
कवयित्री कहती हैं कि
जब रानी लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के महाराज गंगाधर राव से हुआ, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो वीरता का वैभव
के साथ मिलन हो गया हो। विवाह के बाद लक्ष्मीबाई झाँसी की रानी बनकर आईं। उनके
आगमन से पूरे झाँसी राज्य में हर्ष और उत्सव का वातावरण छा गया। राजमहल में
बधाइयाँ गूँजने लगीं और चारों ओर खुशियाँ फैल गईं।
कवयित्री रानी लक्ष्मीबाई की तुलना बुंदेलखंड के वीर योद्धाओं
की प्रशस्ति-गाथाओं से करती हैं। जिस प्रकार वीरों की कीर्ति का गुणगान किया जाता
है, उसी
प्रकार लक्ष्मीबाई भी वीरता और गौरव की प्रतीक बनकर झाँसी आई थीं। आगे कवयित्री
पौराणिक उदाहरण देते हुए कहती हैं कि जैसे चित्रांगदा को अर्जुन मिले थे और देवी
भवानी का मिलन भगवान शिव से हुआ था, उसी प्रकार लक्ष्मीबाई का झाँसी
से संबंध एक गौरवपूर्ण और ऐतिहासिक घटना थी।
अंत में कवयित्री बताती हैं कि उन्होंने
बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) से रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की यह अमर गाथा
सुनी है। वे गर्वपूर्वक कहती हैं—
“खूब
लड़ी मर्दानी, वह
तो झाँसी वाली रानी थी।”
काव्य-सौंदर्य: इन पंक्तियों में वीर रस और उत्साह का
सुंदर चित्रण हुआ है। उपमा अलंकार का प्रभावशाली प्रयोग किया गया है। भाषा सरल, ओजपूर्ण और भावपूर्ण है।
भावार्थ-
इन पंक्तियों में
कवयित्री , रानी लक्ष्मीबाई के विवाह और उनके झाँसी
आगमन का वर्णन करती हैं। कवयित्री कहती हैं कि लक्ष्मीबाई और झाँसी का मिलन ऐसा था, मानो वीरता और वैभव का संगम हो गया हो।
विवाह के बाद जब वे झाँसी की रानी बनकर आईं,
तो पूरे राज्य में आनंद और उत्साह का वातावरण छा गया। राजमहल
में बधाइयाँ गूँज उठीं और सभी लोग प्रसन्न हो गए।
कवयित्री रानी लक्ष्मीबाई की तुलना बुंदेलखंड के वीरों की
यशोगाथाओं से करती हैं। जिस प्रकार चित्रांगदा को अर्जुन और देवी भवानी को भगवान
शिव मिले थे, उसी प्रकार लक्ष्मीबाई का झाँसी से संबंध भी एक गौरवपूर्ण और
ऐतिहासिक घटना थी।
अंत में कवयित्री बताती हैं कि उन्होंने
बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) से रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की यह प्रेरणादायक
कहानी सुनी है। वे गर्वपूर्वक कहती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई ने अद्भुत साहस के साथ
युद्ध किया और वे सचमुच झाँसी की वीर रानी थीं।
उदित
हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किंतु
कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी
विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजाजी
रानी शोक-समानी थी.
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
शब्दार्थ
उदित – प्रकट
होना, उभरना
सौभाग्य – शुभ
भाग्य, खुशहाली
मुदित – प्रसन्न, आनंदित
उजयाली – उजाला, प्रकाश
कालगति – समय
का परिवर्तन, भाग्य की चाल
काली घटा – संकट
या दुःख का प्रतीक
विधवा – वह स्त्री जिसके पति का निधन हो गया हो
विधि – भाग्य, नियति
निःसंतान – संतानहीन
शोक-समानी
– शोक में डूबी हुई
हरबोले – वीरों की गाथा गाने वाले लोकगायक
व्याख्या-
इन पंक्तियों में कवयित्री रानी लक्ष्मीबाई के जीवन में आए
अचानक दुःखों का वर्णन करती हैं।
कवयित्री कहती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई के झाँसी आने से राजमहल
में सुख, समृद्धि और खुशियों का वातावरण था। ऐसा लगता था मानो उनका
सौभाग्य उदित हो गया हो और पूरे महल में आनंद का प्रकाश फैल गया हो। लेकिन समय की
गति ने अचानक करवट ली और सुख के इन क्षणों पर दुःख के बादल छा गए।
रानी लक्ष्मीबाई, जो बचपन से ही शस्त्र चलाने और वीरता के
कार्यों में रुचि रखती थीं, उनके
हाथों में केवल चूड़ियाँ शोभा नहीं देती थीं। दुर्भाग्यवश, उनके पति महाराज गंगाधर राव का निःसंतान
निधन हो गया और रानी कम आयु में ही विधवा हो गईं। इस दुखद घटना से वे गहरे शोक में
डूब गईं।
कवयित्री को लगता है कि नियति ने रानी
पर बिल्कुल भी दया नहीं की। फिर भी,
आगे चलकर रानी लक्ष्मीबाई ने अपने साहस और वीरता से इतिहास में
अमर स्थान प्राप्त किया।
"खूब
लड़ी मर्दानी, वह
तो झाँसी वाली रानी थी।"
बुझा
दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य
हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन
फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस
का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा
झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
बुझा दीप – यहाँ महाराज गंगाधर राव की मृत्यु का
प्रतीक
हरषाया – प्रसन्न हुआ, खुश हुआ
राज्य हड़प – किसी राज्य पर अन्यायपूर्वक अधिकार कर
लेना
अवसर
– मौका
अश्रुपूर्ण – आँसुओं से भरा हुआ
बिरानी – उजड़ी हुई,
सूनी, वीरान
व्याख्या-
कवयित्री कहती हैं कि महाराज गंगाधर राव
की मृत्यु से झाँसी का सौभाग्यरूपी दीपक बुझ गया। इस अवसर का लाभ उठाकर भारत के
गवर्नर-जनरल लॉर्ड
डलहौजी मन ही मन प्रसन्न हुआ। उसने झाँसी
राज्य को हड़पने का यह उचित अवसर समझा।
डलहौजी ने अपनी हड़प
नीति के अनुसार निःसंतान राज्यों को ब्रिटिश
शासन में मिलाने का निर्णय लिया। उसने तुरंत अपनी सेना झाँसी के किले पर भेज दी और
वहाँ अंग्रेजी झंडा फहरा दिया। अंग्रेजों ने स्वयं को झाँसी का संरक्षक और
उत्तराधिकारी बताकर राज्य पर अधिकार कर लिया।
रानी लक्ष्मीबाई ने आँसुओं से भरी आँखों
से अपनी प्रिय झाँसी को उजड़ते हुए देखा। जो झाँसी कभी समृद्ध और खुशहाल थी, वह अब पराधीन और वीरान दिखाई देने लगी।
इस अन्याय ने रानी के मन में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष की ज्वाला प्रज्वलित कर
दी।
अंत में कवयित्री बुंदेलखंड के
लोकगायकों से सुनी हुई रानी की वीरगाथा को दोहराते हुए कहती हैं—
“खूब
लड़ी मर्दानी, वह
तो झाँसी वाली रानी थी।”
काव्य-सौंदर्य: इन
पंक्तियों में “बुझा दीप झाँसी का” रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग है, जो
महाराज गंगाधर राव की मृत्यु का प्रतीक है। “झाँसी हुई बिरानी” में करुण रस की अभिव्यक्ति हुई है, जबकि
पूरी कविता में वीर रस का प्रभाव बना रहता है।
अनुनय-विनय
नहीं सुनता है, विकट फ़िरंगी की माया,
व्यापारी
बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,
रानी दासी बनी, बनी यह
दासी अब महरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ (पंक्ति अनुसार):
अनुनय-विनय नहीं
सुनता था — प्रार्थनाओं
पर ध्यान नहीं देता था।
फ़िरंगी की माया — अंग्रेजों की चालाकी और कुटिल नीति।
पैर पसारे — सत्ता और अधिकार का विस्तार किया।
पलट गई काया — वास्तविक रूप सामने आ गया।
दासी बनी — अधिकारहीन बना दी गई।
व्याख्या-
कवि
कहते हैं कि अंग्रेज (फ़िरंगी) बड़े कठोर और स्वार्थी थे। वे किसी की प्रार्थना या
विनती नहीं सुनते थे। जब वे भारत आए थे, तब व्यापारी बनकर दया और मित्रता का दिखावा करते थे, लेकिन बाद में उनकी असली नीति सामने आ
गई। गवर्नर-जनरल लॉर्ड
डलहौजी ने अपनी साम्राज्यवादी नीति के द्वारा
भारत में अपना प्रभुत्व बढ़ाना शुरू कर दिया। उसने अनेक राजाओं और नवाबों के
राज्यों को छीन लिया और उनका अपमान किया। झाँसी की रानी, जो पहले स्वतंत्र राज्य की महारानी थीं, उन्हें अंग्रेजों ने दासी के समान बना
दिया। ऐसी परिस्थिति में रानी लक्ष्मीबाई ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया। उनकी
बहादुरी की कहानी बुंदेलखंड के लोकगायक (हरबोले) आज भी सुनाते हैं कि वह झाँसी की
रानी मर्दों की तरह साहसपूर्वक लड़ी थीं।
भावार्थ-
यह
पद्यांश सुभद्रा
कुमारी चौहान की
प्रसिद्ध कविता झाँसी की रानी से लिया गया है। इसमें कवयित्री ने अंग्रेजों की कुटिल और
विस्तारवादी नीति का वर्णन किया है। अंग्रेज पहले व्यापार के बहाने भारत आए, परंतु बाद में उन्होंने शासन स्थापित
कर लिया। लॉर्ड डलहौजी की 'हड़प नीति' के कारण अनेक भारतीय राज्यों का विलय
कर लिया गया। झाँसी भी इसी नीति का शिकार बनी। रानी लक्ष्मीबाई के अधिकार छीन लिए
गए और उन्हें अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा। किंतु रानी ने अन्याय के सामने
झुकने के बजाय साहस और वीरता का परिचय दिया। कवयित्री उनकी अद्भुत वीरता का गुणगान
करते हुए कहती हैं कि वे सचमुच मर्दानी की तरह लड़ीं और भारतीय इतिहास में अमर हो
गईं।
छिनी
राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद
पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जब
कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की
भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
व्याख्या –
यह पद्यांश अंग्रेजों की साम्राज्यवादी
नीति और भारत में उनके बढ़ते प्रभुत्व का चित्रण करता है। कवयित्री बताती हैं कि
अंग्रेज एक-एक करके भारतीय राज्यों को अपने अधिकार में लेते जा रहे थे। दिल्ली, लखनऊ,
नागपुर, सतारा, तंजौर,
सिंध, पंजाब और
अन्य क्षेत्रों पर उनका कब्ज़ा हो चुका था। भारतीय शासकों की शक्ति समाप्त होती जा
रही थी और वे अंग्रेजों के सामने असहाय हो गए थे। पूरे देश में पराधीनता का वातावरण
था। ऐसे कठिन समय में रानी लक्ष्मीबाई ने साहस और
वीरता के साथ अंग्रेजों का विरोध किया। कवयित्री उनकी इसी अदम्य वीरता का गुणगान
करती हैं और बताती हैं कि उनकी कहानी आज भी बुंदेलखंड के लोकगायकों के मुख से
सुनाई देती है।
भावार्थ –
कवयित्री बताती हैं कि अंग्रेजों ने अपनी
साम्राज्यवादी नीति के द्वारा भारत के अनेक राज्यों पर अधिकार कर लिया था। दिल्ली, लखनऊ,
नागपुर, सतारा, तंजौर,
सिंध, पंजाब, बंगाल और मद्रास आदि प्रदेश अंग्रेजों के अधीन हो चुके थे।
भारतीय शासकों की शक्ति और स्वतंत्रता समाप्त होती जा रही थी। पूरे देश में
अंग्रेजी शासन का आतंक और प्रभुत्व फैल चुका था। ऐसे संकटपूर्ण समय में रानी लक्ष्मीबाई ने अद्भुत साहस, वीरता और
देशभक्ति का परिचय देते हुए अंग्रेजों का डटकर सामना किया। उनकी वीरता की गाथा आज
भी बुंदेलखंड के लोकगायक (हरबोले) बड़े गर्व से सुनाते हैं। इसलिए कवयित्री कहती
हैं कि झाँसी की रानी सचमुच मर्दानी की तरह लड़ी थीं।
रानी
रोईं रनिवासों में बेगम ग़म से थीं बेजार
उनके
गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरे-आम
नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
'नागपूर के जेवर ले लो 'लखनऊ के लो नौलख हार',
यों परदे की इज़्ज़त पर-
देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
शब्दार्थ-
रनिवासों: महलों के
भीतर रानियों के रहने का स्थान (अंतःपुर)
बेगम: मुस्लिम
शासकों या नवाबों की पत्नियाँ
ग़म: दुःख या शोक
बेज़ार:
अत्यधिक परेशान,
दुःखी या लाचार
बिकानी
थी: बिक रही थी या नीलाम हो रही थी
व्याख्या –
इस पद्यांश में कवयित्री ने अंग्रेजों
द्वारा भारतीय राजपरिवारों के अपमान और शोषण का मार्मिक चित्रण किया है। अंग्रेजों
ने भारतीय राज्यों पर अधिकार करने के बाद राजाओं और नवाबों की संपत्ति छीन ली।
उनकी रानियों और बेगमों को अपमानजनक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उनके
बहुमूल्य आभूषण और वस्त्र बाजारों में नीलाम किए गए, जिससे
उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा। कवयित्री यह दिखाना चाहती हैं कि
अंग्रेज केवल राजनीतिक अधिकार ही नहीं छीन रहे थे, बल्कि
भारतीयों के सम्मान और स्वाभिमान को भी कुचल रहे थे। इसी अन्याय के विरुद्ध रानी
लक्ष्मीबाई ने संघर्ष किया और वीरता की मिसाल बन गईं।
भावार्थ –
कवयित्री बताती हैं कि अंग्रेजों की
अत्याचारी नीतियों के कारण भारतीय राजाओं और नवाबों की स्थिति बहुत दयनीय हो गई
थी। रानियाँ अपने महलों में रो रही थीं और बेगमें अत्यंत दुखी थीं। उनकी आर्थिक
स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि उनके गहने और कपड़े कलकत्ता के बाजारों में बेचे जा
रहे थे। अंग्रेज इन वस्तुओं की खुलेआम नीलामी करवाते थे और समाचार-पत्रों में
विज्ञापन छपवाते थे कि नागपुर के जेवर और लखनऊ के बहुमूल्य हार खरीद लो। इस प्रकार
भारतीय शासकों और उनके परिवारों की प्रतिष्ठा तथा मर्यादा को ठेस पहुँचाई जा रही
थी। ऐसे अपमान और अन्याय के वातावरण में रानी लक्ष्मीबाई ने साहसपूर्वक अंग्रेजों का सामना किया और अपनी वीरता से
इतिहास में अमर हो गईं।
काव्य-सौंदर्य :
- अंग्रेजों के अत्याचारों का मार्मिक चित्रण।
- भारतीय राजपरिवारों की दयनीय स्थिति का सजीव वर्णन।
- भाषा सरल,
भावपूर्ण और ओजमयी है।
- करुण रस तथा वीर रस का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
कुटियों
में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर
सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, बहिन
छबीली
ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो
सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
विषम: बहुत कठिन,
गंभीर, या असहनीय
वेदना: पीड़ा,
दुःख, या गहरा कष्ट
आहत:
घायल या जिसे ठेस पहुँची हो
पुरखों:
पूर्वजों या बुजुर्गों
अभिमान:
गौरव, गर्व,
या आत्मसम्मान
नाना
धुंधूपंत: नाना साहब
(पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र और स्वतंत्रता सेनानी)
छबीली: सुंदर और चंचल
(यह रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम था)
रण-चंडी: युद्ध की देवी
व्याख्या-
इस
पद्यांश में कवयित्री ने 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि का चित्रण किया
है। अंग्रेजों के अत्याचारों से जनता और शासक वर्ग दोनों ही दुखी और अपमानित थे।
सैनिक अपने पूर्वजों की वीरता को याद कर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने को तैयार
हो रहे थे। नाना साहब पेशवा क्रांति की योजनाएँ बना रहे थे। ऐसे समय में रानी
लक्ष्मीबाई ने लोगों को अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़े होने की प्रेरणा दी।
कवयित्री ने स्वतंत्रता संग्राम को 'यज्ञ'
तथा
देशभक्ति की भावना को 'सोई
हुई ज्योति' कहा है। रानी लक्ष्मीबाई ने इस ज्योति को पुनः प्रज्ज्वलित
करने का कार्य किया। यह पद्यांश उनके साहस, नेतृत्व और
देशप्रेम को उजागर करता है।
भावार्थ-
कवयित्री कहती हैं कि अंग्रेजों के अत्याचारों से झोपड़ियों में रहने वाले सामान्य
लोग भी दुखी थे और महलों में रहने वाले राजाओं-रानियों को भी अपमान सहना पड़ रहा
था। वीर सैनिकों के हृदय में अपने पूर्वजों की वीरता और गौरव का अभिमान जाग उठा
था। नाना साहब पेशवा स्वतंत्रता संग्राम की तैयारी में जुटे हुए थे। उसी समय रानी
लक्ष्मीबाई (छबीली) ने युद्ध का आह्वान कर दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए
संघर्ष रूपी यज्ञ आरंभ हो गया था और लोगों के हृदय में सोई हुई देशभक्ति तथा
स्वतंत्रता की भावना को जगाना आवश्यक था।
काव्य-सौंदर्य :
- स्वतंत्रता-संग्राम की भावना का ओजपूर्ण चित्रण।
- 'यज्ञ' और
'ज्योति' रूपकों का सुंदर प्रयोग।
- वीर रस की प्रधानता।
- भाषा सरल,
प्रभावशाली एवं प्रेरणादायक है।
महलों
ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती,
दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी
कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
ज्वाला: आग की लपटें (यहाँ इसका अर्थ विद्रोह की तीव्र भावना
से है)
सुलगाई
थी: आग को
भड़काया या शुरू किया था
चिनगारी: आग का छोटा कण (यहाँ इसका अर्थ आज़ादी की शुरुआती
तड़प से है)
अंतरतम: हृदय की गहराइयों से या मन के भीतर से
चेती: जाग उठी
या सचेत हुई
लपटें
छाई थीं: विद्रोह
की आग पूरी तरह फैल चुकी थी
भारी धूम मचाई थी:
बड़े
स्तर पर क्रांति या विद्रोह की शुरुआत की थी
हलचल: हलचल या जागृति की शुरुआत
उकसानी
थी: बढ़ावा
देना था या प्रेरित करना था
व्याख्या-
इस
पद्यांश में कवयित्री ने 1857 की क्रांति के व्यापक स्वरूप का वर्णन
किया है। वह बताती हैं कि यह विद्रोह केवल राजाओं और सैनिकों तक सीमित नहीं था,
बल्कि
इसमें सामान्य जनता भी शामिल थी। महलों और झोंपड़ियों दोनों ने मिलकर अंग्रेजी
शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। स्वतंत्रता की भावना लोगों के मन की गहराइयों से
उत्पन्न हुई थी। देश के विभिन्न नगरों—झाँसी, दिल्ली,
लखनऊ,
मेरठ,
कानपुर,
पटना,
जबलपुर
और कोल्हापुर—में क्रांति की लहर फैल गई। कवयित्री इस जन-जागरण को स्वतंत्रता की
आग के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जिसने पूरे देश को आंदोलित कर दिया। यह
पद्यांश राष्ट्रीय एकता, देशभक्ति और स्वतंत्रता के लिए सामूहिक
संघर्ष की भावना को व्यक्त करता है।
भावार्थ-
कवयित्री
कहती हैं कि 1857 की क्रांति में केवल राजमहलों के लोग ही नहीं, बल्कि
सामान्य जनता भी शामिल थी। महलों ने आग लगाई तो झोंपड़ियों ने भी उसे और अधिक
भड़का दिया। स्वतंत्रता की यह भावना लोगों के हृदय की गहराइयों से निकली थी। झाँसी,
दिल्ली
और लखनऊ जैसे नगर क्रांति की आग से जाग उठे। मेरठ, कानपुर और
पटना में भी क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध जोरदार आंदोलन किया। जबलपुर
और कोल्हापुर में भी विद्रोह की हलचल दिखाई देने लगी। इस प्रकार पूरे देश में
स्वतंत्रता की चेतना फैल गई थी।
काव्य-सौंदर्य :
- "स्वतंत्रता
की चिनगारी", "लपटें छाई थीं" आदि रूपकों का
सुंदर प्रयोग।
- 1857 की क्रांति के
जन-आंदोलन स्वरूप का सजीव चित्रण।
- वीर रस एवं देशभक्ति की भावना की प्रधानता।
- भाषा सरल,
ओजपूर्ण और प्रेरणादायक है।
इस
स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
नाना
धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमद
शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत
के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती
उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबालों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
महायज्ञ: महान यज्ञ (यहाँ इसका संदर्भ 'स्वतंत्रता संग्राम'
से
है)
वीरवर: श्रेष्ठ या महान वीर योद्धा
आए
काम: शहीद हो
गए या वीरगति को प्राप्त हुए
सरनाम: प्रसिद्ध, नामी, या विख्यात
अभिराम: सुंदर, आकर्षक, या
अत्यंत वीर (मनोहर)
इतिहास-गगन: इतिहास रूपी आकाश
अमर: जो कभी न मरे (जिनका नाम हमेशा याद रखा जाए)
जुर्म:
अपराध या गुनाह (अंग्रेजों की नज़र में)
व्याख्या-
इस
पद्यांश में कवयित्री ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख वीरों
का स्मरण किया है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को 'महायज्ञ'
कहा
है और इसमें अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों का सम्मान किया है। नाना साहब,
तात्या
टोपे, अज़ीमुल्ला ख़ाँ, मौलवी अहमदुल्लाह शाह और कुँवर
सिंह जैसे वीरों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। कवयित्री इस बात पर
दुःख व्यक्त करती हैं कि अंग्रेज इन देशभक्तों के त्याग और बलिदान को अपराध मानते
थे। वास्तव में उनका संघर्ष देश की स्वतंत्रता के लिए था। इसलिए उनके नाम भारतीय
इतिहास में सदैव अमर रहेंगे। यह पद्यांश देशभक्ति, त्याग और
बलिदान की भावना को उजागर करता है।
भावार्थ –
कवयित्री कहती हैं कि भारत की स्वतंत्रता
के लिए हुए महान संघर्ष में अनेक वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। नाना साहब, तात्या टोपे, अज़ीमुल्ला ख़ाँ, मौलवी अहमदुल्लाह शाह और वीर कुँवर सिंह जैसे महान
क्रांतिकारियों ने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। उनके नाम भारत के इतिहास
में सदैव अमर रहेंगे। अंग्रेजी शासन के समय इन वीरों के बलिदान और संघर्ष को अपराध
(जुर्म) कहा जाता था, जबकि वास्तव में वे देशभक्ति और स्वतंत्रता के लिए दिए गए
महान बलिदान थे।
इनकी
गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ
खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट
वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वॉकर भागा,
उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
व्याख्या-
इस
पद्यांश में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और युद्ध-कौशल का वर्णन किया
है। झाँसी की रणभूमि में रानी किसी साधारण स्त्री की तरह नहीं, बल्कि
एक पराक्रमी योद्धा के रूप में उपस्थित थीं। जब अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट वॉकर
अपनी सेना के साथ आगे बढ़ा, तब रानी ने निर्भीक होकर उसका सामना
किया। उन्होंने तलवार से ऐसा प्रहार किया कि वॉकर घायल होकर भागने पर मजबूर हो
गया। कवयित्री रानी की वीरता को पुरुषों से भी बढ़कर बताती हैं। यह प्रसंग रानी के
साहस, आत्मविश्वास और अद्वितीय युद्ध-कौशल को दर्शाता है।
भावार्थ-
कवयित्री
कहती हैं कि अब अन्य वीरों की कथाएँ छोड़कर झाँसी की रणभूमि की ओर चलते हैं,
जहाँ
रानी लक्ष्मीबाई वीर पुरुषों के बीच एक योद्धा के रूप में खड़ी थीं। उसी समय
अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट वॉकर अपने सैनिकों के साथ युद्ध करने के लिए आगे बढ़ा।
रानी ने तुरंत अपनी तलवार निकाल ली और उससे युद्ध किया। यह युद्ध असमान था क्योंकि
एक ओर अंग्रेजी सेना थी और दूसरी ओर रानी अकेली थीं, फिर भी
उन्होंने अद्भुत साहस दिखाया। रानी के प्रहार से वॉकर घायल हो गया और युद्धभूमि
छोड़कर भाग गया। रानी की वीरता देखकर वह अत्यंत आश्चर्यचकित रह गया।
रानी
बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा
थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना-तट
पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया
ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
स्वर्ग
तत्काल सिधार: तुरंत मृत्यु हो
जाना (वीरगति पाना)
यमुना-तट: यमुना नदी का किनारा
खाई रानी से हार: रानी लक्ष्मीबाई से
बुरी तरह पराजित हुए
विजयी: जीत हासिल करने वाली या
विजेता
अधिकार: कब्ज़ा या नियंत्रण
सिंधिया: ग्वालियर के तत्कालीन
शासक राजा (जो अंग्रेजों के वफादार थे)
रजधानी: राजधानी (यहाँ संदर्भ
ग्वालियर शहर से है)
व्याख्या-
इस
पद्यांश में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के अद्वितीय साहस, दृढ़ संकल्प
और युद्ध-कौशल का वर्णन किया है। झाँसी से निकलने के बाद रानी ने बिना रुके लगभग
सौ मील की यात्रा कर कालपी पहुँचीं। इस कठिन यात्रा में उनका घोड़ा अपनी स्वामिनी
के प्रति निष्ठा निभाते हुए प्राण त्याग देता है। इसके बाद रानी यमुना तट पर
अंग्रेजों से युद्ध करती हैं और उन्हें पराजित कर देती हैं। विजय प्राप्त करने के
बाद वे ग्वालियर की ओर बढ़ती हैं और वहाँ भी अपना अधिकार स्थापित कर लेती हैं।
रानी की वीरता और शक्ति को देखकर अंग्रेजों के समर्थक सिंधिया अपनी राजधानी छोड़कर
भाग जाते हैं। कवयित्री इस प्रसंग के माध्यम से रानी लक्ष्मीबाई की असाधारण वीरता,
नेतृत्व
क्षमता और देशभक्ति को उजागर करती हैं।
भावार्थ-
कवयित्री
कहती हैं कि झाँसी से निकलकर रानी लक्ष्मीबाई लगातार सौ मील की कठिन यात्रा करके
कालपी पहुँचीं। इस लंबी यात्रा के कारण उनका प्रिय घोड़ा अत्यधिक थक गया और भूमि
पर गिरकर मर गया। इसके बाद यमुना नदी के तट पर अंग्रेजों और रानी की सेना के बीच
युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेजों को फिर पराजय का सामना करना पड़ा। विजय
प्राप्त करने के बाद रानी आगे बढ़ीं और ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। रानी की वीरता
से भयभीत होकर अंग्रेजों के मित्र सिंधिया अपनी राजधानी छोड़कर भाग गए। इस प्रकार
रानी लक्ष्मीबाई ने अद्भुत साहस, पराक्रम और नेतृत्व का परिचय दिया।
विजय
मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके
जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं,
युद्ध
क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
पर, पीछे ह्यू रोज आ गया,
हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
शब्दार्थ-
सन्मुख:
सामने या सम्मुख
मुँह
की खाई थी: बुरी तरह
पराजित हुआ था या हार गया था
सखियाँ: सहेलियाँ या सखी (यहाँ इसका संदर्भ रानी की महिला
सैनिकों से है)
युद्ध
क्षेत्र: रणभूमि
या लड़ाई का मैदान
भारी
मार मचाई थी: दुश्मनों
का बड़े पैमाने पर संहार किया था (तबाही मचाई थी) ह्यू रोज़: सर ह्यू
रोज़ (वह ब्रिटिश जनरल जिसने झाँसी की सेना को घेरा था)
घिरी:
चारों तरफ से दुश्मनों के बीच फँस जाना
व्याख्या-
इस
पद्यांश में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष के अंतिम चरण का वर्णन किया
है। ग्वालियर विजय के बाद अंग्रेजों ने फिर से आक्रमण किया। जनरल स्मिथ के नेतृत्व
में आई अंग्रेज सेना को रानी ने अपने पराक्रम से परास्त कर दिया। रानी की सखियाँ
काना और मंदरा भी युद्ध में उनके साथ थीं और उन्होंने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन
किया। इससे स्पष्ट होता है कि रानी के साथ महिलाओं ने भी स्वतंत्रता-संग्राम में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन तभी अंग्रेज सेनापति ह्यू रोज पीछे से अपनी
सेना लेकर आ गया और रानी को चारों ओर से घेर लिया। इस परिस्थिति ने युद्ध को और
अधिक कठिन तथा निर्णायक बना दिया। कवयित्री इस प्रसंग के माध्यम से रानी और उनकी
सहयोगी वीरांगनाओं के साहस तथा त्याग को उजागर करती हैं।
भावार्थ-
कवयित्री
कहती हैं कि ग्वालियर पर विजय प्राप्त करने के बाद भी रानी लक्ष्मीबाई की
कठिनाइयाँ समाप्त नहीं हुईं। अंग्रेजों ने पुनः अपनी सेना भेज दी। इस बार जनरल
स्मिथ रानी के सामने था, लेकिन उसे भी रानी की वीरता के कारण
पराजय का सामना करना पड़ा। रानी की सखियाँ काना और मंदरा भी उनके साथ युद्ध में
शामिल थीं और उन्होंने भी बड़ी बहादुरी से युद्ध करते हुए अंग्रेजों को भारी क्षति
पहुँचाई। किंतु तभी अंग्रेज सेनापति ह्यू रोज अपनी सेना लेकर पीछे से आ पहुँचा। अब
रानी चारों ओर से अंग्रेजों की सेना से घिर गईं और उनकी स्थिति अत्यंत संकटपूर्ण
हो गई।
तो
भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किंतु
सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा
अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,
रानी
एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी
उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
सैन्य: सेना या फौज (यहाँ अंग्रेजों की सेना से तात्पर्य
है)
विषम: बहुत
कठिन, जटिल या
विकट
अपार: जिसकी कोई सीमा न हो या बहुत बड़ा
अड़ा: रुक गया, अड़ियल हो गया या आगे बढ़ने से मना कर दिया
बहुतेरे: बहुत
सारे या संख्या में अत्यधिक
वार: हमला
या प्रहार
व्याख्या-
इस
पद्यांश में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के जीवन के अंतिम युद्ध का अत्यंत
मार्मिक और वीरतापूर्ण चित्रण किया है। शत्रुओं से घिर जाने पर भी रानी ने अद्भुत
साहस और पराक्रम का परिचय दिया। वे तलवार चलाते हुए अंग्रेजों की सेना के बीच से
निकल गईं, किंतु मार्ग में एक नाला उनके लिए बाधा बन गया। उनका नया घोड़ा
नाले को पार करने में असमर्थ रहा। इसी अवसर का लाभ उठाकर अंग्रेज सैनिक वहाँ पहुँच
गए। रानी अकेली थीं, जबकि सामने असंख्य शत्रु थे। फिर भी उन्होंने वीरतापूर्वक
युद्ध किया। अनेक प्रहार सहने के बाद वे घायल होकर गिर पड़ीं और मातृभूमि की रक्षा
करते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं। कवयित्री ने रानी की तुलना
'सिंहनी' से करके उनके
अद्भुत साहस और वीरता को दर्शाया है।
भावार्थ-
कवयित्री
कहती हैं कि चारों ओर से घिर जाने पर भी रानी लक्ष्मीबाई ने साहस नहीं खोया। वे
शत्रुओं का संहार करती हुई अंग्रेजी सेना को चीरकर आगे निकल गईं। लेकिन रास्ते में
एक नाला आ गया, जो उनके लिए बहुत बड़ा संकट बन गया। उनका घोड़ा नया था,
इसलिए
वह नाले को पार करने में हिचकिचाने लगा। इसी बीच अंग्रेज सैनिक वहाँ पहुँच गए।
रानी अकेली थीं, जबकि शत्रुओं की संख्या बहुत अधिक थी। अंग्रेज सैनिक लगातार उन
पर वार करने लगे। युद्ध करते-करते रानी गंभीर रूप से घायल होकर भूमि पर गिर पड़ीं
और अंततः वीरगति को प्राप्त हो गईं।
रानी
गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला
तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी
उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई
हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
सिधार
गई: मृत्यु
हो जाना या परलोक सिधारना (शहीद होना)
दिव्य: अलौकिक, पवित्र, या
देवतुल्य
तेज: प्रकाश, चमक, या आत्मा की ऊर्जा
अधिकारी: हक़दार या योग्य
मनुज:
मनुष्य या मानव
व्याख्या-
इस
पद्यांश में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान और उनके महान व्यक्तित्व का
भावपूर्ण वर्णन किया है। युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त करने के बाद उनकी चिता उनकी
अंतिम सवारी बनती है। कवयित्री कहती हैं कि रानी का तेज अमर हो गया और इतिहास में
सदैव चमकता रहेगा। आश्चर्य की बात यह है कि उन्होंने मात्र तेईस वर्ष की आयु में
ऐसा महान कार्य किया, जो असाधारण साहस और देशभक्ति का उदाहरण बन गया। कवयित्री यह
स्पष्ट करती हैं कि रानी कोई देवी या अवतार नहीं थीं, बल्कि एक
साधारण मानव थीं; फिर भी उनके कार्य इतने महान थे कि वे स्वतंत्रता की प्रतीक बन
गईं। उन्होंने अपने जीवन और बलिदान से देशवासियों को स्वतंत्रता, आत्मसम्मान,
वीरता
और देशप्रेम का मार्ग दिखाया। इसलिए उनका नाम भारतीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा।
भावार्थ-
कवयित्री
कहती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हो गईं। उनकी चिता ही उनकी अंतिम
दिव्य सवारी बन गई। उनका तेज परम तेज में विलीन हो गया, क्योंकि वे
वास्तव में उस गौरव और सम्मान की अधिकारी थीं। उनकी आयु केवल तेईस वर्ष थी,
फिर
भी उन्होंने असाधारण कार्य किए। वे कोई अवतार नहीं थीं, बल्कि एक
साधारण मनुष्य थीं। उन्होंने स्वतंत्रता की देवी के समान भारतवासियों में नई चेतना
और जागृति उत्पन्न की। वे देशवासियों को स्वतंत्रता, साहस,
त्याग
और देशभक्ति का मार्ग दिखाकर गईं तथा वह शिक्षा दे गईं, जिसे लोगों
को सीखना चाहिए था।
जाओ
रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारत वासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे
चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो
मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा
स्मारक तू ही होगी,
तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले
हरबोलों के मुँह
हमने
सुनी कहानी थी।
खूब
लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी
वाली रानी थी।
शब्दार्थ-
कृतज्ञ: उपकार मानने वाला या अहसानमंद
बलिदान: देश के
लिए प्राणों का त्याग या कुरबानी
अविनाशी: जो कभी नष्ट न हो या अमर
मदमाती: घमंड या नशे में चूर (अंग्रेजों की जीत का अहंकार)
स्मारक: याद दिलाने वाला चिन्ह या यादगार (Memorial)
अमिट: जो कभी न मिट सके या स्थायी निशानी
व्याख्या-
इस
पद्यांश में कवयित्री सुभद्रा
कुमारी चौहान ने रानी लक्ष्मीबाई के प्रति
अपनी श्रद्धा और सम्मान व्यक्त किया है। कवयित्री कहती हैं कि रानी का बलिदान
भारतीयों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। इतिहास चाहे उनके योगदान को
पर्याप्त स्थान न दे या सत्य को छिपाने का प्रयास किया जाए, फिर भी उनकी
वीरता और देशभक्ति को भुलाया नहीं जा सकता। अंग्रेजों ने झाँसी को नष्ट करने का
प्रयास किया, लेकिन वे रानी की अमर कीर्ति को नहीं मिटा सके। रानी का जीवन,
संघर्ष
और बलिदान ही उनका सच्चा स्मारक है, जो सदैव लोगों को स्वतंत्रता,
साहस
और देशभक्ति की प्रेरणा देता रहेगा।
भावार्थ-
कवयित्री
रानी लक्ष्मीबाई को श्रद्धांजलि देते हुए कहती हैं कि भारतवासी सदैव उनके उपकारों
और बलिदान को याद रखेंगे। उनका त्याग और वीरता आने वाली पीढ़ियों के मन में
स्वतंत्रता की अमर भावना जगाती रहेगी। यदि इतिहास उनके बारे में मौन भी हो जाए
अथवा सत्य को दबाने का प्रयास किया जाए, तब भी उनकी कीर्ति मिट नहीं सकती।
चाहे विजेता अंग्रेज अपने तोपों से झाँसी को नष्ट कर दें, फिर भी रानी
लक्ष्मीबाई का नाम और उनका बलिदान अमर रहेगा। उन्हें अमर बनाने के लिए किसी स्मारक
की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनका महान व्यक्तित्व और त्याग ही उनका सबसे बड़ा
स्मारक है।
काव्य-सौंदर्य :
- रानी लक्ष्मीबाई के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव।
- बलिदान और देशभक्ति की भावना का प्रभावशाली चित्रण।
- वीर रस तथा शान्त रस का सुंदर समन्वय।
- भाषा सरल,
ओजपूर्ण, भावपूर्ण और
प्रेरणादायक है।
- "तेरा
स्मारक तू ही होगी"
में रानी की अमर कीर्ति को अत्यंत
प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है।
अभ्यास-
रचना
से संवाद-
मेरे
उत्तर मेरे तर्क-
निम्नलिखित
प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते
हैं?
1. 'झाँसी की रानी' कविता की पंक्ति "बूढ़े भारत में
भी आई फिर से नई जवानी थी" में 'नई जवानी' शब्द किस भाव को व्यक्त करता है?
(क) देश का स्वाभिमान
(ख) विद्रोह की चिंगारी
(ग) स्वाधीनता का भय
(घ) भारत की युवावस्था
सही
उत्तर: (ख) विद्रोह की चिंगारी
कारण:
कविता
में "बूढ़े भारत
में भी आई फिर से नई जवानी थी" पंक्ति
1857 की
क्रांति के दौरान भारतीयों में जागी नई चेतना, उत्साह और
अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की भावना को व्यक्त करती है। यहाँ 'नई
जवानी' का अर्थ वास्तविक युवावस्था नहीं, बल्कि
स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए उत्पन्न हुए जोश और क्रांतिकारी भावना से है।
इसलिए "विद्रोह की
चिंगारी" सबसे उपयुक्त
उत्तर है।
2. लक्ष्मीबाई को 'छबीली' कहना उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता
को दर्शाता है?
(क)
विनम्रता
(ख)
शोभायुक्त
(ग)
सहिष्णुता
(घ)
कठोरता
सही
उत्तर: (ख) शोभायुक्त
कारण:
'छबीली'
शब्द
का अर्थ है सुंदर, आकर्षक,
चंचल और शोभायुक्त व्यक्तित्व वाली।
कविता में लक्ष्मीबाई को 'छबीली' कहकर उनके
मनमोहक, प्रभावशाली और आकर्षक व्यक्तित्व का वर्णन किया गया है।
3.
"बुझा दीप झाँसी का" पंक्ति का भावार्थ है-
(क)
अंग्रेजों का झाँसी पर अधिकार हो जाना
(ख)
झाँसी राज्य की उम्मीदों का नष्ट हो जाना
(ग)
राजा की आकस्मिक मृत्यु होना
(घ)
रानी के जीवन में उदासी होना
सही उत्तर (ग) राजा
की आकस्मिक मृत्यु होना है।
कारण: कविता की
पंक्तियाँ हैं— "निःसंतान
मरे राजाजी, रानी
शोक-समानी थी। बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया था।" यहाँ 'दीप
बुझने' का सीधा
और मुख्य भावार्थ झाँसी के राजा गंगाधर राव के असामयिक निधन से है। राजा की मृत्यु
के बाद ही झाँसी का उत्तराधिकारी वंश समाप्त हुआ और राज्य पूरी तरह शोक में डूब
गया था।
4.
"इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम" पंक्ति में स्वतंत्रता
आंदोलन की किस ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया गया है?
(क)
असहयोग आंदोलन
(ख)
भारत छोड़ो आंदोलन
(ग)
1857 की क्रांति
(घ)
सविनय अवज्ञा आंदोलन
सही उत्तर (ग) 1857 की क्रांति है।
कारण: सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित 'झाँसी की रानी' कविता
पूरी तरह से भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 की
क्रांति पर
आधारित है। इस पंक्ति में 'स्वतंत्रता-महायज्ञ' शब्द इसी ऐतिहासिक क्रांति की ओर संकेत करता है, जिसमें रानी लक्ष्मीबाई, नाना धुंधूपंत, तांतया
टोपे, अज़ीमुल्लाह
और कुँवर सिंह जैसे अनेक महान वीरों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी।
अन्य सभी आंदोलन (असहयोग, भारत
छोड़ो, सविनय
अवज्ञा) बीसवीं सदी में महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़े गए थे।
5.
"व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया" पंक्ति में 'यह' शब्द किसके लिए कहा गया है?
(क)
नवाबों के लिए
(ख)
जनरल डलहौजी के लिए
(ग)
लेफ्टिनेंट वॉकर के लिए
सही उत्तर (घ)
ब्रिटिश राज के लिए (या
अंग्रेजों/ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए) है।
कारण: कविता की
पंक्तियाँ हैं— "व्यापारी
बन दया चाहता था जब यह भारत आया, डलहौज़ी
ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया।"
यहाँ
'यह' शब्द ब्रिटिश राज / ब्रिटिश शासकों की ओर संकेत करता है। अंग्रेज़ शुरुआत में भारत में 'ईस्ट इंडिया कंपनी'
के
माध्यम से केवल व्यापार करने के उद्देश्य से आए थे और यहाँ के राजाओं से व्यापार
की अनुमति (दया) मांगते थे। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कूटनीति से पूरे भारत
पर अधिकार कर लिया।
मेरी
समझ मेरे विचार-
नीचे
दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
1.
'झाँसी
की रानी' कविता
के आधार पर बताइए कि लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल कौन-कौन से थे? उनका बचपन दूसरों से किस प्रकार भिन्न
था?
उत्तर- 'झाँसी की रानी' कविता
के अनुसार लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल
घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, धनुष-बाण
चलाना तथा युद्ध-कौशल का अभ्यास करना थे।
उनका
बचपन अन्य बच्चों से भिन्न था। जहाँ सामान्य लड़कियाँ गुड़ियों से खेलती थीं,
वहीं
लक्ष्मीबाई बचपन से ही वीरता और साहस से भरे खेल खेलती थीं। वे घुड़सवारी करती थीं,
तलवार
चलाना सीखती थीं और युद्ध-कला का अभ्यास करती थीं। इसी कारण वे बचपन से ही निडर,
साहसी, आत्मविश्वासी और पराक्रमी थीं।
2.
"किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई" पंक्ति के माध्यम से किस
घटना की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर- किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर
लाई"का अर्थ है कि रानी के खुशहाल
जीवन पर अचानक दुखों के काले बादल मँडराने लगे।
राजा
गंगाधर राव की मृत्यु और झाँसी पर आए संकट की ओर इस पंक्ति में संकेत किया गया है।
राजा के निधन के बाद अंग्रेजों ने झाँसी को हड़पने का प्रयास किया जिससे रानी
लक्ष्मीबाई के जीवन में दुख, संघर्ष
और कठिनाइयाँ बढ़ गईं।
3.
"महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी" पंक्ति समाज के विभिन्न वर्गों की
एकता को दर्शाती है, इस एकता का स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में क्या महत्व है?
उत्तर- इस पंक्ति का महत्व यह है कि १८५७ के
संग्राम में राजा (महल) और आम जनता (झोंपड़ी) ने मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ
संघर्ष किया अर्थात समाज के सभी वर्गों ने मिलकर भाग लिया। अमीर-गरीब, राजा-प्रजा सभी एकजुट थे। महलों ने इस क्रांति को नेतृत्व और संसाधन दिए, जबकि आम जनता ने अपनी आहुति देकर इसे
एक विशाल जन-आंदोलन बनाया। यही अभूतपूर्व एकता ही अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष की
सबसे बड़ी शक्ति बनी और स्वतंत्रता आंदोलन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण सिद्ध हुई।
4.
"सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार" पंक्ति में 'नीलाम छापते' शब्द किसकी ओर संकेत करता है? यह भी बताइए कि किसकी नीलामी की जाती
थी और क्यों?
उत्तर- "सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के
अखबार" पंक्ति
में 'नीलाम छापते' शब्द अंग्रेजों द्वारा भारतीय राजघरानों की संपत्ति की नीलामी के
विज्ञापन प्रकाशित करने की ओर संकेत करता है। अंग्रेज अपने समाचार पत्रों में
झाँसी, नागपुर और लखनऊ जैसे राज्यों की
रानियों और बेगमों के गहनों, हीरे-जवाहरात
तथा बहुमूल्य वस्तुओं की नीलामी की सूचनाएँ छापते थे। वे ऐसा हड़प नीति के तहत
कब्ज़ा किए गए राज्यों के शासकों को अपमानित करने, जनता का मनोबल तोड़ने और आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए करते थे।
5.
"अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी" पंक्ति में 'अवतारी' शब्द व्यक्ति के विशेष गुणों की ओर
इंगित कर रहा है। कविता के आधार पर बताइए कि लक्ष्मीबाई के किन गुणों के कारण उनको
'अवतारी' कहा गया है?
उत्तर- अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी" पंक्ति में 'अवतारी' शब्द रानी लक्ष्मीबाई के असाधारण गुणों की ओर संकेत करता है।
उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध निडर होकर संघर्ष किया और मातृभूमि की रक्षा के लिए
अपने प्राणों का बलिदान दिया। उनकी वीरता, साहस, देशभक्ति, नेतृत्व क्षमता, त्याग और अदम्य संघर्ष-शक्ति इतनी महान
थी कि वे साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि
किसी दिव्य शक्ति के अवतार जैसी प्रतीत होती थीं।
विधा
से संवाद-
विषयों
से संवाद
साझा
साथ/साझा संघर्ष
1.
"लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया", ब्रिटिश राज किस नीति के कारण 'लावारिस का वारिस' बन जाता था? अपने इतिहास के शिक्षक से पता लगाकर उस
नीति के विषय में लिखिए।
उत्तर- लॉर्ड डलहौजी की 'हड़प
नीति' के
अनुसार, यदि किसी
भारतीय राजा की अपनी कोई वास्तविक संतान नहीं होती थी, तो उसे पुत्र गोद लेने का अधिकार नहीं था। राजा की
मृत्यु के बाद उसके राज्य को 'लावारिस' मानकर अंग्रेज़ जबरन उस पर कब्ज़ा कर लेते थे और इस
तरह ब्रिटिश राज उसका 'वारिस' बन जाता था।
2.
इस कविता में लक्ष्मीबाई की जीवन-गाथा के साथ-साथ अनेक वीरों के त्याग और बलिदान
का भी उल्लेख है। उनकी सूची बनाइए तथा शिक्षक की सहायता से 1857 की क्रांति में
उनके योगदान के विषय में लिखिए।
उत्तर: 'झाँसी
की रानी' कविता
में रानी लक्ष्मीबाई के साथ-साथ 1857 की
क्रांति के अनेक वीरों का उल्लेख किया गया है। उनके नाम तथा योगदान इस प्रकार हैं—
- नाना साहब
– कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध
विद्रोह का नेतृत्व किया।
- तात्या टोपे
– रानी लक्ष्मीबाई के प्रमुख सहयोगी
थे। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध कई युद्ध लड़े।
- कुँवर सिंह
– बिहार में 1857 की क्रांति का
नेतृत्व किया और अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी।
- अज़ीमुल्ला ख़ाँ – क्रांति
की योजनाएँ बनाने और लोगों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- अहमद शाह मौलवी
– अंग्रेजों के विरुद्ध जनता को
जागरूक किया और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया।
- रानी लक्ष्मीबाई
– झाँसी की रक्षा के लिए वीरतापूर्वक
युद्ध किया और मातृभूमि के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।
इन सभी वीरों ने 1857 की क्रांति में साहस, त्याग और देशभक्ति का परिचय दिया तथा
भारत की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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