"क्या लिखूँ?" :

सारांश

"क्या लिखूँ?" के लेखक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हैं। यह एक आत्मपरक एवं विचारप्रधान निबंध है, जिसमें लेखक ने निबंध-लेखन की प्रक्रिया, उसकी कठिनाइयों तथा एक अच्छे लेखक के गुणों का वर्णन किया है।

निबंध की शुरुआत में लेखक इस दुविधा को व्यक्त करते हैं कि उन्हें किस विषय पर लिखना चाहिए। उनके सामने अनेक विषय हैं, परंतु वे किसी एक विषय का चयन नहीं कर पा रहे हैं। इसी उलझन के कारण उनके मन में "क्या लिखूँ?" का प्रश्न बार-बार उठता है।

लेखक प्रसिद्ध निबंधकार ए. जी. गार्डिनर के विचारों का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि अच्छा निबंध लिखने के लिए केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं होता, बल्कि लेखक के मन में उत्साह, रुचि और विचारों की स्पष्टता भी होनी चाहिए।

लेखक को "दूर के ढोल सुहावने" तथा "समाज-सुधार" जैसे विषयों पर निबंध लिखने के लिए कहा जाता है। वे सोचते हैं कि किसी भी विषय पर लिखने से पहले उसके बारे में पर्याप्त जानकारी और अनुभव होना आवश्यक है।

लेखक निबंध-लेखन की विभिन्न प्रक्रियाओं पर विचार करते हैं। वे बताते हैं कि निबंध लिखने से पहले विषय का चयन करना, आवश्यक सामग्री एकत्र करना, विचारों को क्रमबद्ध करना और उपयुक्त भाषा-शैली का प्रयोग करना बहुत महत्वपूर्ण है।

लेखक यह भी स्वीकार करते हैं कि केवल नियमों का पालन करके प्रभावशाली लेखन नहीं किया जा सकता। अच्छे लेखन के लिए मौलिकता, कल्पनाशक्ति, अनुभव और सरल अभिव्यक्ति की आवश्यकता होती है।

अंत में लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि निबंध वही अच्छा होता है, जिसमें लेखक के अपने विचार, अनुभव और भावनाएँ स्वाभाविक रूप से व्यक्त हों।

शिक्षा

इस पाठ से हमें शिक्षा मिलती है कि किसी भी विषय पर लिखने से पहले उसके बारे में गहराई से सोचना चाहिए। सफल लेखन के लिए मौलिक विचार, अनुभव, स्पष्टता और सरल भाषा आवश्यक हैं।

 

"क्या लिखूँ?" :

 

मुझे आज लिखना ही पड़ेगा। अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंध लेखक ए. जी. गार्डिनर का कथन है कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में कुछ ऐसी उमंग-सी उठती है, हृदय में कुछ ऐसी स्फूर्ति-सी आती है, मस्तिष्क में कुछ ऐसा आवेग-सा उत्पन्न होता है कि लेख लिखना ही पड़ता है। उस समय विषय की चिंता नहीं रहती। कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं। हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।

गार्डिनर साहब के इस कथन की यथार्थता में मुझे संदेह नहीं, पर मेरे लिए कठिनता यह है कि मैंने उस मानसिक स्थिति का अनुभव ही नहीं किया है, जिसमें भाव अपने आप उत्थित हो जाते हैं। मुझे तो सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबंध लिख सकता हूँ। आज तो मुझे विशेष परिश्रम करना पड़ेगा, क्योंकि मुझे कोई साधारण निबंध नहीं लिखना है। आज मुझे नमिता और अमिता के लिए आदर्श निबंध लिखना होगा। नमिता का आदेश है कि मैं 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' इस विषय पर लिखूँ। अमिता का आग्रह है कि मैं समाज-सुधार पर लिखूँ, ये दोनों ही विषय परीक्षा में आ चुके हैं और उन दोनों पर आदर्श निबंध लिखकर मुझे उन दोनों को निबंध-रचना का रहस्य समझाना पड़ेगा।

दूर के ढोल सुहावने अवश्य होते हैं। पर क्या वे इतने सुहावने होते हैं कि उन पर पाँच पेज लिखे जा सकें? इसी प्रकार जिस समाज-सुधार की चर्चा अनादि काल से लेकर आज तक होती आ रही है और जिसके संबंध में बड़े-बड़े विज्ञों में भी विरोध है, उसको मैं पाँच पेज में कैसे लिख दूँ? मैंने सोचा कि सबसे पहले निबंधशास्त्र के आचार्यों की सम्मति जान लें। पहले यह तो समझ लूँ कि आदर्श निबंध है क्या और वह कैसे लिखा जाता है, तब फिर मैं विषय की चिंता करूँगा। इसलिए मैंने निबंधशास्त्र के कई आचार्यों की रचनाएँ देखीं।

एक विद्वान का कथन है कि निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है, क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बनी रह सकती। इस कथन को मान लेने में ही मेरा लाभ है। मुझे छोटा ही निबंध लिखना है, बड़ा नहीं। पर लिखूँ कैसे? निबंधशास्त्र के उन्हीं आचार्य महोदय का कथन है कि निबंध के दो प्रधान अंग हैं-सामग्री और शैली। पहले तो मुझे सामग्री एकत्र करनी होगी, विचार-समूह संचित करना होगा। इसके लिए मुझे मनन करना चाहिए। यह तो सच है कि जिसने जिस विषय का अच्छा अध्ययन किया है, उसके मस्तिष्क में उस विषय के विचार आते हैं। पर यह कौन जानता था कि 'दूर के ढोल सुहावने' पर भी निबंध लिखने की आवश्यकता होगी। यदि यह बात पहले से ज्ञात होती तो पुस्तकालय में जाकर इस विषय का अनुसंधान कर लेता; पर अब समय नहीं है। मुझे तो यहीं बैठकर दो ही घंटों में दो निबंध तैयार कर देने होंगे। यहाँ न तो विश्वकोश है और न कोई ऐसा ग्रंथ जिसमें इन विषयों की सामग्री उपलब्ध हो सके। अब तो मुझे अपने ही ज्ञान पर विश्वास कर लिखना होगा।

विज्ञों का कथन है कि निबंध लिखने के पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। अतएव सबसे पहले मुझे 'दूर के ढोल सुहावने' की रूपरेखा बनानी है। मैं सोच ही नहीं सकता कि इस विषय की कैसी रूपरेखा है। निबंध लिख लेने के बाद मैं उसका सारांश कुछ ही वाक्यों में भले ही लिख दूँ, पर निबंध लिखने के पहले उसका सार दस-पाँच शब्दों में कैसे लिखा जाए? क्या सचमुच हिंदी के सब विज्ञ लेखक पहले से अपने-अपने निबंधों के लिए रूपरेखा तैयार कर लेते हैं? ए.जी. गार्डिनर को तो अपने लेखों का शीर्षक बनाने में ही सबसे अधिक कठिनाई होती है। उन्होंने लिखा कि मैं लेख लिखता हूँ और शीर्षक देने का भार मैं अपने मित्र पर छोड़ देता हूँ। उन्होंने यह भी लिखा है कि शेक्सपीयर को भी नाटक लिखने में उतनी कठिनाई न हुई होगी, जितनी कठिनाई नाटकों के नामकरण में हुई होगी। तभी तो घबराकर नाम न रख सकने के कारण उन्होंने अपने एक नाटक का नाम रखा 'जैसा तुम चाहो'। इसलिए मुझसे तो रूपरेखा तैयार न होगी।

अब मुझे शैली निश्चित करनी है। आचार्य महोदय का कथन है कि भाषा में प्रवाह होना चाहिए। इसके लिए वाक्य छोटे-छोटे हों, पर एक-दूसरे से संबद्ध। यह तो बिल्कुल ठीक है। मैं छोटे-छोटे वाक्य अच्छी तरह लिख सकता हूँ। पर मैं हूँ मास्टर। अपनी विद्वता का प्रदर्शन करने के लिए, अपना गौरव स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि वाक्य कम-से-कम आधे पृष्ठ में तो समाप्त हों। बाणभट्ट ने कादंबरी में ऐसे ही वाक्य लिखे हैं। वाक्यों में अस्पष्टता भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता या दुर्बोधता गांभीर्य ला देती है। इसीलिए संस्कृत के प्रसिद्ध कवि श्रीहर्ष ने जान-बूझकर अपने काव्य में ऐसी गुत्थियाँ डाल दी हैं, जो अज्ञों से न सुलझ सकें और सेनापति ने भी अपनी कविता दुर्बोध कर दी है। तभी तो अलंकारों, मुहावरों और लोकोक्तियों का समावेश भी निबंधों के लिए आवश्यक बताया जाता है। तब क्या किया जाए?

अंग्रेजी के निबंधकारों ने एक दूसरी ही पद्धति को अपनाया है। उनके निबंध इन आचार्यों की कसौटी पर भले ही खरे सिद्ध न हों, पर अंग्रेजी साहित्य में उनका मान अवश्य है। उस पद्धति के जन्मदाता मानटेन समझे जाते हैं। उन्होंने स्वयं जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया। ऐसे निबंधों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मन की स्वच्छंद रचनाएँ हैं। उनमें न कवि की उदात्त कल्पना रहती है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और न विज्ञों की गंभीर तर्कपूर्ण विवेचना। उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है। उनमें उसके सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है, उनमें उसका उल्लास रहता है। ये निबंध तो उस मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं, जिसमें न ज्ञान की गरिमा रहती है और न कल्पना की महिमा, जिसमें जीवन का गौरव भूलकर हम अपने में ही लीन हो जाते है, जिसमें हम संसार को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं और अपने ही भाव से ग्रहण करते हैं। तब इसी पद्धति का अनुसरण कर मैं भी क्यों न निबंध लिखूँ। पर मुझे तो दो निबंध लिखने होंगे।

मुझे अमीर खुसरो की एक कहानी याद आई। एक बार प्यास लगने पर वे एक कुएँ के पास पहुँचे। वहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर पहले उनमें से एक ने खीर पर कविता सुनने की इच्छा प्रकट की, दूसरी ने चरखे पर, तीसरी ने कुत्ते पर और चौथी ने ढोल पर। अमीर खुसरो प्रतिभावान थे, उन्होंने एक ही पद्य में चारों की इच्छाओं की पूर्ति कर दी। उन्होंने कहा-

खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला।

आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।

मुझमें खुसरो की प्रतिभा नहीं है, पर उनकी इस पद्धति को स्वीकार करने से मेरी कठिनाई आधी रह जाती है। मैं भी एक निबंध में इन दोनों विषयों का समावेश कर दूँगा।

 

दूर के ढोल सुहावने होते हैं, क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं। ढोल के उन्हीं शब्दों को सुनकर वह अपने हृदय में किसी के विवाहोत्सव का चित्र अंकित कर लेता है। कोलाहल से पूर्ण घर के एक कोने में बैठी हुई किसी लज्जाशील नव-वधू की कल्पना वह अपने मन में कर लेता है। उस नव-वधू के प्रेम, उल्लास, संकोच, आशंका और विषाद से युक्त हृदय के कंपन ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं। सच तो यह है कि ढोल की ध्वनि के साथ आनंद का कलरव, उत्सव का प्रमोद और प्रेम का संगीत, ये तीनों मिले रहते हैं। तभी उसकी कर्कशता समीपस्थ लोगों को भी कटु नहीं प्रतीत होती और दूरस्थ लोगों के लिए तो वह अत्यंत मधुर बन जाती है।

 

यह बात सच है कि दूर रहने से हमें यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता। यही कारण है कि जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है; जो वृद्ध हो गए हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है। वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं। तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत। वर्तमान से दोनों को असंतोष होता है। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।

 

मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। तभी तो आज तक कितने ही सुधारक हो गए हैं, पर सुधारों का अंत कब हुआ है? भारत के इतिहास में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी में ही सुधारकों की गणना समाप्त नहीं होती। सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है। यह सच है कि जीवन में नए-नए दोष उत्पन्न होते जाते हैं और नए-नए सुधार हो जाते हैं। न दोषों का अंत है और न सुधारों का। जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए हैं और उन सुधारों का फिर नव सुधार किया जाता है। तभी तो यह जीवन प्रगतिशील माना गया है।

 

हिंदी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माता यह समझ रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है। पर कुछ ही समय के बाद उनका यह साहित्य भी अतीत का स्मारक हो जाएगा और आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान में तरुणों का फिर दूसरा दल आ जाएगा, जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

 

 

अभ्यास

 

रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

 

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

 

1. "हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है... असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं।" निबंध में 'हैट' और 'खूँटी' का उल्लेख किस भाव को सबसे अधिक उजागर करता है?

(क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना

(ख) विचार से अधिक तथ्य आधारित सामग्री को प्रमुख बताना

(ग) शैली से अधिक भाषा व्यवस्था की उपयोगिता बताना

(घ) उदाहरण से अधिक सिद्धांत आधारित लेखन का समर्थन करना

सही विकल्प (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना है।

व्याख्या:
ए.जी. गार्डिनर के इस कथन में 'खूँटी' का अर्थ 'विषय' से है और 'हैट' का अर्थ लेखक के 'अपने विचारों और भावों' से है। जिस तरह हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है, उसी तरह एक अच्छे निबंधकार के लिए विषय चाहे कोई भी साधारण सा हो (खूँटी), असली महत्व उस पर व्यक्त किए जाने वाले लेखक के मौलिक विचारों और उसकी अपनी अनूठी शैली (हैट) का होता है।

2. "उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है... उसका उल्लास रहता है।" मानटेन की पद्धति लेखक के लिए किस निर्णय का आधार बनती है?

(क) शैली और स्पष्ट-सहज भाषा को महत्व न देना

(ख) परंपरागत निबंधकारों को अस्वीकार करना

(ग) अध्ययन के बिना अपने विचार प्रस्तुत कर देना

(घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना

सही विकल्प (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना है।

व्याख्या:
मानटेन की पद्धति यह सिखाती है कि निबंध लेखन किसी बाहरी नियम या भारी-भरकम अध्ययन का मोहताज नहीं है। उन्होंने स्वयं वही लिखा जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया। इसी आधार पर लेखक यह निर्णय लेता है कि निबंध में बनावटीपन के स्थान पर अपनी सच्ची अनुभूति, व्यक्तिगत अनुभव और बिना किसी कड़े बंधन के स्वच्छंद (मुक्त) होकर लिखना ही सबसे श्रेष्ठ है।

3. "तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल... वृद्धों के लिए अतीत सुखद..."

यह तुलना किस पर आधारित है?

(क) तर्क और भावना

(ख) ज्ञान और शिक्षा

(ग) परिश्रम और उपलब्धि

(घ) अभिलाषा और अनुभव

सही विकल्प (घ) अभिलाषा और अनुभव है|

व्याख्या:
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी के निबंध 'क्या लिखूँ?' के अनुसार, यह तुलना मनुष्य की दो अलग-अलग अवस्थाओं के दृष्टिकोण को दर्शाती है:

·       तरुण (युवा) अपनी अभिलाषायें और महत्वाकांक्षाओं के कारण भविष्य के सुखद और उज्ज्वल सपने देखते हैं क्योंकि उनके सामने पूरा जीवन पड़ा होता है|

वृद्ध (बुजुर्ग) अपने जीवन के बीते हुए अनुभवों और यादों के सहारे जीते हैं, इसलिए उन्हें अपना बीता हुआ अतीत सबसे अधिक सुखद और गौरवशाली लगता है|

इस प्रकार युवाओं का झुकाव अभिलाषा (भविष्य) की ओर और वृद्धों का झुकाव अनुभव (अतीत) की ओर होता है|

4. निबंध में अमीर खुसरो की कहानी का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है?

(क) कविता लेखन की कला को समझाने के लिए

(ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए

(ग) ढोल के महत्व को दर्शाने के लिए

(घ) सामाजिक सुधार के उदाहरण के रूप में

सही विकल्प (ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए है।

व्याख्या:
पाठ 'क्या लिखूँ?' में लेखक अमीर खुसरो की उस प्रसिद्ध कहानी का संदर्भ देते हैं जहाँ चार कुएँ पर बैठी औरतें उनसे अलग-अलग विषयों (खीर, कुत्ता, ढोल और चरखा) पर कविता सुनाने का आग्रह करती हैं। अमीर खुसरो अपनी विलक्षण प्रतिभा से उन चारों विषयों को मिलाकर एक ही छंद में कविता ("खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला, आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा") सुना देते हैं।

लेखक ने इस कहानी का उल्लेख अपनी उस असमंजस और चुनौती को दर्शाने के लिए किया है, जहाँ उन्हें भी नमिता और अमिता द्वारा दिए गए दो बिल्कुल अलग-अलग विषयों ('दूर के ढोल सुहावने होते हैं' और 'समाज-सुधार') को एक साथ संभालना था।

5. निबंध में समाज-सुधार के संदर्भ में क्या कहा गया है?

(क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।

(ख) सुधार केवल बड़े विचारकों द्वारा संभव हैं।

(ग) सुधार केवल आधुनिक युग की देन हैं।

(घ) सुधारों का कोई अंत नहीं, लेकिन दोष समाप्त हो जाते हैं।

सही विकल्प (क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है। है।

व्याख्या:
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी के निबंध 'क्या लिखूँ?' के अनुसार, समाज-सुधार एक निरंतर (लगातार) चलने वाली प्रक्रिया है। मानव इतिहास में ऐसा कभी कोई समय नहीं आया जब समाज पूरी तरह दोषमुक्त रहा हो। समय के साथ-साथ समाज में नए-नए दोष और कुरीतियां उत्पन्न होती रहती हैं, इसलिए उन्हें दूर करने के लिए हर युग में सुधारों की आवश्यकता अनिवार्य रूप से बनी रहती है।

 

 

मेरी समझ मेरे विचार

 

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

 

1.निबंध लेखन के विषय में ए.जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?

उत्तर - निबंध लेखन के विषय में ए.जी. गार्डिनर का विचार है कि निबंध लेखन एक सहज प्रक्रिया है, जिसमें मानसिक स्फूर्ति आते ही किसी भी साधारण विषय पर तुरंत लिखा जा सकता है। निबंध सरल, रोचक और पाठकों को आकर्षित करने वाला होना चाहिए। वे मानते हैं कि निबंध में लेखक के व्यक्तिगत विचार और अनुभव झलकने चाहिए।

गार्डिनर के अनुसार निबंध लेखन एक सहज प्रक्रिया है, जिसमें मानसिक स्फूर्ति आते ही किसी भी साधारण विषय पर तुरंत लिखा जा सकता है। इसके विपरीत, लेखक (बख्शी जी) के लिए यह एक कठिन और श्रमसाध्य कार्य है, जिसमें उन्हें निश्चित विषयों और नियमों के कारण अत्यधिक मानसिक परिश्रम करना पड़ता है।

2.लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर दोनों की असंतुष्टि के कारण भिन्न हैं। आपके विचार से उनकी असंतुष्टि के क्या-क्या कारण हो सकते हैं?

उत्तर: लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, परंतु उनकी असंतुष्टि के कारण अलग-अलग होते हैं। वृद्ध अपने बीते हुए सुखद दिनों को याद करके वर्तमान को अच्छा नहीं मानते। उन्हें लगता है कि पहले के समय में अधिक शांति, सम्मान और अच्छे संस्कार थे।

वहीं तरुण वर्तमान से इसलिए असंतुष्ट रहते हैं क्योंकि वे भविष्य के सुनहरे सपने देखते हैं और अपनी इच्छाओं तथा आकांक्षाओं को पूरा न होते देखकर दुखी होते हैं।

इस प्रकार, वृद्ध अतीत को याद करके और तरुण भविष्य की कल्पनाओं के कारण वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।

3.नमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं? उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर निबंध लिखने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ आई?

उत्तर:नमिता लेखक से दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ विषय पर निबंध लिखवाना चाहती थी, जबकि अमिता का आग्रह था कि लेखक समाज-सुधार’ विषय पर निबंध लिखे।

लेखक को इन दोनों विषयों पर एक साथ आदर्श निबंध तैयार करने में निम्नलिखित मुख्य कठिनाइयों का सामना करना पड़ा:

1.निबंध का संकुचित आकार-

·       लेखक के अनुसार, 'समाज-सुधार' जैसा गंभीर विषय जिस पर दुनिया के बड़े-बड़े विद्वान एकमत नहीं हो पाए, उसे इतने छोटे रूप में समेटना बहुत मुश्किल था।

2. परस्पर विरोधी और जटिल विषय-

·       दोनों विषय एक-दूसरे से बिल्कुल अलग और वैचारिक रूप से जटिल थे।

·       'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' एक मानसिक स्थिति और कल्पना से जुड़ा विषय था, जबकि 'समाज-सुधार'

एक व्यावहारिक और अंतहीन प्रक्रिया थी।

3. आदर्श निबंध की कसौटियों में विरोधाभास-

·       निबंध-शास्त्र के आचार्यों के अनुसार, श्रेष्ठ निबंध के वाक्य छोटे और आपस में जुड़े होने चाहिए।

·       इसके विपरीत, लेखक का मानना था कि अपनी विद्वता और मास्टर होने का गौरव बनाए रखने के लिए बड़े-बड़े वाक्यों का प्रयोग जरूरी था, जिससे वह दुविधा में पड़ गए।

4. मानसिक स्थिति का अभाव-

लेखक के अनुसार, प्रसिद्ध निबंधकार ए. जी. गार्डिनर की तरह उनके मस्तिष्क में निबंध लिखने के लिए स्वतः कोई आवेग या मानसिक स्फूर्ति उत्पन्न नहीं हो रही थी।

 

नमिता 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' और अमिता 'समाज-सुधार' पर निबंध लिखवाना चाहती हैं। लेखक को सीमित पन्नों (चार-पांच पेज) में इन गंभीर विषयों को समेटने, विचारों में स्पष्टता लाने और निबंधकारों जैसी स्वाभाविक मानसिक स्फूर्ति न होने के कारण लिखने में भारी कठिनाई आई।

4.निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध लिखने की कौन-सी युक्तियाँ सुझाई हैं? आप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं?

उत्तर- निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध लिखने के लिए निम्नलिखित युक्तियाँ सुझाई हैं:

·       विषय का पूर्ण ज्ञान: लेखक को चुने गए विषय की गहराई से जानकारी होनी चाहिए।

·       सीमित और संक्षिप्त रूप: निबंध बहुत लंबा नहीं होना चाहिए, बल्कि मुख्य बातों को कम शब्दों में समेटना चाहिए।

·       छोटे और सुगठित वाक्य: वाक्य छोटे, अर्थपूर्ण और एक-दूसरे से अच्छी तरह जुड़े होने चाहिए।

·       शैली की विशिष्टता: निबंध में लेखक के अपने विचार, मौलिकता और एक अनूठी लेखन शैली झलकनी चाहिए।

 

निबंध लिखने से पहले मेरी तैयारी

मैं किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले निम्नलिखित चरणों में तैयारी करती हूँ:

·       सामग्री जुटाना: किताबों और समाचार पत्रों से विषय से जुड़ी सटीक जानकारी और आंकड़े इकट्ठा करती हूँ।

·       रूपरेखा तैयार करना: निबंध को प्रस्तावना, मुख्य बिंदु और निष्कर्ष जैसे भागों में विभाजित करती हूँ ताकि विचारों का प्रवाह सही रहे।

·       मुख्य बिंदुओं का चयन: सबसे महत्वपूर्ण विचारों को चुनकर उन्हें क्रमानुसार व्यवस्थित करती हूँ।

·       आकर्षक शुरुआत की योजना: निबंध को प्रभावशाली बनाने के लिए किसी प्रासंगिक कविता, सुविचार या उद्धरण का चयन करती हूँ।

 

4. मानटेन ने "जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया।" निबंध लेखन के लिए देखने, सुनने और अनुभव करने की क्या उपयोगिता हो सकती है?

उत्तर- निबंध लेखन में देखने, सुनने और अनुभव करने की उपयोगिता सर्वोपरि है क्योंकि ये तत्व लेखन को सजीव और प्रामाणिक बनाते हैं:

1. देखने की उपयोगिता-

·       सटीक चित्रण: देखी गई वस्तुओं, घटनाओं या दृश्यों का विवरण निबंध में सजीवता और यथार्थ लाता है।

·       सूक्ष्म दृष्टिकोण: बारीकियों को देखकर लिखने से निबंध अन्य सामान्य लेखों से अलग और प्रभावशाली बनता है।

2. सुनने की उपयोगिता-

·       विविध विचार: दूसरों के विचारों, बहसों और लोक-कथाओं को सुनकर विषय के प्रति दृष्टिकोण व्यापक होता है।

·       तथ्यों का संकलन: समाज की समस्याओं और उनके समाधानों को सुनकर निबंध में तार्किक गहराई आती है।

3. अनुभव करने की उपयोगिता-

·       मौलिकता: खुद महसूस की गई बातें निबंध को बनावटीपन से बचाती हैं और उसमें लेखक के असली विचार झलकते हैं।

·       भावनात्मक जुड़ाव: जब लेखक अपने अनुभव साझा करता है, तो पाठक निबंध से सीधे और गहराई से जुड़ पाता है।

"संक्षेप में, देखना और सुनना निबंध के लिए आधारभूत सामग्री जुटाते हैं, और अनुभव उसे प्राण (जीवंतता) देता है।"


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