ऐसी भी बातें होती हैं

 

 

यतींद्र मिश्र

 

यतींद्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी में एम.ए. किया। कविता, संगीत व अन्य ललित कलाओं के साथ-साथ समाज और संस्कृति के विविध क्षेत्रों में भी उनकी गहरी रुचि है।

यतींद्र मिश्र के तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं- यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, ड्योढ़ी पर आलाप। इसके अलावा उन्होंने शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत साधना पर एक पुस्तक गिरिजा लिखी। रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिधि कवि 'द्विजदेव' की ग्रंथावली (2000) का सह-संपादन किया। कुँवर नारायण पर केंद्रित दो पुस्तकों के अलावा स्पिक मैके के लिए विरासत-2001 के कार्यक्रम के लिए रूपंकर कलाओं पर केंद्रित थाती का संपादन भी किया। वे आजकल स्वतंत्र लेखन के साथ अर्द्धवार्षिक पत्रिका सहित का संपादन कर रहे हैं।

'मेरी आवाज़ ही पहचान है!' अपनी आवाज़ से भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने में अपनी पहचान बनाने वाली 'भारत रत्न' लता मंगेशकर संगीत के संसार का वह नाम हैं जिनके विषय में यदि बात न हो तो भारतीय संगीत की बात अधूरी रह जाएगी। इंदौर, मध्यप्रदेश में जन्मी लता मंगेशकर ने मात्र पाँच वर्ष की आयु में अपने पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली और जीवनपर्यंत संगीत के प्रति समर्पित रहीं।

जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव व संघर्षों के होते हुए भी लता मंगेशकर ने किस प्रकार संगीत और परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को निभाया, आइए पढ़ते हैं उनके साथ साक्षात्कार में...

 

 

ऐसी भी बातें होती हैं’ (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) – सारांश

ऐसी भी बातें होती हैं’ प्रसिद्ध लेखक यतीन्द्र मिश्र द्वारा लिया गया स्वर कोकिला लता मंगेशकर का एक साक्षात्कार है। इस पाठ के माध्यम से पाठकों को लता मंगेशकर के जीवन, संघर्ष, व्यक्तित्व और संगीत के प्रति उनकी निष्ठा के बारे में जानकारी मिलती है।

साक्षात्कार में लता मंगेशकर अपने बचपन और पारिवारिक जीवन की चर्चा करती हैं। वे बताती हैं कि उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर एक प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे और उन्हीं से उन्हें संगीत  की प्रारम्भिक शिक्षा मिली। वे अपने पिता को अपना पहला गुरु मानती थीं और उनके संस्कारों तथा अनुशासन का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।

लता जी बताती हैं कि पिता के निधन के बाद कम उम्र में ही उन पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई। आर्थिक कठिनाइयों और अनेक संघर्षों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने कठिन परिश्रम, लगन और आत्मविश्वास के बल पर संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई।

वे यह भी बताती हैं कि उन्हें अभिनय में विशेष रुचि नहीं थी और उनका पूरा ध्यान केवल गायन पर था। उनके लिए संगीत केवल एक पेशा नहीं, बल्कि साधना और ईश्वर की उपासना के समान था। वे मानती हैं कि सफलता प्राप्त करने के लिए अनुशासन, समर्पण और ईमानदारी बहुत आवश्यक हैं।

इस साक्षात्कार से लता मंगेशकर के सरल, विनम्र और संवेदनशील व्यक्तित्व का परिचय मिलता है। अपार सफलता और प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद भी वे सदैव विनम्र रहीं और अपने श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करती रहीं।

संदेश: यह पाठ हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, परिश्रम, आत्मविश्वास और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण बनाए रखने से सफलता अवश्य प्राप्त होती है।

 

 

ऐसी भी बातें होती हैं

(लता मंगेशकर से साक्षात्कार)

यतींद्र मिश्र: दीदी, आपके संगीत की अप्रतिम यात्रा पर बातचीत शुरू करते हैं...

इस संवाद में मेरा प्रयास यह रहेगा कि मैं संगीत में आकंठ डूबे हुए आपके महान जीवन की उन दुर्लभ छवियों से उन करोड़ों प्रशंसकों को मिलवा सकूँ, जो आपको हर दिन सुनते हुए कहीं अपने जीवन को सार्थक ढंग से शुरू करने की प्रेरणा पाते हैं।

आप अगर तैयार हों, तो मैं ऐसे असंख्य शुभचिंतकों, आपके संगीत के प्रति दीवानगी की हद तक समर्पित श्रोताओं और फिल्म-संगीत के प्रति आदर का भाव रखने वाले तमाम देशवासियों की ओर से प्रणाम करते हुए आपसे प्रश्न पूछना चाहूँगा...

लता मंगेशकर : जी, जरूर। आपका बेहद शुक्रिया कि आपका ऐसा कुछ करने का मन है।

आप पूछिए, मैं आपके प्रश्नों का जवाब देने के लिए तैयार हूँ। मैं कोशिश करूँगी कि जो कुछ भी मैंने संगीत में रहते हुए जाना है, उसे आपको बता सकूँ। आपके माध्यम से ही मैं अपने करोड़ों प्रशंसकों का आभार व्यक्त करती हूँ, जो उन्होंने मुझे इतना प्रेम और सम्मान दे रखा है। मुझे तो यह भी लगता है कि जितना प्रेम मुझे मिला है, शायद गाकर उतना आभार मैं अपने प्रशंसकों के प्रति जता नहीं पाई हूँ....

यतींद्र मिश्र : आपके पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर की वे कौन-सी स्मृतियाँ हैं, जो आज भी आपके स्मरण में जीवित हैं? जिनको याद करना आपको सुख से भरता है?

लता मंगेशकर : कई बातें हैं। जैसे हम लोग बचपन में जब बहुत शरारत करते थे, तब पिताजी सबको बुलाकर अपने सामने खड़ा करते थे। वे बस हमको गंभीरता से देखते थे और इतने में ही हमारा रोना शुरू हो जाता था। मतलब वे कुछ कहते नहीं थे, न ही किसी बात पर डाँट पड़ती थी; मगर हम सभी समझ जाते थे कि हमको बुलाया किसलिए गया है। पिताजी उस समय पूछते थे, 'समझ गए न?' इस पर हम लोग कहते थे, 'हाँ, हम लोग समझ गए।' इसके बाद वे कहते थे कि 'अच्छा अब जाओ, बाहर जाकर खेलो।' इस तरह हमारे पिताजी का गुस्सा था, जो बिना कुछ कहे ही हम भाई-बहनों को डरा देता था।

मेरे पिताजी कमाल के आदमी थे, जिन्हें मैंने हमेशा अपने काम और संगीत में डूबा हुआ ही देखा। उनकी ड्रामा कंपनी के नाटक रात नौ बजे शुरू होते थे और देर रात दो से तीन बजे तक जाकर समाप्त होते थे। इतनी देर एक नाटक में समय इसलिए लगता था कि एक नाटक के पाँच अंक होते थे। फिर उसमें लंबी-लंबी रागदारी वाले गायन की भी परंपरा थी। एक बार पिताजी जब गाना शुरू करते थे, तो खूब सीटियाँ, तालियाँ और 'वन्स मोर' मिलता था। बाबा माइक पर थोड़ी तेज आवाज़ में गाते थे, जो सुनने पर बहुत अच्छा लगता था। मेरे पिताजी की एक बड़ी विशेषता यह भी थी कि वे एक राग को गाते हुए उसमें सुर बदलकर भी अपना गायन करते थे।

मतलब एक राग गाते समय किसी भी सुर को 'सा' (षडज) बनाकर इस तरह राग को बदल देते थे कि वह कुछ नया हो जाता था और फिर उसी समय नए राग में गाते हुए दोबारा से पहले राग और उसके सुर में वापस लौट आते थे।

उस समय म्यूजिकल ड्रामा का बहुत चलन था। हमारे यहाँ कभी भी बिना म्यूजिक के कोई ड्रामा हुआ ही नहीं। एक नई बात मेरे पिताजी के नाटकों में यह भी थी कि वे पहली बार मराठी रंगमंच में कर्नाटक और पंजाब का संगीत लेकर आए। मतलब उन्होंने बाकायदा कर्नाटक जाकर वहाँ का कुछ गीत और संगीत सीखा था, जिसे अपने नाटकों में डाला।

मुझे यह भी याद है कि जिस दिन कोई ड्रामा नहीं होता था, उस दिन घर में संगीत की सभा होती थी और बहुत सारे लोग हमारे घर आते थे। फिर वे उसमें नाटक का कोई गीत नहीं गाते थे, बल्कि उस दिन सिर्फ शास्त्रीय संगीत होता था। मेरे पिताजी के गाए हुए शास्त्रीय संगीत के कई रेकॉर्ड एच.एम.वी. से रिलीज हुए हैं और जहाँ तक मुझे याद पड़ता है कि एक रेकॉर्ड उन्होंने राग जयजयवंती का भी बनाया था, जिसे मेगाफोन कंपनी ने बाजार में उतारा।

यतींद्र मिश्र : पिताजी से संगीत के अलावा आपने क्या-क्या और सीखा?

लता मंगेशकर : सबसे ज्यादा तो स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा। उन्होंने जो संस्कार दिए उससे जिंदगी में सही बातों पर खड़े रहने की हिम्मत मिली। आज मुझे इस बात की खुशी है कि मैंने किसी से यह नहीं कहा कि आप मुझे पाँच सौ रुपये दीजिए, फलाँ चीज ला दीजिए, मुझे उसकी जरूरत है। इस तरह जो चीज मैं कर पाई, उसमें मैं अपने बाबा का संस्कार मानती हूँ। मैंने पिताजी में यह बात देखी थी कि हर हालात में कैसे रहना चाहिए। यह मेरे पिताजी ने ही मुझे सिखाया था कि अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है। इस तरह जब मैं याद करती हूँ, तो लगता है कि बाबा ऐसा कहते थे, बाबा ने यह कहा था, बाबा ने उस समय में इस तरह कोई निर्णय लिया था। यह सब मेरे बड़े काम आया है। हमने हर तरह के दिन देखे थे। पिताजी की कंपनी जब अच्छी चलती थी, तो हम सब लोग बड़े शान से रहते थे। फिर पिताजी के निधन के बाद हमें यह भी देखना पड़ा कि बुरे हालात में कैसे जीना है। मेरी माँ का भी वही संस्कार था कि कैसे भी स्वाभिमान के साथ जी लेना है, मगर किसी के आगे जाकर हाथ नहीं पसारना है।... और देखिए, ये सब बातें मेरे कितने काम आई हैं। आज मेरे पास पैसे हैं और नाम है। हम आज जहाँ रहते हैं, वह भले ही इतना छोटा-सा घर है, पर उसमें हम लोग बहुत खुश हैं। इस बात के लिए भी ईश्वर को धन्यवाद करते हैं कि बाबा ने जैसा सिखाया था, उस पर हम सभी भाई-बहनों ने चलने का प्रयास किया।

यतींद्र मिश्र : बचपन में आप सभी भाई-बहन फिल्में देखकर उसकी नकल उतारते थे। किसी खास फिल्म को देखकर उसकी नकल का स्मरण करेंगी?

लता मंगेशकर : (हँसते हुए) अरे ! यह तो हम सब भाई-बहन बहुत करते थे। फिल्में ही थीं, जो मनोरंजन का एक ऐसा माध्यम थीं जिनको देखकर बच्चे अपने ढंग से कुछ-कुछ करते रहते थे। मुझे याद है कि प्रभात फिल्म कंपनी की एक पिक्चर थी 'संत तुकाराम'। फिल्म में दिखाया गया है कि तुकाराम सदेह बैकुंठ जाते हैं और उन्हें लेने ईश्वर का विमान आता है। वे यह गीत गाते हुए स्वर्ग जाते हैं- 'अमी जातो अमचा गावा, अमचा राम-राम ध्यावा' (मैं अपने गाँव जा रहा हूँ। सभी लोग मेरा राम-राम ले लीजिए)। हम कमरे में घर भर के गद्दे, तकिये एक के ऊपर एक रखकर ऊँचा स्वर्ग बनाते थे, जिस पर चढ़कर मैं बैठती थी और वहीं से यह गीत गाती थी। नीचे कमरे में मीना, मेरे फूफा का बेटा पंढरीनाथ और आशा, ये तीनों तुकाराम के अनुयायी बनकर रोते थे और कहते थे- 'हमें भी साथ ले लीजिए। हमें भी साथ ले चलिए।' (खिलखिलाकर हँसती हैं) उस समय उषा बहुत छोटी थी, इसलिए वह इन नाटकों में नहीं रहती थी। तो यह सब होता था। हम बहुत सारी फिल्मों की नकल उतारते थे, जिनमें धार्मिक फिल्में ज्यादा होती थीं क्योंकि पिताजी धार्मिक और देशभक्ति की फिल्मों के अलावा दूसरी फिल्में नहीं देखने देते थे। उनका सख्त अनुशासन था और यह सब काम चोरी-चोरी तब होता था, जब पिताजी घर के बाहर हों और यह जान न पाएँ कि घर में फिल्मों का खेल खेला जा रहा है।

यतींद्र मिश्र : अगर किसी फिल्म में आपको अभिनय करने को कहा जाता, तो वह कौन-सी फिल्म होती जिसमें आप काम करना पसंद करतीं?

लता मंगेशकर : नहीं, मैंने शुरू में तो फिल्मों में काम ही किया था और कुल छह या सात फिल्मों में किया था। मैं बहुत छोटी थी उस समय, जब फिल्मों की दुनिया में अभिनय के मार्फ़त ही आई। मुझे कभी अच्छा नहीं लगा मेकअप करना, लाइट के सामने जाना और काफी लोग खड़े हैं, तो उनके सामने कभी रो रहे हैं और कभी हँस रहे हैं। गा भी रहे हैं। मुझे वह कभी अच्छा नहीं लगा। अच्छी फिल्मों को देखकर सराहने का जी जरूर करता है, मगर अभिनय करने के बारे में तो सोच भी नहीं सकती। एक फिल्म हमारे यहाँ हिंदी और मराठी दोनों में बनी थी 'छत्रपति शिवाजी'। उसमें भालजी पेंढारकर थे जिन्हें मैं बाबा कहती थी। मैं उनके पास गई, हालाँकि उस वक्त तक मैंने अभिनय का काम छोड़ दिया था। मैंने उनसे खुद कहा- 'बाबा मैं चाहती हूँ कि इस फिल्म का आखिर का जो गाना है, उसमें दो लाइनें मैं भी आकर गाऊँ।' तो फिर मैंने उसके हिंदी और मराठी, दोनों ही संस्करणों में बाद की दो पंक्तियाँ गाई हैं, जिन दृश्यों में मैं मौजूद भी हूँ। मैं छत्रपति शिवाजी को बहुत पसंद करती हूँ, इसलिए बस इसी फिल्म के लिए मेरा मन हुआ कि भले ही एक दृश्य में सही, मगर यहाँ रहा जा सकता है।

यतींद्र मिश्र : उस दौर में आपके काम की परिस्थितियाँ कैसी थीं? क्या वे आपके हिसाब से धीरे-धीरे अनुकूल होती गईं अथवा वैसे ही हमेशा की तरह एक चुनौती का सबब बनी रहीं. जैसे कि वे संघर्ष के दिनों में थीं?

लता मंगेशकर : यह कह पाना मुश्किल होगा कि मेरी परिस्थितियाँ कभी बहुत अच्छी या बुरी रही हों। मैं इन सब बातों पर ध्यान नहीं देती थी। अलबत्ता मैं उस जमाने से लेकर बाद तक बहुत मेहनत से अपने काम करती थी। मुझे याद है कि मेरी रेकॉर्डिंग सुबह से रात तक चलती रहती थी। एक स्टूडियो से दूसरे और तीसरे स्टूडियो के चक्कर में ही पूरा दिन बीत जाता था। मुझे अपने गाने और रेकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज की सुध नहीं रहती थी।

हमेशा यही बात दिमाग में घूमती थी कि किसी तरह बस मुझे अपने परिवार को देखना है। फिर वह रेकॉर्डिंग का वक्त हो या घर का खाली समय। किस तरह मैं अपने परिवार के लिए ज्यादा से ज्यादा कमाकर उनकी जरूरतें पूरी कर सकती हूँ, इसी में सारा वक्त निकल जाता था। आप मेरी परिस्थितियों के बारे में पूछ रहे हैं, तो सच बात तो यही है कि मुझे रेकॉर्डिंग से या उसकी तकलीफों से इतना फर्क नहीं पड़ता था, जितना इस बात से कि आने वाले कल में मेरे कितने गीत रेकॉर्ड होने हैं। फलाँ फिल्म के खत्म होने के साथ मुझे नए कॉन्ट्रेक्ट की दूसरी नई फिल्मों के गाने कब रेकॉर्ड करने हैं।

यतींद्र मिश्र : बचपन का कोई ऐसा सपना जिसे पूरा करने की हसरत मन में बहुत दिनों तक पलती रही हो?

लता मंगेशकर : ऐसा कोई सपना तो खास नहीं है, मगर आपको बचपन की एक बात बताती हूँ। मेरे पिताजी उस समय जीवित थे और जब वे अपने कार्यक्रमों के लिए तैयार होते थे, तो उनको जितने मेडल मिले थे, वे अपने कपड़ों पर सीने के बाईं तरफ लगाते थे। वह जमाना ऐसा था, जिसमें यह प्रचलन रहा कि कलाकार लोग अपने प्रदर्शनों में मिले हुए मेडल पहनकर ही बैठते थे। मुझे जगह तो याद नहीं है, मगर यह ठीक से याद है कि पिताजी के अलावा बाहर के किसी कलाकार को जो सबसे पहले मैंने गाते हुए सुना है, वह पंडित कुमार गंधर्व थे। कुमार गंधर्व जी जब काली शेरवानी पहनकर और अपने ढेर सारे मेडल लगाकर गाने के लिए बैठे, तो वह बात मुझे बहुत पसंद आई। मुझे तब हमेशा यह लगता था कि जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तब मुझे भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे, जिसे लगाकर किसी कार्यक्रम में जाऊँगी।

यतींद्र मिश्र : अगर हम समय के चक्र (टाइम मशीन) को घुमाकर सन् 1949-50 में ले जाएँ, तो आपके फिल्मों से संबंधित सांगीतिक जीवन की शुरुआत में खेमचंद प्रकाश, शंकर-जयकिशन, हुस्नलाल-भगतराम जैसे म्यूजिक डायरेक्टर आते हैं और आपको एक मजबूत जमीन बनाने के लिए, 'आएगा आने वाला' (महल), 'हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का' (बरसात) और 'चले जाना नहीं नैन मिला के' (बड़ी बहन) जैसे गाने मिलते हैं। इससे एक नए युग का सूत्रपात होता है, जो कहीं आपके कद को बड़ा बनाने में मददगार रहता है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि यदि उस जमाने में ए.आर. रहमान आए होते, जतिन-ललित आए होते, शंकर-एहसान-लॉय होते, तो ये सारे गाने कैसे बनते? उस समय 'आएगा आने वाला' की आमद कैसी होती?

लता मंगेशकर : (हँसते हुए) बड़ा मजेदार प्रश्न है आपका। कहना मुश्किल है इस पर क्या बोलूँ? समझ में नहीं आ रहा है कि वाकई अगर ऐसा हुआ होता, तो ये गाने कैसे बनते। यह विचार और कल्पना तो सुनने में अच्छी लगती है, पर मैं पूरी तरह इसका आकलन नहीं कर सकती कि 'आएगा आने वाला' को ए. आर. रहमान ने बनाया होता या 'हवा में उड़ता जाए' को जतिन-ललित ने, तो कैसा प्रभाव पैदा होता।... मगर मैं इतना जरूर जानती हूँ कि कुछ बहुत बढ़िया होता या बिल्कुल दूसरे अंदाज में सामने आता, जिसकी शायद धुनें और तर्ज भी अलग होते। मैं आपसे प्रश्न करती हूँ कि जो मेरे गाने रहमान ने बनाए या जतिन-ललित के लिए मैंने 'मेरे ख्वाबों में जो आए' (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे) गाया है, उसे श्याम सुंदर जी, नौशाद साहब या अनिल विश्वास ने रचा होता, तो आपके लिहाज से वह किस तरह बनता? यह वाकई बहुत रोचक और सोचने वाली बात है कि समय के हेर-फेर से हमारे गीतों का स्वभाव कैसा होता? इतना जरूर मैं कहना चाहूँगी कि पुराने समय में, जब मैंने 'महल', 'बड़ी बहन, 'बरसात', 'तराना', 'बाजार' और 'संगदिल' जैसी फिल्मों के लिए पार्श्वगायन किया था. उस समय तकनीकी रूप से सिनेमा में बहुत तरक्की नहीं हुई थी। 'आएगा आने वाला में मुझे हॉल में बहुत दूर से चलकर दबे पाँव रेकॉर्डिंग वाले माईक तक आना पड़ता था और उसी अनुपात में रेकॉर्डिंग के माईक पर स्वर का उतार-चढ़ाव कैद किया जाता था।

बहुत सारे ऐसे गाने मुझे याद हैं जिसमें कुछ विशेष प्रभावों को देने के लिए अनिल विश्वास, श्याम सुंदर, सज्जाद हुसैन, सलिल चौधरी और सी. रामचंद्र ने कुछ नए तरीके और अजीबोगरीब टोटके आजमाए थे, जिनसे गीतों में वह प्रभाव पैदा हो सका। आज, जो स्थिति है और जिस तरह हमारी तकनीक विकसित हो चुकी है, उसमें अगर इन लोगों को काम करने का मौका मिलता, तब तो कमाल ही हो गया होता। न जाने कितना और अधिक एडवांस किस्म का ये लोग संगीत रच पाते, आप सोच सकते हैं। ठीक उसी तरह, जैसा सुंदर और स्तरीय संगीत आज के संगीतकार बना रहे हैं- रहमान, जतिन-ललित और तमाम अन्य लोग - अगर पीछे जाकर काम करते, तो कितनी मुश्किलें आतीं और कितना संघर्ष करते हुए वे सब अपना गाना बनाते, इसका अंदाजा भी लगाया जा सकता है। मेरे लिए भी यह कम चुनौती की बात नहीं कि मैं अनिल विश्वास की धुनों जैसा काम रहमान के साथ कर रही होती और उसी तरह इन नए लोगों की धुनों पर नौशाद साहब के लिए रेकॉर्ड करती, तो कैसा होता?

यतींद्र मिश्र : इसी समय विषय परिवर्तन करते हुए आपसे कुछ व्यक्तिगत सवाल पूछने का मन हो रहा है। इस संदर्भ में आपके व्यक्तित्व को देखते हुए यह बात दिमाग में आती है कि आपने रंगों से हमेशा परहेज किया है। विशेषकर अपने पहनावे में भी इस बात का ध्यान रखा कि कहीं से भी रंगों की कोई भी दर्शना अभिव्यक्त न हो सके। आपकी सफेद रंग की साड़ियों पर मौजूद रंगीन धारियाँ, गुलबूटों और पल्लों का रंग छोड़कर कहीं भी रंग से दोस्ताना निभता नहीं दिखता।

 

ऐसे में एक ख्याल मन में आता है कि आप रंगों का त्योहार होली कैसे मनाती होंगी? होली को लेकर कोई संस्मरण या व्यक्तिगत रुचि की कोई बात जो आप यहाँ साझा करना चाहें।

लता मंगेशकर : हम होली खेलते थे। यह बहुत पहले की बात है, जब मेरे पिताजी जीवित थे। आजकल तो मैंने होली खेलना ही बंद कर दिया है। पहले सारा दिन रंग खेलना और भीगना और बाद में जाकर देर शाम तक नहाना, अब यह सब सालों से अच्छा नहीं लगता है। यह जो होली पूरे देश में प्रचलित है, हम उसे होली की तरह नहीं मनाते थे। मेरा मतलब यह है कि होली के एक दिन पहले जब होली जलाते हैं और उस समय होलिका की पूजा होती है, उसमें जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, उन तमाम तरह की मिठाइयों को होलिका में डालते हैं। नारियल भी होलिका में आखिरी में जलाया जाता है, जिसे जल जाने के बाद आग से निकालकर उसे तोड़कर प्रसाद लेते हैं। वह जो राख बनती है, उसे उठाकर दूसरे दिन एक-दूसरे पर डालते हैं। इसे हम लोग 'गुड़वड़' कहते हैं। होली के बाद पाँचवें दिन रंग-पंचमी आती है, उस दिन मेरी माँ और पिताजी हम सब भाई-बहनों पर केसर घोलकर थोड़ा छिड़कते थे। माँ घर में कुछ मीठा बनाती थीं, जो भगवान को चढ़ाकर हमें प्रसाद में खाने को मिलता था। हम सभी की अलग-अलग आरतियाँ भी माँ उतारती थीं और इस तरह हमारे घर में बचपन में होली का त्योहार मनता था। यह होली जो आजकल प्रचलित है, इसका कोई प्रभाव हमारे घर में नहीं था।

हमारे यहाँ दशहरा और दीवाली का ज्यादा महत्व था। नवरात्रि भी बहुत धूमधाम के साथ हम लोगों के यहाँ मनती है। नवरात्रि के पहले दिन हम 'गुड़ि पड़वा' मनाते हैं, जिसका विशेष महत्व

 

है। इसमें हम घर में बाहर 'गुड़ि' बाँधते हैं और कलश स्थापना करते हैं। सूर्योदय के समय ही 'गुड़ि' पर बताशों की माला या हार बनाकर चढ़ाई जाती है, जिसे सूर्यास्त होने तक उतार लिया जाता है और प्रसाद के रूप में घर के सभी सदस्य उसे लेते हैं। यह एक बहुत महत्वपूर्ण आयोजन है हमारी तरफ और ऐसी मान्यता है कि भगवान राम चौदह वर्ष बाद जब अयोध्या लौटे थे, तो हर घर में ऐसे ही बताशों की लड़ी सजाकर 'गुड़ि' बाँधी गई थी। महाराष्ट्र में ऐसा ही कहा जाता है। पहले दिन 'गुड़ि' बाँधने के बाद नौ दिन तक उत्सव मनाया जाता है, जिसके अंत में नवमी पर राम जी के जन्म की तिथि रामनवमी आती है।

...तो यह त्योहार हम राम आगमन मानकर मनाते हैं, जबकि बाकी जगहों पर दर्गा की आराधना में नवरात्र होता है। महाराष्ट्र में उस तरह नवरात्र नहीं मनता, जिस तरह गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में दुर्गा की आराधना में यह त्योहार मनाया जाता है।

यतींद्र मिश्र : त्योहारों की ऐसी कोई खास बात, जो आपके शुरुआती जीवन में परंपरा की तरह निभती रही हो और जिसे आपने बाद में भी पूरी आत्मीयता के साथ निभाना जारी रखा।

लता मंगेशकर : ऐसी कोई खास बात मुझे याद नहीं आती। अलबत्ता इतना जरूर कहूँगी कि पचास का दशक रहा होगा, जब मैं फिल्म इंडस्ट्री में नई-नई आई थी और मेरा काम कुछ चल निकलना शुरू हुआ था। उस दौरान मैंने कुछ सालों तक दीवाली के दिन अपने सीनियर म्यूजिक डायरेक्टर्स के यहाँ मिठाई लेकर जाने का चलन शुरू किया था। आप सुनकर हैरान होंगे कि मैं ऐन दीवाली के दिन तड़के पाँच बजे ही नहा-धोकर बहुत सारे संगीतकारों के घर मिठाई लेकर पहुँच जाती थी। एक बार बड़ा मजेदार वाकया हुआ कि मैं नौशाद साहब के घर सुबह करीब साढ़े पाँच बजे पहुँच गई और जब कॉलबेल बजाया, तो उनींदे से नौशाद साहब मुझे गेट पर खड़ा देखकर डर गए। वे डरकर पूछने लगे - "लता बाई सब खैरियत तो है, इतने सबेरे क्या मुसीबत आन पड़ी?" मैंने उन्हें हँसकर कहा, "कुछ नहीं नौशाद साहब, आज दीवाली है तो आपको बधाई देने और मिठाई पहुँचाने चली आई।" इस पर वे बोले, "अरे इतनी सुबह क्यों परेशान हुई?" तब मैंने उनको हँसते हुए जवाब दिया कि नौशाद साहब आपके अलावा मुझे अभी दो-तीन जगह- अनिल विश्वास जी, रोशनलाल, मदन भैया और बर्मन दादा के यहाँ भी जाना है। इस पर वे लाड़ से भरकर बोले- "हाँ। मैं बिल्कुल भूल गया! लेकिन पहले बैठो, चाय पियो और मुँह मीठा करो, फिर जाने देंगे। फिर बोले, "लता, तुम हम सबको मिठाई बाँट रही हो, लेकिन हम सारे संगीतकारों को मिलकर तो तुम्हें मिठाई खिलानी चाहिए, जो तुमने हमारी धुनों में इतनी मिठास घोली है।" नौशाद साहब से मैंने यही इतना भर कहा कि आप आशीर्वाद दीजिए कि आगे भी जीवन में हर दीवाली के साथ मैं और मधुर से मधुर गीत गा सकूँ।

यतींद्र मिश्र : त्योहारों के संदर्भ में एक बात और ध्यान में आती है कि अधिकांश प्रदेशों में पर्वों व अनुष्ठानों से संदर्भित घर-घर गीत गाए जाने का प्रचलन रहा है। उदाहरण के लिए होली के मौके पर फाग और धमार, बिहार में छठ पूजा पर छठ के गीत, जन्माष्टमी और रामनवमी में

 

 

ईश्वर के जन्म के कारण सोहर और बधावा आदि गाने का मामला। ये गीत ज्यादातर घर और मोहल्ले की स्त्रियाँ ही गाती हैं, गायन एक रिवाज की तरह कायम है। ऐसे में महाराष्ट्र के संदर्भ में आपके देखे ऐसे कौन-से अवसर आए हैं?

लता मंगेशकर : (हँसते हुए) हमारे यहाँ होली और दीवाली पर तो इस तरह घरों में गीत नहीं होता। यह जरूर है कि विवाह के बाद जब नई बहू घर में आती है, तब एक पूजा होती है घरों में, जिसमें पास-पड़ोस की बहुत सारी औरतें आती हैं। यह मंगलागौर कहलाता है। सारी औरतें बिल्कुल मुग्ध भाव से गीत गाती हैं और नाचती भी हैं। बिल्कुल ठेठ गवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है, मगर आहिस्ता आहिस्ता वह भी अब खत्म हो रहा है। मुझे अच्छी तरह से याद है; जब मैं बहुत छोटी थी, तब घर-परिवार या पड़ोस में किसी की भी शादी के बाद यह मंगलागौर मनाया जाता था और हम सभी लोग उसमें खूब नाचते-गाते थे। उनमें स्त्रियाँ नौटंकी और तमाशा की तरह भी कुछ-कुछ करती थीं। मतलब कोई कुछ भी रूप धरकर नाचता था।

यतींद्र मिश्र : दीदी, कोरस में गाने वाली लड़कियों के साथ आपके कैसे रिश्ते रहे? क्या वे सब भी आप लोगों की गायिकी में कोई सहयोग करती थीं या उनका एक अलग ही विभाग होता था, जो मुख्य पार्श्वगायक-गायिकाओं से अलग रहता था?

लता मंगेशकर : उस वक्त एक ऐसा ग्रुप था, जो सब जगह जाता था। नौशाद साहब के यहाँ, मदन मोहन जी के यहाँ। शंकर-जयकिशन, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल- ये जितने

भी लोग थे; सभी के यहाँ एक ही ग्रुप की लड़कियाँ थीं, जो कोरस में गाने जाती थीं। इसलिए सबसे मेल-मुलाकात भी गहरी पहचान में बदल गई थी। मेरा कोरस की लड़कियों के साथ बहुत अच्छा संबंध था। मतलब जितनी भी लड़कियाँ थीं, वो बिल्कुल मेरे घर जैसी थीं। सबका ही घर में आना-जाना होता था। मीना की शादी जब कोल्हापुर में हुई, तो कोरस की सारी लड़कियाँ और लड़के वहाँ आए थे और उन लोगों ने वहाँ खूब गाने गाए और डांस किया था। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, सन् 1960 में जो ग्रुप कोरस गाने वालों का हमें मिला था, वह लगभग अस्सी तक वैसे ही चला है। 1980 के पास जाकर वह बदला गया। फिर उनमें कुछ लड़कियों ने गाना बंद कर दिया था और कुछ लोगों ने छोड़ दिया।

फिर अस्सी के बाद तो यह भी हो गया था कि कोरस वालों का म्यूजिक पहले रेकॉर्ड हो जाता था। बाद में हम लोग जाकर अपने गाने गा आते थे। उससे पहले के दौर में पुरुष और स्त्री आवाज़ों के कोरस हम लोगों के गीतों के साथ ही रेकॉर्ड होते थे। भले ही वह गाना डुएट हो या फिर कोई सोलो सांगा अकसर मुकेश भैया और मेरे गाने या किशोर कुमार और मेरे गानों में

कोरस की लड़कियाँ साथ ही गाती थीं। उनमें से कुछ के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं। कुछ एक लड़कियाँ बहुत सुरीला गाती थीं, जिनमें कविता, गांधारी, कल्याणी, सुमन और रेखा थीं। यह सब मुझे बड़ी भली और अच्छी लगती थीं। कविता और गांधारी बहनें थीं और दोनों साथ ही कोरस में गाती थीं। रेखा शादी-शुदा बाल-बच्चों वाली औरत थी, जो अच्छी तरीके से कोरस में साथ देती थी। कल्याणी की भी आवाज़ सुंदर थी। यह सब इतनी भली थीं कि जब रेकॉर्डिंग के लिए आती थीं, तो अकसर वहाँ स्टूडियो में ज्यादा कुर्सियाँ नहीं होती थीं। वे सब बड़े मजे से जमीन पर बैठती थीं और अकसर मैं भी रेकॉर्डिंग में आकर वहीं जमीन पर बैठकर उन सभी के साथ बातें करती थी। यह मैं उन कोरस गाने वाली लड़कियों की बात कर रही हूँ, जो बहुत शुरुआती दौर में लगभग पचास और साठ के दशक में संगीतकारों के यहाँ कोरस गाने के लिए जाती रही हैं। आजकल का मुझे कुछ मालूम नहीं है। अब कौन-कौन से लोग हैं और उनका सिंगर्स के साथ में गाना रेकॉर्ड होता है या अलग से? यह मुझे मालूम नहीं है। मुझसे मिलने वाले जितने लड़के और लड़कियाँ थीं, उन सबने बहुत बाद तक संपर्क बनाया हुआ था।

यतींद्र मिश्र : संगीत की प्राचीन परंपरा में बहुत सारी जनश्रुतियाँ और कहानियाँ संगीत को गरिमा और शिखर देने के संदर्भ में कही जाती रही हैं या हम इस तरह कह सकते हैं कि परंपरा में व्याप्त रही हैं। मसलन स्वामी हरिदास और तानसेन के युग की बहुत सारी कथाओं में यह मान्यताएँ भी प्रचलित रहीं कि तानसेन के दीपक राग गाने से दीये जल उठे या कि उनकी पुत्रियों ताना-रीरी के मेघ राग गाने से वर्षा होने लगी। इस तरह की अवधारणाओं पर आप किस तरह सोचती हैं?

लता मंगेशकर : यह जिस जमाने की कथाएँ हैं, जिसमें हरिदास बाबा और तानसेन जैसे महान संगीतकारों के लिए ऐसा कहा गया, तो हो सकता है कि उनकी कला में कोई सच्चा सुर या आत्मा की आवाज़ लगी होगी, तो ऐसा कुछ घट गया होगा, ऐसा हम आदर में मान लेते हैं। परंतु

यह निश्चित ही हुआ होगा, यह कम से कम मैं नहीं कह सकती क्योंकि ऐसा मेरा कोई अनुभव नहीं है। हालाँकि मैं यह मानती हूँ कि संगीत में वह असीम शक्ति है कि कुछ अप्रत्याशित वह जरूर रच देता है, जिसका अनुभव भी कई बार हमें हुआ है। कई बार अपने बाबा पंडित दीनानाथ मंगेशकर को सुनते हुए भी मैं कुछ अप्रत्याशित अनुभव करती थी।

आपको एक वाकया बताती हूँ। मैं मुंबई में उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर का एक कंसर्ट सुन रही थी। मैं श्रोताओं की पंक्ति में बिल्कुल आगे बैठी अली अकबर भाई का वादन सुन रही थी और वे अत्यंत मंत्रमुग्ध किस्म का वादन कर रहे थे। तभी कुछ समय बीता होगा, मसलन पचास-साठ मिनट कि 'ठन' से उनके सरोद का एक तार टूटा और उन्हें बजाना बंद करना पड़ा। जब वे उठकर पीछे ग्रीन रूम में गए, तो उनसे मिलने मैं भी वहाँ गई। मैंने बोला, "आप बहुत सुंदर बजा रहे थे, काश कि यह तार न टूटता और हम पूरी तरह राग को अंत तक सुन पाते।" इस पर अली अकबर भाई ने एक बड़ी मार्मिक बात कही, जो आज तक मुझे भूलती नहीं। वे बोले - "बहन, जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।" उन्होंने अपने सुर को इतने पवित्र भाव से इतना डूबकर लगाया कि सरोद का तार टूट गया। इस प्रसंग से मुझे यह लगता है कि संगीत की सीमा इतनी अनंत है कि तार भी शुद्ध स्वर के आघात को सह नहीं पाता, टूटकर अलग हो जाता है। आज जब उस्ताद अली अकबर खाँ या पंडित रविशंकर के संदर्भ में इन बातों को सोचती हूँ, तो इस बात पर विश्वास करने का मन होता है कि हो सकता है मियाँ तानसेन से कोई ऐसा सच्चा सुर जरूर लगा होगा कि बारिश हो गई या दीपक जल उठे !

यतींद्र मिश्र : दीदी, आप तो घर-घर में व्याप्त हैं। आपकी आवाज़ से लोगों की सुबह होती है। अगर मैं अतिरेक नहीं कर रहा, तो यह कहना वाजिब है कि आप अमर हैं और दूसरी लता मंगेशकर होना इस दुनिया में संभव नहीं है...

लता मंगेशकर : मुझे भगवान ने बहुत कुछ दिया है। मुझे किसी बात की शिकायत नहीं है। मैं बहुत खुश हूँ। आप जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि मैं अमर हूँ, तो यह मुझे मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है, जो दुनिया ने मुझे दिया है।... मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं। उसे तो जाना ही है, आज नहीं तो कल। कल नहीं तो परसों या किसी न किसी दिन...। इस बात पर मुझे कोई अफसोस नहीं होता। वह तो होकर रहेगा। हमारे यहाँ यही कहा जाता है- 'गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन'। मतलब गाँव तो बह जाता है, लेकिन जो नाम है, वह रह जाता है। मैं

 

 

इसको हमेशा से मानती रही हूँ। एक बात की मुझे सबसे ज्यादा खुशी है कि मैंने अपने पिताजी का नाम, थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया।

आज मुझे लगता है कि हे प्रभु! तुमने जो भी दिया, वह बहुत दिया, दूसरों से कहीं ज्यादा दिया। अपनी कृपा की छाया से जैसे मुझे छाँह दी है, वैसे ही हर एक कलाकार और नेक इंसानों के ऊपर भी रखना... यही प्रार्थना है।

 

अभ्यास

रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

 

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

1. लता जी ने अपने पिताजी से क्या-क्या सीखा?

(क) अनुशासन और नियम के साथ जीना

(ख) भय और संशय के साथ जीना

(ग) स्वाभिमान और सच्चाई के साथ जीना

(घ) चतुराई और संयम के साथ जीना

(ग) स्वाभिमान और सच्चाई के साथ जीना

 लता मंगेशकर जी ने अपने पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर से जीवन में हमेशा स्वाभिमान (आत्मसम्मान) बनाए रखने और सही व सच्ची बातों पर डटे रहने की सीख पाई थी।

 

2. पिताजी की मृत्यु के बाद परिवार सँभालने का लता जी का निर्णय किस जीवन-मूल्य का द्योतक है?

(क) संघर्ष

(ख) निराशा

(ग) भौतिकता

(घ) कर्तव्यनिष्ठा

घ) कर्तव्यनिष्ठा

सन् 1942 में मात्र 13 वर्ष की आयु में जब लता जी के पिताजी का आकस्मिक निधन हो गया, तब उन्होंने अपनी माता और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उठाई। उस कठिन समय में सामाजिक रूढ़ियों से लड़कर परिवार की आर्थिक मदद करना और अपनी जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाना उनकी गहरी कर्तव्यनिष्ठा और जिम्मेदारी की भावना को दर्शाता है।

 

3. "बिल्कुल ठेठ गँवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है..." "मंगलागौर' के वर्णन से भारतीय समाज की कौन-सी परंपरा उजागर होती है?

(क) संगीत पर आधुनिकता का प्रभाव

(ख) लोकगीतों की लोकप्रियता में कमी

(ग) धार्मिक कार्यक्रमों में संगीत का महत्व

(घ) संगीत की महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका

 (घ) संगीत की महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका

 लता मंगेशकर जी ने "मंगलागौर" उत्सव का वर्णन करते हुए बताया है कि इस अवसर पर गाँव की महिलाएँ एक साथ एकत्रित होती हैं, मिलकर पारंपरिक गीत गाती हैं और नृत्य करती हैं। मंगलागौर एक ऐसा लोकपर्व है जो समाज के लोगों को आपस में जोड़ता है और खुशियाँ

साझा करने का माध्यम बनता है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारतीय समाज में

संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि इसकी एक बहुत महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका है जो लोगों में सामूहिकता और आपसी संबंधों को बढ़ावा देती है।

 

4. "गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन" इस कहावत का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?

(क) नाव गाँव में नहीं रहती, नदी में बहती है।

(ख) इस नश्वर संसार में सब कुछ नष्ट हो जाता है।

(ग) फिल्मों में गीत गाने से बहुत प्रसिद्धि मिलती है।

(घ) जीवन अस्थायी है, पर कर्म अमर रहते हैं।

(घ) जीवन अस्थायी है, पर कर्म अमर रहते हैं

 लता मंगेशकर जी ने इस मराठी कहावत का शाब्दिक अर्थ समझाया है— "गाँव तो बह जाता है, लेकिन नाम रह जाता है।" इसका प्रतीकात्मक या गहरा अर्थ यह है कि मनुष्य का भौतिक शरीर और उसका जीवन नश्वर (अस्थायी) है, परंतु उसके द्वारा किए गए महान कार्य, कला और सुकर्म सदैव जीवित रहते हैं| लता जी ने इसे संगीत के संदर्भ में कहा कि उनका शरीर तो एक दिन चला जाएगा, पर उनके गाए गीत हमेशा अमर रहेंगे|

5. कोरस में साथ गाने वाली लडकियों के साथ लता जी के संबंध कैसे थे'

(क) औपचारिक

(ख) कामकाजी

(ग) आत्मीय

(घ) प्रतिस्पर्धात्मक

(ग) आत्मीय

 पाठ में यह बताया गया है कि लता मंगेशकर जी का स्वभाव बहुत ही सरल और मिलनसार था। जब वे रिकॉर्डिंग करती थीं, तो बैकग्राउंड में कोरस गाने वाली लड़कियों के साथ उनका व्यवहार बेहद प्रेमपूर्ण, आदरयुक्त और आत्मीय (परिवार जैसा) होता 

 

6. लता मंगेशकर के अनुसार बाबा हरिदास और तानसेन की कथाओं से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?

(क) संगीत द्वारा दीपक जलाए जा सकते हैं।

(ख) मेघराग गाने से वर्षा होने लगती है।

(ग) सुर में वाद्य बजाने से तार टूट जाते हैं।

(घ) संगीत में अपरिमित शक्ति होती है।

(घ) संगीत में अपरिमित शक्ति होती है

पाठ के अनुसार, बाबा हरिदास और तानसेन की कथाओं (जैसे दीपक राग से दीये जलना या मेघ मल्हार से वर्षा होना) का मुख्य निष्कर्ष यही है कि सच्चे और असीम साधना वाले संगीत में असीमित या अपरिमित शक्ति होती है। संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रकृति और मन को प्रभावित करने वाली एक दिव्य कला है। 

 

7. पूरे साक्षात्कार में लता मंगेशकर की जो छवि बनती है, वह मुख्यतः कैसी है?

(क) सादगी, समर्पण और आत्मसम्मान की

(ख) प्रसिद्धि, परिवार को समर्पित और आत्ममुग्ध

(ग) कठोर सिद्धांतवादी और व्यावहारिक व्यक्ति

(घ) आधुनिकता विरोधी रूढ़िवादी विचारों वाली

(क) सादगी, समर्पण और आत्मसम्मान की

पूरे साक्षात्कार में लता जी का व्यक्तित्व इन्हीं तीन मुख्य गुणों के इर्द-गिर्द घूमता है। वे इतनीमहान गायिका होने के बावजूद बेहद सरल व सादगी पसंद इंसान थीं, संगीत और अपने परिवार केप्रति उनका समर्पण अतुलनीय था, और उन्होंने अपने पिताजी से मिले आत्मसम्मान (स्वाभिमान) के संस्कार को जीवनभर बनाए रखा।

 

मेरी समझ मेरे विचार-

 

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

1. "पिताजी उस समय पूछते थे, 'समझ गए न?"... इसके बाद वे कहते थे कि 'अच्छा अब जाओ, बाहर जाकर खेलो।" यह प्रसंग पारिवारिक अनुशासन और स्नेह के संतुलन का प्रतीक है। कैसे?

(संकेत- यहाँ अनुशासन में डर है या सम्मान?)

उत्तर- पिताजी बच्चों को गंभीरता से समझाकर उनमें अच्छे संस्कार विकसित करते थे, जो पारिवारिक अनुशासन का प्रतीक है। इसके बाद उन्हें खेलने की अनुमति देना उनके स्नेह और बच्चों की भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है। इसलिए उनके अनुशासन में डर नहीं, बल्कि सम्मान और प्रेम था।

2. लता मंगेशकर पर अपने पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर के व्यक्तित्व का क्या प्रभाव पड़ा? उनके कौन-कौन से कार्यों और व्यवहार में उनके पिता का प्रभाव दिखाई देता है?

उत्तर- लता मंगेशकर पर उनके पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर का गहरा प्रभाव था। उनसे उन्होंने स्वाभिमान, आत्मसम्मान, अनुशासन और संगीत के प्रति पूर्ण समर्पण सीखा।अपार सफलता के बावजूद उनका स्वभाव सरल, विनम्र और अहंकाररहित रहा, जो उनके पिता के संस्कारों का परिचायक है।

पिताजी के व्यक्तित्व का प्रभाव लता जी के निम्नलिखित कार्यों और व्यवहार में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है:

कर्तव्यनिष्ठा और पारिवारिक जिम्मेदारी-

·       प्रभाव: पिताजी ने सिखाया था कि मुश्किल समय में भी घबराना नहीं चाहिए और अपनों का साथ देना चाहिए।

·       व्यवहार में झलक: सन् 1942 में जब मात्र 13 वर्ष की आयु में उनके पिताजी का आकस्मिक निधन हुआ, तो लता जी ने रोने या निराश होने के बजाय अपने छोटे भाई-बहनों और माता की जिम्मेदारी उठाई। उन्होंने कम उम्र में ही काम करना शुरू किया और पूरे मंगेशकर परिवार को एक मजबूत सहारा दिया।

 सरलता और सादगी पसंद व्यवहार

प्रभाव: दीनानाथ जी अनुशासन प्रिय होने के साथ-साथ बच्चों से बेहद सहज स्नेह रखते थे, जिससे लता जी ने अनुशासन और नम्रता का संतुलन सीखा।

 व्यवहार में झलक: इतनी अपार प्रसिद्धि पाने के बाद भी लता जी का स्वभाव हमेशा जमीन से जुड़ा रहा। वे कोरस में गाने वाली लड़कियों को भी अपने बराबर आत्मीय सम्मान देती थीं और उनके अहंकार रहित स्वभाव में उनके पिता के ही संस्कार झलकते थे।

 

3. "मैंने अपने पिताजी का नाम, थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया।" 'नाम आगे बढ़ाने' का लता जी के लिए क्या अर्थ है? क्या यह सिर्फ प्रसिद्धि पाना है या इससे कोई महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है?

उत्तर- लता जी के लिए ‘पिताजी का नाम आगे बढ़ाना’ केवल प्रसिद्धि या व्यक्तिगत सफलता प्राप्त करना नहीं था। इसका अर्थ उनके आदर्शों, संस्कारों, संगीत-साधना, ईमानदारी और आत्मसम्मान को अपने जीवन में अपनाकर उन्हें सम्मान दिलाना था। यह उनके पिता के प्रति सम्मान, कला के प्रति निष्ठा तथा परिवार के प्रति अटूट कर्तव्यनिष्ठा का सुंदर प्रमाण था।

4. किसी भी कार्य को पूरा करने में सहयोगियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। साक्षात्कार के आधार पर बताइए कि लता जी के अपने सहयोगियों के साथ संबंध कैसे थे?

उत्तर- पाठ ऐसी भी बातें होती हैं’ के साक्षात्कार से स्पष्ट होता है कि लता मंगेशकर जी के अपने सहयोगियों के साथ अत्यंत आत्मीय, सम्मानपूर्ण और मधुर संबंध थे। वे संगीत जगत के शिखर पर होने के बावजूद अहंकाररहित थीं तथा कोरस में गाने वाली लड़कियों को भी परिवार के सदस्य जैसा सम्मान देती थीं। वे सहयोगियों के सुख-दुख में सहभागी बनती थीं, उनसे हँसी-मजाक करती थीं और सभी कलाकारों की मेहनत का आदर करती थीं। यही विनम्रता उन्हें सबका प्रिय बनाती थी।

 

5. साक्षात्कार से उभरता व्यक्तित्व/उभरती छवि

साक्षात्कार से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन पंक्तियों से लता मंगेशकर के व्यक्तित्व के कौन. कौन से गुण या विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं? चुनकर लिखिए-

 

दृढ़ता, कृतज्ञता, दार्शनिकता, समर्पण, उत्तरदायित्व, स्पष्टता, एकाग्रता, साधना, स्पष्टवादिता, विनम्रता, कठोरता, सरलता, आत्मविश्वास, उत्सवप्रियता, श्रद्धा, मानवता, अमरता, घमंड, स्वाभिमान

 

1. "मुझे अपने गाने और रेकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज की सुध नहीं रहती थी।"

 एकाग्रता ,समर्पण ,साधना ,दृढ़ता

2. "अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।"

स्वाभिमान, आत्मविश्वास, दृढ़ता , स्पष्टता

3. "आप जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि मैं अमर हूँ, तो यह मुझे मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है।"

विनम्रता, कृतज्ञता, सरलता, दार्शनिकता

4. "मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं।"

दार्शनिकता, सरलता, विनम्रता, स्पष्टता

 

मेरे अनुभव मेरे विचार

 

अपने अनुभवों के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

 

1. "अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।"

क्या आप किसी ऐसी स्थिति से गुजरे हैं जब आपको किसी सही बात पर अकेले खड़ा होना पड़ा हो? कब और क्यों?

हाँ, एक बार विद्यालय की एक समूह परियोजना के दौरान एक साथी छात्र पारिवारिक समस्याओं के कारण पूरा योगदान नहीं दे सका। अन्य सदस्य उसे बाहर करना चाहते थे, लेकिन मैंने उसका समर्थन किया। विरोध के बावजूद मैंने अतिरिक्त मेहनत की। अंत में शिक्षक ने हमारे सहयोग और मानवीय दृष्टिकोण की सराहना की।

 

2. "बिल्कुल ठेठ गँवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है, मगर आहिस्ता आहिस्ता वह भी अब खत्म हो रहा है।"

 पाठ में आपने पढ़ा कि लता मंगेशकर के बचपन से अब तक उत्सवों से जुड़ी अनेक परंपराएँ बदल रही हैं। कौन-कौन सी परंपराएँ बदल गई हैं? अपने घर-परिवार में बातचीत करके पता लगाइए कि विभिन्न त्योहारों को मनाने के तरीकों में कौन-कौन से बदलाव आ रहे हैं?

उत्तर- पाठ के अनुसार पहले मंगलागौर जैसे उत्सव पारंपरिक लोकगीतों, खेलों और सामूहिक सहभागिता के साथ मनाए जाते थे, लेकिन अब ये परंपराएँ धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। मेरे परिवार के अनुसार आजकल त्योहारों में पहले जैसी सामूहिकता और पारंपरिक रीति-रिवाज कम दिखाई देते हैं। घर पर मिठाइयाँ बनाने के स्थान पर बाजार से खरीदी जाती हैं, रिश्तेदारों से मिलने के बजाय मोबाइल और सोशल मीडिया के माध्यम से शुभकामनाएँ दी जाती हैं तथा आधुनिकता का प्रभाव बढ़ गया है।

 

 

 

 


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