Raidass Ke Padd ||
(1)
अब
कैसे छूटै राम रट लागी।
प्रभु
जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु
जी तुम घन बन, हम
मोरा, जैसे
चितवत चंद चकोरा।
प्रभु
जी तुम दीपक, हम
बाती, जाकी
जोति बरै दिन राती।
प्रभु
जी तुम मोती, हम
धागा, जैसे
सोने मिलत सुहागा।
प्रभु
जी तुम स्वामी, हम
दासा, ऐसी
भगति करै रैदासा।
ये पद संत रैदास
(रविदास) द्वारा रचित अनन्य भक्ति और दास्य भाव के प्रसिद्ध पद हैं, जो प्रभु राम के
प्रति अटूट प्रेम को दर्शाते हैं। इसमें रैदास जी
खुद को तुच्छ (पानी, मोर, बाती, धागा) और प्रभु को
महान (चंदन, बादल, दीपक, मोती) मानकर पूर्ण समर्पण करते हैं, और सांसारिक मोह त्यागकर एकमात्र ईश्वर की भक्ति में लीन हैं।
इस प्रकार यह पद 'अद्वैत' (भक्त और भगवान का एक हो जाना) की
सुंदर अभिव्यक्ति है।
यहाँ हर उदाहरण का एक गहरा आध्यात्मिक
अर्थ है:
1.
चंदन और पानी (समर्पण):
चंदन कठोर होता है और पानी तरल। जब चंदन को पानी के साथ घिसा जाता
है, तो चंदन अपना अस्तित्व खोकर पानी में मिल जाता है और पानी की
साधारण गंध सुगंध में बदल जाती है। रैदास जी कह रहे हैं कि उन्होंने खुद को ईश्वर
में इतना 'घिस' दिया है कि अब उनकी अपनी कोई पहचान नहीं बची, केवल ईश्वर की सुगंध उनके अंग-अंग में बसी है।
- घन बन और मोरा (उल्लास):
यहाँ 'घन' (बादल) ईश्वर हैं और 'मोरा' (भक्त) का मन। जैसे प्यासा मोर बादलों को देखकर नाचने लगता है क्योंकि उसे पता है कि अब वर्षा होगी, वैसे ही रैदास का मन प्रभु की भक्ति पाकर आनंद से झूम रहा है। यह प्रतीक्षा और प्रेम का प्रतीक है। - चाँद और चकोर (एकाग्रता):
चकोर पक्षी के बारे में प्रसिद्ध है कि वह चंद्रमा को इतना प्यार करता है कि वह उसे एकटक देखता रहता है, चाहे उसकी गर्दन ही क्यों न दुखने लगे। यह अविचल ध्यान को दर्शाता है। भक्त का मन दुनिया की दूसरी चीजों से हटकर केवल प्रभु पर टिक गया है। - दीपक और बाती (त्याग):
बाती स्वयं जलती है ताकि प्रकाश बना रहे। रैदास जी कह रहे हैं कि उनके भीतर भक्ति की जो ज्योति जल रही है, वह 'दिन-राती' जलती है। इसके लिए उन्हें बाहरी मंदिर या दीये की जरूरत नहीं, उनका अंतर्मन ही प्रकाशित है। - मोती और धागा (जुड़ाव):
मोती बहुत कीमती है (ईश्वर), और धागा साधारण (भक्त)। लेकिन धागे के बिना मोती की माला नहीं बन सकती। धागा मोतियों के भीतर छिपकर उन्हें जोड़े रखता है। ईश्वर की महानता के साथ जुड़कर भक्त का मूल्य भी बढ़ जाता है। - सोना और सुहागा (शुद्धता):
सोने को शुद्ध करने के लिए 'सुहागा' (एक खनिज) का प्रयोग होता है, जिससे सोना और चमक उठता है। रैदास कहते हैं कि प्रभु के संपर्क में आने से उनका जीवन और अधिक पवित्र और उज्ज्वल हो गया है।
निष्कर्ष:
रैदास जी यह समझाना चाहते हैं कि भक्ति केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि ईश्वर के रंग में पूरी तरह रंग
जाना है। जैसे पानी से चंदन को या धागे से मोती के जुड़ाव को अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही भक्त और भगवान एक हैं।
(2)
जो
तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।
तीरथ
बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।
जहँ
जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा तुम सा देव ओर नहिं दूजा।
मैं
अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।
सबही
पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।
इस
पद में वे ईश्वर के प्रति अपनी अनन्य भक्ति और
अटूट विश्वास को व्यक्त कर रहे हैं।
जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।
व्याख्या: हे राम! यदि आप
मुझसे नाता तोड़ भी दें, तो भी मैं आपसे नाता नहीं तोडूंगा। भला आपसे रिश्ता तोड़कर मैं और
किसके साथ जुड़ सकूँगा? (अर्थात मेरा अस्तित्व केवल आपसे है)।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।
व्याख्या: "हे प्रभु! मुझे अब किसी तीर्थ यात्रा या व्रत-उपवास
(जैसे कर्मकांडों) को करने की कोई इच्छा या आवश्यकता नहीं है। मेरे मन में अब कोई
संशय (अंदेसा) भी नहीं बचा है। मुझे केवल और केवल आपके चरण कमलों (चरण रूपी कमलों)
पर ही पूरा भरोसा है।"
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।
व्याख्या: मैं जहाँ भी जाता
हूँ, मुझे आपकी ही सत्ता और रूप दिखाई देता है। आपके समान दयालु और
समर्थ दूसरा कोई देवता नहीं है।
मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।
व्याख्या: मैंने अपना मन पूरी
तरह से हरि (ईश्वर) से जोड़ लिया है। ईश्वर से यह गहरा प्रेम संबंध जोड़कर अब मुझे
सांसारिक मोह-माया या अन्य किसी सहारे की चाह नहीं रही।
सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।
व्याख्या: रैदास जी कहते हैं
कि दिन के आठों पहर मुझे केवल आपकी ही आशा और प्रतीक्षा रहती है। मैं मन, कर्म और वाणी से पूरी तरह आपके प्रति
समर्पित हूँ।
दिन के 4 प्रहर (Daytime)
1.
पूर्वाह्न : सुबह 6:00 बजे से 9:00 बजे तक (सूर्योदय
का समय, पूजा-पाठ के लिए उत्तम).
2.
मध्याह्न : सुबह 9:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक (मुख्य
कार्य और व्यावसायिक समय).
3.
अपराह्न : दोपहर 12:00 बजे से दोपहर 3:00 बजे तक (भोजन और
विश्राम का समय).
4.
सायंकाल : दोपहर 3:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक (सूर्यास्त
से ठीक पहले का समय).
रात के 4 प्रहर-
प्रदोष : शाम 6:00 बजे से रात 9:00 बजे तक (संध्या
आरती और भगवान शिव की पूजा का समय).
5.
निशीथ : रात 9:00 बजे से मध्यरात्रि 12:00 बजे तक (गहरी नींद
और विश्राम की शुरुआत).
6.
त्रियामा : मध्यरात्रि 12:00 बजे से रात 3:00 बजे तक (घोर निद्रा
का काल).
7. उषा : रात 3:00 बजे से सुबह 6:00 बजे तक (इसे ब्रह्म मुहूर्त भी कहते हैं; योग-ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ)
महत्वपूर्ण बिंदु:
·
अद्वैत भाव: भक्त और भगवान के
बीच कोई अंतर नहीं, वे एक-दूसरे के पूरक हैं।
·
नाम स्मरण: बाहरी दिखावे के
बजाय मन से प्रभु को पुकारने पर जोर।
·
दास्य भाव: रैदास जी स्वयं को
ईश्वर का 'दास' और उन्हें अपना 'स्वामी' मानते हैं।
· दृढ़ निश्चय: ईश्वर यदि विमुख भी हो जाए, तो भी भक्त अपना मार्ग नहीं बदलता|
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित
प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते
हैं?
1. "अब कैसे छूटै राम रट लागी" पंक्ति
का भाव है?
(क) नाम उच्चारण की कठिनाई
(ख) नाम रटकर याद करना
(ग) आराध्य का नाम जपना
(घ) मित्रों का नाम रटना
उत्तर (ग) आराध्य का नाम जपना।
तर्क-इस पंक्ति का अर्थ है कि भक्त के मन में प्रभु के नाम की ऐसी लगन लग गई है जो अब
चाहकर भी नहीं छूट
सकती। यह ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम और भक्ति को दर्शाता है।
2. "प्रभु जी तुम चंदन हम पानी"
पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?
(क) एकाकार और समरूप
(ख) तरल और तीव्र सुगंध
(ग) आश्रय और आश्रित
(घ) द्रव और ठोस
उत्तर (क) एकाकार और समरूप।
तर्क- जैसे चंदन और पानी मिलकर एक हो जाते हैं और पानी में चंदन की खुशबू बस जाती है,
वैसे ही भक्त अपने आराध्य की भक्ति में पूरी तरह लीन होकर उनके साथ एकाकार होना चाहता है।
3. "तुम दीपक, हम बाती" से रैदास का क्या भाव है?
(क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता
है।
(ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है।
(ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है।
(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को
आलोकित करता है।
उत्तर- (घ) भक्त का
आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
तर्क- रैदास जी
का मानना है कि जिस प्रकार दीपक और बाती मिलकर प्रकाश फैलाते हैं, उसी प्रकार जब भक्त का मन ईश्वर की भक्ति
में जलता है (लगता है), तो उसका पूरा
जीवन ज्ञान और भक्ति के प्रकाश से भर जाता है।
4. "जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ"
पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?
(क) परोपकारी भक्ति भाव
(ख) आराध्य से अटूट संबंध
(ग) सांसारिक मोह
(घ) कर्मकांड पर बल
उत्तर- (ख) आराध्य से
अटूट संबंध।
तर्क- रैदास जी कहते
हैं कि हे राम! यदि आप मुझसे नाता तोड़ भी लें,
तो भी मैं आपसे अपना संबंध नहीं तोडूँगा। यह ईश्वर के प्रति
भक्त के कभी न टूटने वाले भरोसे और प्रेम को दर्शाता है।
5. "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा" पंक्ति
से आप क्या समझते हैं?
(क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।
(ख) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक
(ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है।
(घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय
है।
उत्तर- (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
तर्क- रैदास जी के अनुसार, बाहरी कर्मकांडों जैसे तीर्थ यात्रा या व्रत में मन भटकाने के बजाय, ईश्वर
के चरणों में अनन्य भक्ति और समर्पण ही मोक्ष का मार्ग है।
6. सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस
पंक्ति में व्यक्त होती है?
(क) "जहँ जहँ जाओ तुम्हरी
पूजा"
(ख) "जाकी जोति बरै दिन राती"
(ग) "तुम दीपक, हम बाती"
(घ) "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा"
उत्तर- (क) "जहँ
जहँ जाओ तुम्हरी पूजा"।
तर्क-इस पंक्ति का अर्थ है कि भक्त जहाँ कहीं भी जाता है, उसे वहाँ अपने आराध्य के ही दर्शन होते
हैं। यह ईश्वर के कण-कण में व्याप्त (सर्वव्यापक) होने के विचार को स्पष्ट करती है।
अर्थ
और भाव-
नीचे
दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए।
(क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।"
अर्थ: रैदास जी कहते हैं कि हे प्रभु, यदि आप आकाश में छाए काले बादल (घन) हैं, तो मैं जंगल का मोर हूँ जो आपको देखकर खुशी से नाचता है। जैसे चकोर पक्षी पूरी रात बिना पलक झपकाए चंद्रमा को निहारता रहता है, वैसे ही मैं भी आपकी भक्ति में लीन रहता हूँ।
भाव: यहाँ भक्त और भगवान के बीच अनन्य प्रेम को दर्शाया गया है। जिस प्रकार मोर बादलों से और चकोर चंद्रमा से मोहित होता है, वैसे ही भक्त का मन भी पूर्ण रूप से अपने आराध्य में लीन रहता है|
(ख) "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।"
·
अर्थ: कवि कहते हैं कि मुझे तीर्थ यात्रा करने या कठिन व्रत रखने में कोई
विश्वास (संदेह रहित होकर) नहीं है। मुझे इन बाहरी दिखावों की आवश्यकता नहीं है
क्योंकि मुझे केवल आपके चरण-कमलों पर ही पूरा भरोसा है।
·
भाव: यहाँ रैदास जी ने बाह्य आडंबरों और कर्मकांडों का खंडन किया है। उनका भाव
यह है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए कहीं बाहर भटकने की ज़रूरत नहीं है; उनके चरणों में सच्ची श्रद्धा और अटूट विश्वास ही काफी है।
मेरी
समझ मेरे विचार-
नीचे
दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
1. "जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ"
पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते
हैं? विस्तार
से लिखिए।
उत्तर -"जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ" पंक्ति संत रैदास की अटूट भक्ति और दृढ़ निश्चय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस पंक्ति के माध्यम से रैदास जी ने
अपनी निष्ठा के कई गहरे पहलुओं को उजागर किया है:
1. एकतरफा और निःस्वार्थ प्रेम: रैदास जी कहते हैं कि हे राम, यदि आप मुझसे अपना नाता तोड़ भी लें, तो भी मैं आपसे अपना संबंध कभी नहीं
तोड़ूँगा। यह दर्शाता है कि उनकी भक्ति किसी 'सौदे' पर आधारित नहीं है। वे ईश्वर से बदले
में कुछ नहीं चाहते, बस उनसे जुड़े रहना चाहते हैं।
2. दृढ़ आत्मविश्वास: यहाँ भक्त की शक्ति उसके अहंकार में
नहीं, बल्कि उसके समर्पण में है। वे इतने आत्मविश्वास से भरे हैं कि उन्हें पता है कि उनके
जीवन का आधार केवल राम ही हैं। जैसे मछली जल से अलग होकर जीवित नहीं रह सकती, वैसे ही रैदास का अस्तित्व उनके
आराध्य से ही है।
3. अनन्य भाव: रैदास जी के लिए राम के अलावा अन्य कोई शरण या ठिकाना नहीं है। वे
सांसारिक संबंधों की नश्वरता को जानते हैं, इसलिए वे एक ऐसे 'अविनाशी' संबंध की बात करते हैं जो समय या
परिस्थिति के साथ बदलता नहीं है।
4. लगाव की पराकाष्ठा: यह पंक्ति दर्शाती है कि जब भक्ति
परिपक्व हो जाती है, तो भक्त अपने आराध्य के व्यवहार पर निर्भर नहीं रहता। ईश्वर चाहे
कृपा करें या परीक्षा लें, भक्त की निष्ठा अडिग रहती है।
निष्कर्ष: इस पंक्ति का मूल भाव यह है कि सच्चा भक्त अपने आराध्य के प्रति इतना समर्पित होता है कि वह स्वयं को ईश्वर से अलग देख ही नहीं पाता। यह 'अद्वैत' संबंध की ओर इशारा करता है जहाँ भक्त और भगवान एक हो जाते हैं।
2. रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके
विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?
उत्तर - संत रैदास ने तीर्थ-यात्रा और व्रत जैसे बाहरी कर्मकांडों के स्थान पर 'ईश्वर के चरणों में
अटूट विश्वास' और 'आंतरिक प्रेम' को भक्ति का प्रमुख आधार माना है। उनके अनुसार, ईश्वर कहीं
बाहर मंदिरों या तीर्थों में नहीं, बल्कि मनुष्य के मन के भीतर बसते हैं। इसलिए, मन की पवित्रता
और निरंतर नाम-स्मरण ही सच्ची भक्ति है।
मेरे विचार से भक्ति के निम्नलिखित
आधार हो सकते हैं:
1.
निर्मल मन: भक्ति का सबसे बड़ा
आधार हृदय की शुद्धता है। जब मन में लालच, द्वेष या अहंकार नहीं होता, तभी ईश्वर का वास होता है।
2.
मानवता की सेवा: "नर सेवा ही नारायण सेवा है।" दीन-दुखियों की मदद करना और
जीवों पर दया करना भक्ति का एक व्यावहारिक रूप है।
3.
समर्पण भाव: अपने कर्मों को
ईश्वर को समर्पित कर देना और फल की चिंता न करना भक्ति को सुदृढ़ बनाता है।
4.
सदाचार और ईमानदारी: अपने कर्तव्यों का
पूरी ईमानदारी से पालन करना भी एक प्रकार की प्रार्थना ही है।
5.
अद्वैत संबंध: ईश्वर को अपना
मित्र, मार्गदर्शक या आधार मानकर उनसे एक व्यक्तिगत और गहरा मानसिक संबंध
बनाना।
संक्षेप में, भक्ति किसी दिखावे का नाम नहीं, बल्कि सत्य और प्रेम के मार्ग पर चलने का नाम है।
3. दोनों पदों में भक्त और आराध्य के सबंध को
किन-किन प्रतीकों/उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।
संत रैदास ने अपने पदों में भक्त और
आराध्य के गहरे संबंध को दर्शाने के लिए प्रकृति और दैनिक जीवन से जुड़े
अत्यंत सुंदर प्रतीकों और उपमाओं का प्रयोग किया है। इनका विवरण इस
प्रकार है:
1. चंदन और पानी: प्रभु 'चंदन' हैं और भक्त 'पानी' है। जैसे पानी में मिलकर चंदन अपनी
सुगंध बिखेर देता है, वैसे ही भक्त प्रभु की भक्ति में समाकर सुगंधित हो जाता है।
2. बादल (घन) और मोर: प्रभु आकाश में छाए 'बादल' हैं और भक्त उन्हें देखकर झूमने वाला 'मोर' है। यह ईश्वर को देखकर भक्त की
प्रसन्नता को दर्शाता है।
3. चंद्रमा और चकोर: प्रभु 'चाँद' हैं और भक्त 'चकोर' पक्षी है जो बिना पलक झपकाए अपने
आराध्य को निहारता रहता है। यह एकनिष्ठ प्रेम का प्रतीक है।
4. दीपक और बाती: प्रभु 'दीपक' हैं और भक्त उसकी 'बाती' है। जैसे बाती जलकर प्रकाश फैलाती है, वैसे ही भक्त की भक्ति संसार को
आलोकित करती है।
5. मोती और धागा: प्रभु बहुमूल्य 'मोती' हैं और भक्त वह 'धागा' है जिसमें मोती पिरोए जाते हैं। यह
दोनों के जुड़ाव और एकाकार होने को व्यक्त करता है।
6. सोना और सुहागा: प्रभु 'सोना' हैं और भक्त 'सुहागा' (सोने को शुद्ध करने वाला तत्व) है। यह
दर्शाता है कि ईश्वर के संपर्क में आकर भक्त का व्यक्तित्व निखर और शुद्ध हो जाता
है।
7. स्वामी और दास: अंत में रैदास स्वयं को 'दास' (सेवक) और प्रभु को अपना 'स्वामी' कहते हैं। यह पूर्ण समर्पण और सेवा
भाव का प्रतीक है।
अर्थात
चंदन और पानी - एकाकार होने का प्रतीक
बादल और मोर - प्रेम और व्याकुलता का
प्रतीक
चंद्रमा और चकोर - एकाग्र और निरंतर दृष्टि का प्रतीक
दीपक और बाती - जीवन को आलोकित करने वाले अटूट संबंध का प्रतीक
मोती और धागा - परस्पर पूरकता का प्रतीक
सोना और सुहागा - परिष्कार और शुद्धि का प्रतीक
प्रभु के चरण कमल - सच्चे आश्रय का प्रतीक
विधा
से संवाद
कविता
का सौंदर्य
" अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
1. अनुप्रास अलंकार
जब किसी पंक्ति में एक ही वर्ण की
आवृत्ति (दोहराव) बार-बार होती है, तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
·
उदाहरण: "अब कैसे छूटै राम रट लागी" (यहाँ 'र' वर्ण की आवृत्ति है)।
2. उपमा अलंकार
जहाँ एक वस्तु की तुलना दूसरी
प्रसिद्ध वस्तु से की जाती है (इसमें 'जैसे', 'सा', 'समान' शब्दों का प्रयोग होता है)।
- उदाहरण: "जैसे चितवत चंद चकोरा।"
(यहाँ भक्त की तुलना चकोर पक्षी से और प्रभु की तुलना चंद्रमा से की गई है।) - उदाहरण: "प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा।"
(यहाँ प्रभु की तुलना बादलों से और भक्त की मोर से की गई है।)
3. रूपक अलंकार
जहाँ उपमेय और उपमान में कोई भेद न
रहे (यानी एक वस्तु को दूसरी वस्तु का रूप ही दे दिया जाए)।
- उदाहरण: "तुम्हरे चरन
कमल एक
भरोसा।"
(यहाँ चरणों को ही 'कमल' का रूप दे दिया गया है, यानी कमल रूपी चरण।)
कविता
की कुछ अन्य विशेषताएँ
नीचे
दी गई सूची को ध्यान से देखिए। इस सूची में रैदास के दोनों पदों से कुछ विशेषताएँ
चुनकर दी गई हैं। पदों में से चुनकर इन विशेषताओं को दर्शाती पंक्तियाँ लिखिए।
उदाहरण के लिए पहली विशेषता के सामने पंक्ति दी गई है।
विशेषताएँ - अनन्य भक्ति भाव
उदाहरण-
"जो
तुम तोरी राम मैं नहिं तोरी, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।"
विशेषताएँ
-सरल और लोकधर्मी भाषा
उदाहरण -"अब कैसे छूटै राम रट लागी। प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।"
(व्याख्या: यहाँ 'पानी', 'बाणी', 'बास' जैसे सरल तद्भव शब्दों का प्रयोग है जो आम जनमानस
की भाषा है।)
विशेषताएँ -उपमा और तुलना
उदाहरण - "प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।"
(व्याख्या: यहाँ भक्त की तुलना मोर और चकोर से तथा
ईश्वर की तुलना बादल और चंद्रमा से की गई है।)
विशेषताएँ लयात्मकता और गेयता/ध्वन्यात्मकता
उदाहरण - "नरहरि चंचल है मति मेरी, कैसे भगति करूँ मैं तेरी।" या "प्रभु
जी तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै
दिन राती।"
(व्याख्या: 'बाती-राती', 'पानी-समानी' जैसे तुकांत शब्दों (Rhyming
words) के कारण इन पदों को
सुगमता से गाया जा सकता है।)
विशेषताएँ -दृढ़ निष्ठा और आस्था
उदाहरण - "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन
कमल एक भरोसा।"
(व्याख्या: यह पंक्ति ईश्वर के चरणों में भक्त के
अटूट विश्वास और बाहरी कर्मकांडों के त्याग को दर्शाती है।)
विषयों
से संवाद
1. तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने
आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार
आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए
कि इसके क्या कारण हो सकते हैं? (संकेत- आप अपने सामाजिक विज्ञान के
शिक्षक की सहायता भी ले सकते हैं।)
उत्तर- भक्तिकाल के कवि रैदास और कबीर द्वारा बाह्य आडंबरों (तीर्थ, व्रत, मूर्ति पूजा) के स्थान पर निराकार
भक्ति और आंतरिक शुद्धि पर बल देने के पीछे कई महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक कारण थे:
1. सामाजिक ऊँच-नीच और भेदभाव: उस समय समाज जाति-पाति और छुआछूत की
बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। निम्न जातियों को मंदिरों में प्रवेश और शास्त्रों को
पढ़ने की अनुमति नहीं थी। ऐसे में रैदास और कबीर ने एक ऐसे 'निराकार ईश्वर' की बात की, जो किसी मंदिर की चारदीवारी में नहीं
बल्कि हर मनुष्य के मन में रहता है। इससे समाज के उपेक्षित वर्ग को ईश्वर से सीधे
जुड़ने का मार्ग मिला।
2. धार्मिक पाखंड का विरोध: तत्कालीन समाज में धर्म के नाम पर
अंधविश्वास, कर्मकांड और जटिल अनुष्ठान हावी थे। पंडे-पुजारी और मौलवी आम जनता
को भ्रमित कर रहे थे। कबीर और रैदास ने यह संदेश दिया कि ईश्वर को पाने के लिए धन
या तीर्थ यात्रा की नहीं, बल्कि 'सच्चे प्रेम' और 'पवित्र मन' की आवश्यकता है।
- सांस्कृतिक समन्वय (हिन्दू-मुस्लिम एकता): निराकार ईश्वर (निर्गुण
ब्रह्म) की अवधारणा ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के कट्टरपंथ को चुनौती
दी। निराकार ईश्वर की भक्ति एक ऐसा साझा मंच था जहाँ दोनों धर्मों के लोग एक
साथ आ सकते थे, क्योंकि
इसमें न तो मूर्ति थी और न ही किसी विशेष धर्म का विशेष अधिकार।
- भक्ति का सरलीकरण: संस्कृत भाषा और जटिल
धार्मिक विधियाँ आम आदमी की पहुँच से बाहर थीं। रैदास और कबीर ने लोकभाषा
(सधुक्कड़ी/ब्रज/अवधी) में अपनी बात कही और भक्ति को इतना सरल बना दिया कि एक
आम मज़दूर या किसान भी अपने काम को करते हुए (जैसे रैदास जूते गाँठते हुए और
कबीर कपड़ा बुनते हुए) ईश्वर का नाम ले सके।
निष्कर्ष: इन संतों का मुख्य
उद्देश्य समाज में समानता, भाईचारा और नैतिकता की स्थापना करना था। उन्होंने यह
सिद्ध किया कि सच्ची तीर्थ यात्रा मन की पवित्रता है, न कि किसी विशेष स्थान की यात्रा।
2.
"सोने मिलत सुहागा"
'सुहागा' एक प्राकृतिक खनिज है जिसके प्रयोग से
सोने की अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और उसकी चमक बढ़ जाती है। 'सुहागा' का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ
अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।
रासायनिक नाम और सूत्र
·
रासायनिक नाम: सोडियम टेट्राबोरेट
डेकाहाइड्रेट (Sodium Tetraborate
Decahydrate)
·
रासायनिक सूत्र:
2. मुख्य विशेषताएँ -
विज्ञान की दृष्टि से इसकी निम्नलिखित
विशेषताएँ इसे खास बनाती हैं:
·
फ्लक्स (Flux) के रूप में कार्य: सुहागा एक बेहतरीन 'फ्लक्स' है। जब इसे सोने के साथ गर्म किया
जाता है, तो यह धातु की सतह पर मौजूद ऑक्साइड्स और अन्य अशुद्धियों को सोख
लेता है और उन्हें अलग कर देता है, जिससे शुद्ध सोना प्राप्त होता है।
प्रकृति : यह एक सफेद क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ है
जो पानी में आसानी से घुल जाता है। इसकी प्रकृति क्षारीय होती है।
भाषा
से संवाद
व्याकरण
की बात
शब्दों
की बात
1. पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के
तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।
संज्ञा के उदाहरण:
1.
चंदन (द्रव्यवाचक संज्ञा)
2.
पानी (द्रव्यवाचक संज्ञा)
3.
मोरा (जातिवाचक संज्ञा -
मोर)
सर्वनाम के उदाहरण:
1.
तुम (मध्यम पुरुषवाचक
सर्वनाम - प्रभु के लिए प्रयुक्त)
2.
हम (उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम - भक्त/स्वयं
के लिए प्रयुक्त)
3.
जाकी (संबंधवाचक सर्वनाम
- जिसकी ज्योति के संदर्भ में)
क्या आप इन पदों में प्रयुक्त विशेषण शब्दों या ब्रजभाषा के कुछ
2.
रैदास के इन दोनों पदों में बहुत तसे से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जिनके स्थान पर
अन्य शब्दों का प्रयोग होता है। नीचे सूची में दिए गए शब्दों को देखिए। आप या आपके
आस-पास के लोग इन शब्दों के लिए किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए।
मोरा, चकोरा, बाती, राती, सोने, तीरथ, बरत
उत्तर- रैदास जी के पदों में प्रयुक्त ये
शब्द मुख्य रूप से तद्भव या क्षेत्रीय बोलियों के हैं। आज के समय में हमारे आस-पास
इन शब्दों के लिए निम्नलिखित मानक हिंदी या प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया जाता
है:
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मूल शब्द (पद से) |
प्रचलित/आधुनिक शब्द |
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मोरा |
मोर |
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चकोरा |
चकोर पक्षी |
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बाती |
बत्ती |
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राती |
रात |
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सोने |
स्वर्ण या सोना |
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तीरथ |
तीर्थ |
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बरत |
व्रत |
1.
कक्षा में समूह बनाकर इन दोनों पदों को…
2.
कल्पना कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे
हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।
भक्त और आराध्य का संवाद
1. प्रभु: प्रिय भक्त, तुम मुझे पाने के लिए इतनी व्याकुलता क्यों दिखाते हो?
भक्त: प्रभु, मैं आपके बिना अधूरा हूँ। आप चंदन हैं, तो मैं पानी हूँ। जैसे पानी
चंदन में समा जाता है, वैसे ही
मैं आपमें समाकर ही पूर्ण होता हूँ।"
प्रभु: पर क्या तुम्हें यह एकाकार होना
कष्टकारी नहीं लगता?
भक्त: बिल्कुल नहीं! जैसे चंदन के संपर्क में आने से अंग-अंग में सुगंध
बस जाती है, वैसे ही आपकी भक्ति ने मेरे मन की दुर्गंध मिटा दी है।
प्रभु: और वह जो तुम रात
भर जागकर मुझे निहारते हो?
भक्त: वह तो मेरा सहज स्वभाव है। आप चंद्रमा हैं और मैं चकोर। जैसे चकोर की आँखें चाँद से नहीं हटतीं, वैसे ही मेरा ध्यान आप पर ही टिका
रहता है।
प्रभु: भक्त, संसार तो बहुत अंधकारमय है, तुम वहाँ कैसे टिकोगे?
भक्त: प्रभु, आप दीपक बनकर मार्ग दिखाएंगे और मैं बाती बनकर जलता रहूँगा।
जब तक आपकी कृपा की ज्योति मुझमें जलेगी, तब तक कोई भी अंधेरा मेरा पथ नहीं रोक
सकता।
प्रभु: (मुस्कुराते हुए)
तुम्हारी यह अटूट निष्ठा ही तुम्हें मुझमें विलीन करती है।
भक्त: सत्य है प्रभु! आप सोना हैं और मैं सुहागा। आपके सान्निध्य ने मुझ जैसे तुच्छ
जीव को भी अनमोल और शुद्ध बना दिया है।
3.
"जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरी" पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर
एक लघुकथा तैयार कीजिए।
कथा का शीर्षक: अटूट धागा
एक गाँव में 'माधव' और 'राघव' नाम के दो घनिष्ठ मित्र रहते थे। राघव
एक संपन्न परिवार से था, जबकि माधव बहुत ही साधारण जीवन जीता था। समय का चक्र घूमा और राघव
के परिवार पर संकट के बादल छा गए। व्यापार में भारी घाटे के कारण उसे अपना सब कुछ
बेचना पड़ा।
समाज के लोगों ने राघव का साथ छोड़
दिया। राघव को लगा कि शायद अब माधव भी उसे भूल जाएगा। एक दिन राघव ने निराशा में
माधव से कहा, "दोस्त, अब मेरे पास तुम्हें देने के लिए न प्रतिष्ठा है और न धन। अच्छा
होगा कि तुम मुझसे नाता तोड़ लो, वरना समाज तुम्हें भी नीची नज़र से देखेगा।"
माधव मुस्कुराया और शांत स्वर में
बोला, "राघव, क्या तुमने रैदास जी की वह पंक्ति नहीं सुनी— 'जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ'? यदि आज तुम विपत्ति के डर से यह
मित्रता तोड़ भी दो, तो भी मैं इसे नहीं तोड़ूँगा। मेरा रिश्ता तुम्हारी परिस्थितियों
से नहीं, तुम्हारी आत्मा से है।"
माधव ने अपनी जमा-पूंजी राघव के सामने
रख दी और दिन-रात मेहनत करके उसे फिर से खड़ा होने में मदद की। उसने सिद्ध कर दिया
कि सच्ची मित्रता किसी 'लेन-देन' पर नहीं, बल्कि अटूट निष्ठा पर टिकी होती है।
शिक्षा: परिस्थितियाँ रिश्तों को परखती हैं, लेकिन जो मन से जुड़े होते हैं, उन्हें कोई भी अभाव अलग नहीं कर सकता।
झरोखे से
आपने
रैदास के पद पढ़े। अब आप रैदास की तरह ही महाराष्ट्र के संत कवि नामदेव के आगे दिए
गए दो पद पढ़िए। निर्गुण संत काव्य परंपरा के संत कवि नामदेव का जन्म 13वीं-14वीं
शताब्दी में महाराष्ट्र में हुआ। अन्य संत कवियों की भाँति नामदेव ने भी बाह्य
आडंबरों, सामाजिक
रूढ़ियों का विरोध कर सामाजिक समरसता, प्रेम एवं निराकार भक्ति से संबंधित
पदों की रचना की है।
संत नामदेव और संत रैदास दोनों ही निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख स्तंभ हैं, और उनके विचारों में अद्भुत समानता
देखने को मिलती है।
चूँकि आपने संत नामदेव का परिचय दिया है, तो उनके पदों को पढ़ते समय आप इन तीन मुख्य बिंदुओं पर ध्यान दे सकते हैं जो उन्हें रैदास
जी से जोड़ते हैं:
1. अद्वैत भाव: जैसे रैदास ने 'चंदन-पानी' के माध्यम से भक्त और भगवान को एक माना, नामदेव भी मानते हैं कि ईश्वर और
मनुष्य के बीच कोई भेद नहीं है।
2. लोकभाषा का प्रयोग: नामदेव के पदों की भाषा भी बहुत सरल
और हृदयस्पर्शी है, जो सीधे आम आदमी से जुड़ती है।
3. कर्मकांड का विरोध: नामदेव भी स्पष्ट कहते हैं कि तीर्थों
और मूर्तियों में ईश्वर को ढूँढने के बजाय उन्हें अपने भीतर और संपूर्ण सृष्टि
(घट-घट) में देखना चाहिए।
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