तीसरी कसम के शिल्पकार || Sparsh || स्पर्श || कक्षा 10 || कवि परिचय || सार || प्रश्नोंउत्तर || Kavi Parichay || Summary || Question Answer || Class 10
'तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र'
लेखक: प्रह्लाद अग्रवाल
सारांश:
'तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र' एक भावपूर्ण संस्मरण है, जो प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र द्वारा
निर्मित एकमात्र फिल्म 'तीसरी कसम' के निर्माण, उनकी संवेदनशीलता और कला के प्रति निष्ठा को रेखांकित करता है। यह
फिल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफाम' पर आधारित थी, जो ग्रामीण जीवन की सहजता को दिखाती है।
लेखक ने शैलेंद्र को एक ऐसा 'शिल्पकार' कहा है जिसने अपनी भावनाओं से एक
अद्भुत कृति गढ़ी।
जिस प्रकार एक कविता में भावनाओं की
गहराई, कोमलता और संवेदना होती है, वैसे ही 'तीसरी कसम' फिल्म को शैलेंद्र ने रील पर उतरी हुई
व्यावसायिक
सिनेमा के शोर-शराबे से दूर
एक भावपूर्ण कविता की तरह बनाया था इसलिए उन्होने इस
फिल्म को "सेल्यूलाइड पर लिखी कविता"कहा है।
शैलेंद्र स्वभाव से एक बेहद भावुक, ईमानदार और आदर्शवादी कवि थे। वे
फिल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध में रहकर भी कभी अपनी जड़ों और सादगी से दूर नहीं हुए।
उनके गीत हमेशा करुणा और मनुष्यता का संदेश देते थे।
फिल्म निर्माण का जोखिम-
जब शैलेंद्र ने फिल्म बनाने का फैसला किया, तो उनके करीबी दोस्त राज कपूर ने
उन्हें फिल्म निर्माण को लेकर आगाह किया कि यह फिल्म उन्हें आर्थिक रूप से डुबो
सकती है।लेकिन शैलेंद्र ने इस फिल्म को यश या धनलिप्सा के लिए नहीं, बल्कि आत्म-संतुष्टि के लिए बनाई गई 'कला' की तरह बनाया। उन्होंने फिल्म में कोई
भी ऐसा 'मसाला' नहीं डाला जो उस समय की फिल्मों के सफल होने के लिए जरूरी माना
जाता था। राज कपूर जैसे महान अभिनेता ने 'हीरामन' (एक भोला-भाला देहाती गाड़ीवान) का ऐसा
अभिनय किया जो उनके पूरे करियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय बना। वहीदा रहमान ने 'हीराबाई' के किरदार में जान डाल दी। फिल्म का
संगीत भी मिट्टी की खुशबू और लोक संवेदनाओं से जुड़ा था।
फिल्म जगत की कड़वी सच्चाई:
फिल्म बनकर तैयार हुई तो यह कला की दृष्टि से बेमिसाल थी, गीत भी काफी लोकप्रिय हो चुके थे बावजूद
इसके फिल्म जगत के 'वितरकों' (Distributors) ने इसे खरीदने से मना कर दिया क्योंकि इसमें चकाचौंध और मसाला कम
था।इसके बावजूद फिल्म 'तीसरी कसम' को कई पुरस्कारों और सम्मान से नवाजा गया-
1.
राष्ट्रपति स्वर्ण पदक (National Film Award): इस फिल्म को भारतीय
सिनेमा का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान 'राष्ट्रपति स्वर्ण पदक' प्रदान किया गया। यह इस बात का प्रमाण
था कि फिल्म कलात्मक रूप से बेहद उत्कृष्ट थी।
2.
बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन
अवार्ड्स: इस फिल्म को 'वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म' का पुरस्कार मिला और इसके साथ ही कई
अन्य श्रेणियों (जैसे सर्वश्रेष्ठ निर्देशन) में भी सम्मानित किया गया।
3.
मास्को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल: यह फिल्म
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराही गई और इसे मास्को फिल्म फेस्टिवल में नामांकित (Nominate) किया गया था।
इस प्रकार यह पाठ हमें सिखाता है कि
एक सच्चा कलाकार कभी भी अपनी कला के साथ समझौता नहीं करता, भले ही उसे इसके लिए कोई भी कीमत
चुकानी पड़े।
FLOWCHART
मौखिक
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो
पंक्तियों में दीजिए-
प्रश्न 1.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को कौन-कौन से
पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?
उत्तर-
राष्ट्रपति स्वर्णपदक से सम्मानित।
बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म को पुरस्कार।
मास्को फ़िल्म फेस्टिवल में भी यह पुरस्कृत हुई।
प्रश्न 2.
शैलेंद्र ने कितनी फ़िल्में बनाई?
उत्तर-
शैलेंद्र ने अपने जीवन में केवल एक ही फ़िल्म का निर्माण किया।
‘तीसरी कसम’ ही उनकी पहली व अंतिम फ़िल्म थी।
प्रश्न 3.
राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ
फ़िल्मों के नाम बताइए।
उत्तर-
‘मेरा नाम जोकर’
‘अजन्ता’
‘मैं और मेरा दोस्त’
‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’
‘संगम’
‘प्रेमरोग’
प्रश्न 4.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म के नायक व
नायिकाओं के नाम बताइए और फ़िल्म में इन्होंने किन पात्रों का अभिनय किया है?
उत्तर-
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म के नायक राजकपूर
और नायिका वहीदा रहमान थी। राजकपूर ने हीरामन गाड़ीवान का अभिनय किया है और वहीदा
रहमान ने नौटंकी कलाकार ‘हीराबाई’ का अभिनय किया है।
प्रश्न 5.
फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण किसने
किया था?
उत्तर-
शिल्पकार शैलेंद्र ने।
प्रश्न 6.
राजकपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ के
निर्माण के समय किस बात की कल्पना भी नहीं की थी?
उत्तर-
राजकपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ के
निर्माण के समय कल्पना भी नहीं की थी कि फ़िल्म के पहले भाग के निर्माण में ही छह
साल का समय लग जाएगा।
प्रश्न 7.
राजकपूर की किस बात पर शैलेंद्र का
चेहरा मुरझा गया?
उत्तर-
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म की कहानी सुनकर
राजकपूर ने पारिश्रमिक एडवांस देने की बात कही। इस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा
गया।
प्रश्न 8.
फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को किस तरह
का कलाकार मानते थे?
उत्तर-
फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को कला-मर्मज्ञ
एवं आँखों से बात करनेवाला कुशल अभिनेता मानते थे।
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-
प्रश्न 1.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को ‘सैल्यूलाइड पर
लिखी कविता’ क्यों कहा गया है?
उत्तर- जिस प्रकार एक कविता में भावनाओं की गहराई और कोमलता होती है, उसी प्रकार इस फिल्म में भी कोई बनावटीपन या व्यावसायिक मसाला नहीं था। शैलेंद्र ने फिल्म की रील (सेल्यूलाइड) पर ग्रामीण जीवन की सादगी, प्रेम और करुणा को एक कविता की तरह पिरोया था, इसलिए इसे यह संज्ञा दी गई।
दीर्घ उत्तर-
तीसरी कसम फिल्म को "सेल्यूलाइड पर लिखी कविता" इसलिए कहा गया है क्योंकि यह फिल्म आम कहानी कहने की बजाय एक दिल छू लेने वाली कविता की तरह भावुकता, संवेदना और मार्मिकता से परिपूर्ण है।सेल्यूलाइड का मतलब है- कैमरे की रील, और इस फिल्म ने हिंदी साहित्य की एक अत्यंत भावपूर्ण कहानी को हु-ब-हु कैमरे की सहायता से परदे पर उतार कर चलचित्र के रूप में पेश किया। इस फिल्म में कवि शैलेंद्र की वह संवेदनशीलता और भावना झलकती है, जो इसे फिल्म न होकर परदे पर लिखी हुई कविता बनाती है।इसलिए कहा जाता है कि "तीसरी कसम" एक ऐसी फिल्म है जो भावना और कला से भरी हुई है, जिसे कोई भी साधारण फिल्म नहीं बल्कि सेल्यूलाइड पर लिखी कविता कहा जा सकता है।
प्रश्न 2. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को खरीददार क्यों नहीं मिल रहे थे?
उत्तर- फिल्म "तीसरी कसम" को खरीदार इसलिए नहीं मिल रहे थे क्योंकि यह एक सामान्य मनोरंजक फिल्म नहीं थी, बल्कि एक उच्च कोटि की साहित्यिक और भावना प्रधान फिल्म थी। इस फिल्म में पैसे वसूल करने के लिए आवश्यक अनावश्यक मसाले नहीं थे, और इसमें रची-बसी करुणा तराजू पर तौली जा सकने वाली चीज़ नहीं थी। इसलिए फिल्म के वितरक इसे समझ नहीं पा रहे थे तथा इसे आर्थिक रूप से लाभकारी मान नहीं रहे थे।
साथ ही शैलेंद्र की यह फिल्म यश या धनलिप्सा के लिए नहीं, बल्कि आत्म-संतुष्टि के लिए बनाई गई थी, जो इस फिल्म की असफलता का एक कारण था।
प्रश्न 3.
शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का
कर्तव्य क्या है?
उत्तर-
शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का
कर्तव्य है कि वह उपभोक्ताओं की रुचियों को परिष्कार करने का प्रयत्न करे। उसे
दर्शकों की रुचियों की आड़ में सस्तापन/उथलापन नहीं थोपना चाहिए। उसके अभिनय में
शांत नदी का प्रवाह तथा समुद्र की गहराई की छाप छोड़ने की क्षमता होनी चाहिए।
प्रश्न 4.
फ़िल्मों में त्रासद स्थितियों का
चित्रांकन ग्लोरिफाई क्यों कर दिया जाता है?
उत्तर- फिल्मों में त्रासद स्थितियों को ग्लोरिफाई इसलिए किया जाता है ताकि दर्शक दर्द में भी सौंदर्य और अर्थ महसूस कर सकें,उनके मन में गहरी भावनात्मक छाप छोड़ी जा सके। दुख और पीड़ा को इस तरह दिखाया जाता है कि वह केवल दुःख न रहकर मानवता, प्रेम और त्याग का प्रतीक बन जाए।
‘तीसरी कसम’ फिल्म में नायक हीरामन का जीवन संघर्ष और उसका सच्चा प्रेम दुखद होने के बावजूद पवित्र और सुंदर प्रतीत होता है।
प्रश्न 5.
‘शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को
शब्द दिए हैं’- इस कथन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
‘शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को
शब्द दिए हैं -का आशय है-
- अद्भुत तालमेल: राज कपूर एक महान अभिनेता और निर्देशक थे जो दृश्यों के माध्यम से भावनाओं को व्यक्त करना जानते थे, जबकि शैलेंद्र एक महान कवि थे। शैलेंद्र, राज कपूर के मन के भावों और उनके संदेशो को इतनी सटीकता से समझते थे कि उन्होने उन्हें गीतों के रूप में ढाल दिया।
- व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति: राज कपूर पर्दे पर जिस 'आम आदमी' का प्रतिनिधित्व करते थे, उसकी मासूमियत, संघर्ष और आशाओं को शैलेंद्र ने ही अपने शब्दों से जीवंत किया।
- एक-दूसरे के पूरक: राज कपूर के पास अभिनय कौशल था और शैलेंद्र के पास उन भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सबसे उपयुक्त शब्द। निष्कर्षतः शैलेंद्र के शब्द राज कपूर के अभिनय और निर्देशन की भावनाओं का आधार थे।
प्रश्न 6.
लेखक ने राजकपूर को एशिया का सबसे
बड़ा शोमैन कहा है। शोमैन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
शोमैन का अर्थ है-प्रसिद्ध
प्रतिनिधि-आकर्षक व्यक्तित्व। ऐसा व्यक्ति जो अपने कला-गुण, व्यक्तित्व तथा आकर्षण के कारण सब जगह प्रसिद्ध हो। राजकपूर अपने
समय के एक महान फ़िल्मकार थे। (एशिया में उनके निर्देशन में अनेक फ़िल्में
प्रदर्शित हुई थीं।) उन्हें एशिया का सबसे बड़ा शोमैन इसलिए कहा गया है क्योंकि
उनकी फ़िल्में शोमैन से संबंधित सभी मानदंडों पर(अभिनय कौशल/जीवंत अभिनय)खरी उतरती थीं।
प्रश्न 7.
फ़िल्म ‘श्री 420′ के गीत ‘रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार
जयकिशन ने आपत्ति क्यों की?
उत्तर-
संगीतकार जयकिशन ने गीत ‘रातें दसों
दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर आपत्ति इसलिए की, क्योंकि उनका ख्याल था कि दर्शक चार दिशाएँ तो समझते हैं और समझ
सकते हैं, लेकिन दस दिशाओं का गहन ज्ञान दर्शकों को नहीं होगा।
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए-
प्रश्न 1.
राजकपूर द्वारा फ़िल्म की असफलता के
खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फ़िल्म क्यों बनाई?
उत्तर-
राजकपूर एक परिपक्व फ़िल्म-निर्माता
थे तथा शैलेंद्र के मित्र थे। अतः उन्होंने एक सच्चा मित्र होने के नाते शैलेंद्र
को फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह भी किया था, लेकिन शैलेंद्र ने
फिर भी ‘तीसरी कसम’ फिल्म बनाई, क्योंकि उनके मन में इस फिल्म को
बनाने की तीव्र इच्छा थी। वे तो एक भावुक कवि थे, इसलिए अपनी
भावनाओं की अभिव्यक्ति इस फ़िल्म में करना चाहते थे। उन्हें धन लिप्सा की नहीं, बल्कि आत्म-संतुष्टि की लालसा थी इसलिए उन्होंने यह फिल्म बनाई।
प्रश्न 2.
‘तीसरी कसम’ में राजकपूर का महिमामय
व्यक्तित्व किस तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
प्रश्न 3.
लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि ‘तीसरी
कसम’ ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है?
उत्तर-
प्रश्न 4.
शैलेंद्र के गीतों की क्या विशेषता
है? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
- भावुकता और सादगी: शैलेंद्र के गीत सरल शब्दों में गहरी संवेदनाएँ व्यक्त करते थे। उनमें बनावटीपन नहीं बल्कि दिल को छू लेने वाली सच्चाई होती थी।
- करुणा और मनुष्यता: उनके गीतों में जीवन की पीड़ा, करुणा और आम आदमी के प्रति सहानुभूति झलकती थी। वे मनुष्य के भीतरी सुख-दुख को शब्दों में पिरोने के माहिर थे।
- दार्शनिक गहराई: उनके गीत केवल मनोरंजन के लिए नहीं होते थे, बल्कि उनमें जीवन का कोई न कोई गहरा दर्शन छुपा होता था, जैसे— "सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है"।।
- लोक-संस्कृति से जुड़ाव: शैलेंद्र ने अपने गीतों में भारतीय मिट्टी की महक और लोक-धुनों का सुंदर प्रयोग किया। उन्होंने जटिल से जटिल बात को भी बहुत आसान और सुरीले तरीके से पेश किया।
- उम्मीद और प्रेरणा: उनके गीत अक्सर मुश्किलों के बीच भी हार न मानने और जीवन की सुंदरता को देखने की प्रेरणा देते थे।
प्रश्न5 फ़िल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र
की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-एक फ़िल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- आदर्शवादी और कला-प्रेमी: शैलेंद्र ने फ़िल्म का निर्माण धन कमाने या व्यावसायिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपनी कलात्मक संतुष्टि और एक श्रेष्ठ साहित्यिक कृति को पर्दे पर उतारने के लिए किया था।
- साहित्य के प्रति निष्ठा: उन्होंने फणीश्वरनाथ 'रेणु' की मूल कहानी 'मारे गए गुलफाम' की आत्मा के साथ कोई समझौता नहीं किया। उन्होंने फ़िल्म में व्यावसायिक "मिर्च-मसाला" डालने के बजाय साहित्यिक शुद्धता और सादगी को बनाए रखा।
- दृढ़ निश्चयी: हालाँकि उनके मित्रों, विशेषकर राज कपूर ने उन्हें फ़िल्म निर्माण के जोखिमों के प्रति आगाह किया था, लेकिन वे अपने निर्णय पर अडिग रहे और एक उत्कृष्ट फ़िल्म बनाई।
- पारखी और संवेदनशील: एक निर्माता के रूप में उन्होंने कलाकारों (राज कपूर और वहीदा रहमान) से उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय करवाया। उन्होंने तकनीक और चकाचौंध के ऊपर मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं को प्राथमिकता दी।
- साहसी: उन्होंने उस दौर में एक ऐसी "लीक से हटकर" फ़िल्म बनाने का साहस दिखाया, जिसे वितरक खरीदने को तैयार नहीं थे, क्योंकि वे कला की वास्तविक कीमत जानते थे। संक्षेप में, शैलेंद्र एक ऐसे निर्माता थे जिन्होंने व्यापार पर कला की विजय को प्राथमिकता दी।
प्रश्न 6.
शैलेंद्र के निजी जीवन की छाप उनकी
फ़िल्म में झलकती है-कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
- आदर्शवादिता और सादगी: शैलेंद्र असल जिंदगी में बेहद सरल, ईमानदार और आदर्शवादी इंसान थे। उनके इसी स्वभाव के कारण फिल्म का नायक 'हीरामन' भी उतना ही भोला और छल-कपट से दूर दिखाया गया है।
- व्यावसायिकता का अभाव: जैसे शैलेंद्र ने कभी धन-दौलत और शोहरत के लिए अपनी कला से समझौता नहीं किया, वैसे ही उनकी फिल्म में भी कोई व्यापारिक 'मसाला' या बनावटीपन नहीं था।
- दुख और करुणा: शैलेंद्र का जीवन संघर्षपूर्ण था और वे बेहद संवेदनशील कवि थे। फिल्म में जो गहरी वेदना और करुणा दिखाई देती है, वह वास्तव में शैलेंद्र के अपने जीवन के अनुभवों की ही परछाई है। इस तरह कहा जा सकता है कि तीसरी कसम' शैलेंद्र के व्यक्तित्व का ही फिल्मी रूपान्तरण थी।
प्रश्न 7.
लेखक के इस कथन से कि ‘तीसरी कसम’
फ़िल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था, आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
मैं लेखक के इस कथन से पूरी तरह सहमत हू क्योंकि तीसरी कसम कोई साधारण व्यावसायिक फिल्म नहीं बल्कि संवेदनाओं का एक दस्तावेज है। इसके पीछे के कारण निम्नलिखित है-
- व्यापारिक सोच का अभाव: एक सामान्य फिल्म निर्माता हमेशा मुनाफे और 'मसाले' (मारधाड़, अश्लीलता) के बारे में सोचता है, लेकिन शैलेंद्र ने एक कवि की तरह केवल कहानी की आत्मा और उसकी शुद्धता पर ध्यान दिया।
- गहन संवेदनशीलता: फिल्म में हीरामन और हीराबाई के बीच के प्रेम को जिस पवित्रता और निश्छलता के साथ दिखाया गया है, वैसी सूक्ष्म पकड़ केवल एक भावुक कवि की ही हो सकती है।
- साहित्यिक गरिमा: शैलेंद्र ने फणीश्वरनाथ 'रेणु' की कहानी के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की। एक कवि ही दूसरे साहित्यकार की रचना के महत्व को समझ सकता है और उसे बिना किसी मिलावट के पर्दे पर उतारने का साहस कर सकता है।
- सादगी में सुंदरता: फिल्म का संगीत और दृश्य बहुत धीमे और गहरे हैं। यह ठहराव और गहराई केवल एक कवि-हृदय ही महसूस कर सकता है, जो शोर-शराबे के बजाय मौन की भाषा समझता हो।
(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए-
प्रश्न 1.
…. वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी
आत्मसंतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।
उत्तर-
इसका आशय है कि शैलेंद्र एक
आदर्शवादी भावुक हृदय कवि थे। उन्हें अपार संपत्ति तथा लोकप्रियता की कामना इतनी
नहीं थी, जितनी आत्मतुष्टि, आत्मसंतोष, मानसिक शांति, मानसिक सांत्वना आदि की थी, क्योंकि ये सद्वृत्तियाँ धन से नहीं खरीदी जा सकतीं, न ही इन्हें कोई भेंट कर सकता है। इन गुणों की अनुभूति तो अंदर से
ईश्वर की कृपा से ही होती है। इन्हीं अलौकिक अनुभूतियों से परिपूर्ण थे-शैलेंद्र, तभी तो वे आत्मतुष्टि चाहते थे।
प्रश्न 2.
उनका यह दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों
की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कर्तव्य
भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।
उत्तर-
एक आदर्शवादी उच्चकोटि के गीतकार व
कवि हृदय शैलेंद्र ने रुचियों की आड़ में कभी भी दर्शकों पर घटिया गीत थोपने का
प्रयास नहीं किया। फिल्में आज के दौर में मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम हैं। समाज
में हर वर्ग के लोग फिल्म देखते हैं और उनसे प्रभावित भी होते हैं। आजकल जिस
प्रकार की फ़िल्मों का निर्माण होता है। उनमें से अधिकतर इस स्तर की नहीं होती कि
पूरा परिवार एक साथ बैठकर देख सके। फ़िल्म निर्माताओं की भाँति वे दर्शकों की पसंद
का बहाना बनाकर निम्नस्तरीय कला अथवा साहित्य का निर्माण नहीं करना चाहते थे। उनका
मानना था कि कलाकार का दायित्व है कि वह दर्शकों की रुचि का परिष्कार करें। उनका
लक्ष्य दर्शकों को नए मूल्य व विचार प्रदान करना था।
प्रश्न 3.
व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।
उत्तर-
इसका अर्थ है कि व्यथा, पीड़ा, दुख आदि व्यक्ति को कमज़ोर या
हतोत्साहित अवश्य कर देते हैं, लेकिन उसे पराजित नहीं करते बल्कि
उसे मजबूत बनाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। हर व्यथा आदमी को जीवन की एक नई
सीख देती है। व्यथा की कोख से ही तो सुख का जन्म होता है इसलिए व्यथा के बाद, दुख के बाद आने वाला सुख अधिक सुखकारी होता है।
प्रश्न 4.
दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो
से चार बनाने वाले की समझ से परे है।
उत्तर-
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म गहरी संवेदनात्मक
तथा भावनात्मक थी। उसे अच्छी रुचियों वाले संस्कारी मन और कलात्मक लोग ही समझ-सराह
सकते थे। कवि शैलेंद्र की फ़िल्म निर्माण के पीछे धन और यश प्राप्त करने की
अभिलाषा नहीं थी। वे इस फ़िल्म के माध्यम से अपने भीतर के कलाकार को संतुष्ट करना
चाहते थे। इस फ़िल्म को बनाने के पीछे शैलेंद्र की जो भावना थी उसे केवल धन अर्जित
करने की इच्छा करने वाले व्यक्ति नहीं समझ सकते थे। इस फिल्म की गहरी संवेदना उनकी
समझ और सोच से ऊपर की बात है।
प्रश्न 5.
उनके गीत भाव-प्रवण थे- दुरूह नहीं।
उत्तर-
इसका अर्थ है कि शैलेंद्र के द्वारा
लिखे गीत भावनाओं से ओत-प्रोत थे, उनमें गहराई थी, उनके गीत जन सामान्य के लिए लिखे गए गीत थे तथा गीतों की भाषा सहज, सरल थी, क्लिष्ट नहीं थी, तभी तो आज भी इनके द्वारा लिखे गए गीत गुनगुनाए जाते हैं। ऐसा लगता
है, मानों हृदय को छूकर उसके अवसाद को दूर करते हैं।

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