रीढ़ की हड्डी


जगदीशचंद्र माथुर

 

जगदीशचंद्र माथुर का जन्म सन् 1917 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ और शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। वे इंडियन सिविल सर्विस में भी चयनित हुए। बिहार राज्य के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव आदि प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए वे आजीवन साहित्य-सृजन में सक्रिय रहे।

 प्रयाग में अध्ययन के दौरान ही जगदीशचंद्र माथुर ने लेखन आरंभ कर दिया था। उस समय की चर्चित पत्रिकाओं चाँद और रूपाभ आदि में उनके लिखे नाटक-एकांकी छपने लगे थे। हिंदी नाटक और रंगमंच के विकास में उनके एकांकी व नाटकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐतिहासिक नाटकों के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक समस्याओं से जुड़े एकांकी-नाटक भी लिखे हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं- भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने, शारदीया, पहला राजा, दस तस्वीरें, जिन्होंने जीना जाना। इनकी संपूर्ण रचनाएँ जगदीशचंद्र माथुर रचनावली (चार खंड) में संकलित हैं। कोणार्क उनका सर्वाधिक चर्चित और मंचित नाटक है। सन् 1978 में उनका निधन हो गया।

 

'रीढ़ की हड्डी' एकांकी भारतीय समाज में परंपरागत विवाह की व्यवस्था और स्त्रियों की शिक्षा को लेकर रूढ़िगत सोच पर चोट करती है। इस एकांकी की रचना 1939 में की गई। उस समय भारतीय समाज में शिक्षा और अन्य कार्यक्षेत्रों में स्त्रियों को समान अवसर नहीं मिलते थे। इस एकांकी के माध्यम से विवाह के लिए कम पढ़ी-लिखी लड़‌कियों की माँग, विवाह में लेन-देन जैसी सामाजिक कुरीतियों को उजागर किया गया है। एकांकी की मुख्य पात्र उमा पढ़ी-लिखी सशक्त महिला का प्रतिनिधित्व करती है।

 

 

 

रीढ़ की हड्डी का सारांश

लेखक: जगदीश चंद्र माथुर

प्रस्तावना

रीढ़ की हड्डी’ एक सामाजिक एकांकी है, जिसमें दहेज प्रथा, स्त्री-विरोधी सोच और विवाह के समय लड़कियों की होने वाली उपेक्षा पर तीखा प्रहार किया गया है। लेखक ने समाज की उन रूढ़ियों को उजागर किया है, जिनमें लड़कियों को एक वस्तु की तरह परखा जाता है।

प्रमुख पात्र

  • उमाशिक्षित, आत्मसम्मानी और साहसी युवती।
  • उमा के पिताअपनी बेटी के विवाह को लेकर चिंतित पिता।
  • गोपाल प्रसादलड़के के पिता, जो पारंपरिक और संकीर्ण सोच रखते हैं।
  • शंकरगोपाल प्रसाद का पुत्र।

·       एक दिन उमा के घर उसके विवाह के लिए लड़के वाले आने वाले होते हैं। उमा के पिता उनकी अच्छी तरह से आवभगत की तैयारी करते हैं और चाहते हैं कि यह रिश्ता तय हो जाए।

·       गोपाल प्रसाद अपने पुत्र शंकर के साथ उमा को देखने आते हैं। वे उमा से उसकी शिक्षा, घरेलू कार्यों की योग्यता, गाना-बजाना और अन्य गुणों के बारे में प्रश्न पूछते हैं। उनके व्यवहार से ऐसा लगता है मानो वे किसी वस्तु की जाँच कर रहे हों।

गोपाल प्रसाद का मानना है कि लड़कियों को अधिक पढ़ाने की आवश्यकता नहीं होती। वे चाहते हैं कि लड़की केवल घर संभालने में कुशल हो। दूसरी ओर, शंकर स्वयं आत्मविश्वासहीन और साधारण व्यक्तित्व का युवक है, फिर भी उसके परिवार वाले उमा की कमियाँ खोजने में लगे रहते हैं।

शुरुआत में उमा शांत रहती है, लेकिन जब उसे एहसास होता है कि उसके साथ अपमानजनक व्यवहार किया जा रहा है, तो वह साहसपूर्वक अपना पक्ष रखती है। वह पूछती है कि विवाह के समय केवल लड़कियों की ही परीक्षा क्यों ली जाती है, लड़कों की क्यों नहीं?

उमा के तर्कपूर्ण और आत्मसम्मान से भरे उत्तर गोपाल प्रसाद और शंकर को निरुत्तर कर देते हैं। उसकी निर्भीकता समाज की संकीर्ण मानसिकता पर करारा प्रहार करती है।

शीर्षक की सार्थकता

रीढ़ की हड्डी’ का अर्थ है – साहस, आत्मसम्मान और दृढ़ व्यक्तित्व।

उमा का चरित्र इस बात का प्रतीक है कि प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर महिलाओं में अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस होना चाहिए। यही उसकी रीढ़ की हड्डी है

शिक्षा / संदेश

  • विवाह में लड़कियों को वस्तु की तरह नहीं परखना चाहिए।
  • महिलाओं को सम्मान और समान अधिकार मिलने चाहिए।
  • शिक्षा व्यक्ति को अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने की शक्ति देती है।
  • आत्मसम्मान किसी भी सामाजिक परंपरा से अधिक महत्वपूर्ण है।
  • समाज को पुरानी और भेदभावपूर्ण सोच बदलनी चाहिए।

 

 

 रीढ़ की हड्डी

 

पात्र परिचय-

उमा - लड़की

रामस्वरूप (बाबू) - लड़की का पिता

प्रेमा - लड़की की माँ

शंकर - लड़का

गोपालप्रसाद - लड़के का पिता

रतन - रामस्वरूप का घरेलू सहायक

 

(मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा। अंदर के दरवाजे से आते हुए जिन महाशय की पीठ नजर आ रही है, वह अधेड़ उम्र के मालूम होते हैं। एक तख्त को पकड़े हुए पीछे की ओर चलते-चलते कमरे में आते हैं। तख्त का दूसरा सिरा रतन ने पकड़ रखा है।)

बाबू : अरे धीरे-धीरे चला... अब तख्त को उधर मोड़ दे... उधर।... बस, बस। (तख्त के रखे जाने की आवाज़ आती है।)

रतन : बिछा दें, साहब ?

बाबू : (ज़रा तेज आवाज़ में) और क्या करेगा? परमात्मा के यहाँ अक्ल बँट रही थी तो तू देर से पहुँचा था क्या?... बिछा दूँ साब !... और यह पसीना किसलिए बहाया है?

रतन : (तख्त बिछाता है।) ही-ही-ही।

बाबू : हँसता क्यों है?... अरे, हमने भी जवानी में कसरतें की हैं। कलसों से नहाता था लोटों की तरह। यह तख्त क्या चीज है?... उसे सीधा कर... यों... हाँ, बस। और सुन, बहू जी से दरी माँग ला, इसके ऊपर बिछाने के लिए।... चद्दर भी, कल जो कपड़े धोने वाले के यहाँ से आई है, वही।

 

(रतन जाता है। बाबू साहब इस बीच में मेजपोश ठीक करते हैं। एक झाड़न से गुलदस्ते को साफ करते हैं। कुर्सियों पर भी दो चार हाथ लगाते हैं। सहसा घर की मालकिन प्रेमा का आना। गंदुमी रंग, छोटा कद। चेहरे और आवाज़ से जाहिर होता है किसी काम में बहुत व्यस्त हैं। उनके पीछे-पीछे भीगी बिल्ली की तरह रतन आ रहा है- खाली हाथ। बाबू साहब (रामस्वरूप) दोनों की तरफ देखने लगते हैं।)

प्रेमा : मैं कहती हूँ तुम्हें इस वक्त धोती की क्या जरूरत पड़ गई! एक तो वैसे ही जल्दी-जल्दी में...

रामस्वरूप : धोती?

प्रेमा : हाँ. अभी तो बदलकर आए हो, और फिर न जाने किसलिए...

रामस्वरूप : लेकिन तुमसे धोती माँगी किसने ?

प्रेमा : यही तो कह रहा था रतन।

रामस्वरूप : क्यों रतन, तेरे कानों में डाट लगी है क्या? मैंने कहा था- कपड़े धुलने वाले के यहाँ से जो चद्दर आई है, उसे माँग ला।... अब तेरे लिए दूसरा दिमाग कहाँ से लाऊँ। उल्लू कहीं का।

प्रेमा : अच्छा, जा, पूजावाली कोठरी में लकड़ी के बक्स के ऊपर धुले हुए कपड़े रखे हुए हैं न, उन्हीं में से एक चद्दर उठा ला।

रतन: और दरी?

प्रेमा : दरी यहीं तो रखी है, कोने में। यह पड़ी तो है।

रामस्वरूप : (दरी उठाते हुए) और बीबी जी के कमरे में से हारमोनियम उठा ला, और सितार भी!... जल्दी जा! (रतन जाता है। पति-पत्नी तख्त पर दरी बिछाते हैं।)

प्रेमा : लेकिन वह तुम्हारी लाडली बेटी तो मुँह फुलाए पड़ी है।

रामस्वरूप : मुँह फुलाए?... और तुम उसकी माँ, किस मर्ज की दवा हो? जैसे-तैसे करके तो वे लोग पकड़ में आए हैं। अब तुम्हारी बेवकूफी से सारी मेहनत बेकार जाए तो मुझे दोष मत देना।

प्रेमा : तो मैं ही क्या करूँ? सारे जतन करके तो हार गई। तुम्हीं ने उसे पढ़ा लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है। मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं। अपना जमाना अच्छा था। 'आई' पढ़ ली, गिनती सीख ली और बहुत हुआ तो 'स्त्री-सुबोधिनी' पढ़ ली। सच पूछो तो 'स्त्री-सुबोधिनी' में ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं- ऐसी बातें कि क्या तुम्हारी बी.ए., एम.ए. की पढ़ाई में होंगी। और आजकल के तो लच्छन ही अनोखे हैं।

रामस्वरूप : ग्रामोफोन बाजा होता है न?

प्रेमा : क्यों?

रामस्वरूप : दो तरह का होता है। एक तो आदमी का बनाया हुआ। उसे एक बार चलाकर

जब चाहे रोक लो। और दूसरा परमात्मा का बनाया हुआ। उसका रिकार्ड एक बार चढ़ा तो रुकने का नाम नहीं।

प्रेमा : हटो भी! तुम्हें ठठोली ही सूझती रहती है। यह तो होता नहीं कि उस अपनी उमा को राह पर लाते। अब देर ही कितनी रही है उन लोगों के आने में।

रामस्वरूप : तो हुआ क्या?

प्रेमा : तुम्हीं ने तो कहा था कि ज़रा ठीक-ठाक करके नीचे लाना। आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है? इसी मारे मैंने तो पौडर-वौडर उसके सामने रखा था। पर उसे तो इन चीजों से न जाने किस जनम की नफरत है। मेरा कहना था कि आँचल में मुँह लपेटकर लेट गई। भई, मैं तो बाज आई तुम्हारी इस लड़की से।

रामस्वरूप : न जाने कैसा इसका दिमाग है। वरना, आजकल की लड़कियों के सहारे तो पौडर का कारोबार चलता है।

प्रेमा : अरे, मैंने तो पहले ही कहा था। इंट्रेंस ही पास करा लेते- लड़की अपने हाथ रहती, और इतनी परेशानी न उठानी पड़ती। पर तुम तो...

रामस्वरूप : (बात काटकर) चुप, चुप!... (दरवाजे में झाँकते हुए) तुम्हें कतई अपनी जबान पर काबू नहीं है। कल ही यह बात बता दी थी कि उन सब लोगों के सामने जिक्र और ढंग से होगा। मगर तुम तो अभी से सब-कुछ उगले देती हो। उनके आने तक तो न जाने क्या हाल करोगी।

प्रेमा : अच्छा बाबा, मैं न बोलूँगी। जैसी तुम्हारी मर्जी हो, करना। बस मुझे तो मेरा काम बता दो।

रामस्वरूप : अच्छा तो उमा को जैसे हो तैयार कर लो ! न सही पौडर। वैसे कौन बुरी है। पान लेकर भेज देना उसे। और, नाश्ता तो तैयार है न? (रतन का आना) आ गया रतन... इधर ला, इधर। बाजा नीचे रख दे। चद्दर खोला... पकड़ तो ज़रा उधर से। (चद्दर बिछाते हैं।)

प्रेमा : नाश्ता तो तैयार है। मिठाई तो वे लोग ज्यादा खाएँगे नहीं। कुछ नमकीन चीजें बना दी हैं। फल रखे ही हैं। चाय तैयार है, और टोस्ट भी। मगर हाँ, मक्खन? मक्खन तो आया ही नहीं।

रामस्वरूप : क्या कहा? मक्खन नहीं आया? तुम्हें भी किस वक्त याद आई है। जानती हो कि मक्खन वाले की दुकान दूर है, पर तुम्हें तो ठीक वक्त पर कोई बात  सूझती ही नहीं। अब बताओ, रतन मक्खन लाए कि यहाँ का काम करे। दफ्तर के चपरासी से कहा था आने के लिए, सो नखरों के मारे...

प्रेमा: यहाँ का काम कौन ज्यादा है? कमरा तो सब ठीक-ठाक है ही। बाजा-सितार आ ही गया। नाश्ता यहाँ बराबर वाले कमरे में 'ट्रे' में रखा हुआ है सो तुम्हें पकड़ा दूँगी। एकाध चीज खुद ले आना। इतनी देर में रतन मक्खन ले ही आएगा।... दो आदमी ही तो हैं!

रामस्वरूप : हाँ एक तो बाबू गोपालप्रसाद और दूसरा खुद लड़का है। देखो, उमा से कह देना कि ज़रा करीने से आए। ये लोग ज़रा ऐसे ही हैं, गुस्सा तो मुझे बहुत आता है इनके दकियानूसी खयालों पर। खुद पढ़े-लिखे हैं, वकील हैं, सभा-सोसाइटियों में जाते हैं, मगर लड़की चाहते हैं ऐसी कि ज्यादा पढ़ी-लिखी न हो।

प्रेमा : और लड़का?

रामस्वरूप : बताया तो था तुम्हें। बाप सेर है तो लड़का सवा सेर। बी.एससी. के बाद लखनऊ में ही तो पढ़ता है मेडिकल कॉलेज में। कहता है कि शादी का सवाल दूसरा है, तालीम का दूसरा।

क्या करूँ, मजबूरी है। मतलब अपना है, वरना इन लड़कों और इनके बापों को ऐसी कोरी-कोरी सुनाता कि…ये भी....

रतन : (जो अब तक दरवाजे के पास चुपचाप खड़ा हुआ था, जल्दी-जल्दी) बाबू जी, बाबू जी !

रामस्वरूप : क्या है?

रतन : कोई आते हैं।

रामस्वरूप : (दरवाजे से बाहर झाँककर जल्दी मुँह अंदर करते हुए) अरे, ऐ प्रेमा, वे आ भी गए। (रतन पर नजर पड़ते ही) और तू यहीं खड़ा है! गया नहीं मक्खन लाने?... सब चौपट कर दिया। अरे उधर से नहीं, अंदर के दरवाजे से जा (रतन अंदर आता है।) ... और तुम जल्दी करो, प्रेमा! उमा को समझा देना, थोड़ा-सा गा देगी। (प्रेमा जल्दी से अंदर की तरफ जाती है। उसकी धोती जमीन पर रखे हुए बाजे से अटक जाती है।)

प्रेमा : उँह! यह बाजा, वह नीचे ही रख गया है।

रामस्वरूप : तुम जाओ, मैं रखे देता हूँ।... जल्दी। (प्रेमा जाती है। बाबू रामस्वरूप बाजा उठाकर रखते हैं। किवाड़ों पर दस्तक।)

रामस्वरूप  हैं-हैं-हैं। आइए, आइए!... हैं-हैं-हैं।

(बाबू गोपालप्रसाद और उनके लड़के शंकर का आना। आँखों से लोक चतुराई टपकती है। आवाज़ से मालूम होता है कि काफी अनुभवी और फितरती महाशय हैं। उनका लड़का कुछ खीस निपोरने वाले नौजवानों में से है। आवाज़ पतली है और खिसियाहट भरी। झुकी कमर इनकी खासियत है।)

रामस्वरूप : (अपने दोनों हाथ मलते हुए) हैं-हैं, इधर तशरीफ़ लाइए इधर। (बाबू गोपालप्रसाद बैठते हैं, मगर बेंत गिर पड़ता है।)

रामस्वरूप : यह बेंत!... लाइए मुझे दीजिए। (कोने में रख देते हैं। सब बैठते हैं।) हैं-हैं!... मकान ढूँढ़ने में कुछ तकलीफ तो नहीं हुई?

गोपालप्रसादः (खैखारकर) नहीं। ताँगेवाला जानता था।... और फिर हमें तो यहाँ आना ही था। रास्ता मिलता कैसे नहीं?

रामस्वरूप : हँ-हँ-हैं। यह तो आपकी बड़ी मेहरबानी है। मैंने आपको तकलीफ तो दी...

गोपालप्रसाद: अरे नहीं साहब! जैसा मेरा काम, वैसा आपका काम। आखिर लड़के की शादी तो करनी ही है। बल्कि यों कहिए कि मैंने आपके लिए खासी परेशानी कर दी।

रामस्वरूप : हैं-हँ-हैं! यह लीजिए, आप तो मुझे काँटों में घसीटने लगे। हम तो आपके-हँ-हँ... सेवक हैं। हैं-हैं! (थोड़ी देर बाद लड़के की तरफ मुखातिब होकर) और कहिए, शंकर बाबू, कितने दिनों की और छुट्टियाँ हैं?

शंकर : जी, कॉलेज की तो छुट्टियाँ नहीं हैं। 'वीक-एंड' में चला आया था।

रामस्वरूप : तो आपके कोर्स खत्म होने में तो अब साल-भर रहा होगा?

शंकर : जी, यही कोई साल-दो-साल।

रामस्वरूप : साल-दो-साल?

शंकर : हैं-हैं-हँ!... जी, एकाध साल का 'मार्जिन' रखता हूँ।

गोपालप्रसाद : बात यह है साहब कि यह शंकर एक साल बीमार हो गया था। क्या बताएँ, इन लोगों को इसी उम्र में सारी बीमारियाँ सताती हैं। एक हमारा जमाना था

रामस्वरूप : कि स्कूल से आकर दर्जनों कचौड़ियाँ उड़ा जाते थे, मगर फिर जो खाना खाने बैठते तो वैसी-की-वैसी ही भूख !

 

गोपालप्रसाद : कचौड़ियाँ भी तो उस जमाने में पैसे की दो आती थीं।

जनाब, यह हाल था कि चार पैसे में ढेर-सी बालाई आती थी। और अकेले दो आने की हजम करने की ताकत थी, अकेले ! और अब तो बहुतेरे खेल वगैरह भी होते हैं, स्कूलों में। तब न कोई वालीबॉल जानता था, न टेनिस, न बैडमिंटन। बस कभी हॉकी या कभी क्रिकेट कुछ लोग खेला

करते थे। मगर क्या मजाल कि कोई कह जाए कि यह लड़का कमजोर है। (शंकर और रामस्वरूप खीस निपोरते हैं।)

रामस्वरूप : जी हाँ, जी हाँ! उस जमाने की बात ही दूसरी थी। हैं-हैं!

गोपालप्रसाद : (जोशीली आवाज़ में) और पढ़ाई का यह हाल था कि एक बार कुर्सी पर बैठे कि बारह घंटे की 'सिटिंग' हो गई, बारह घंटे! जनाब, मैं सच कहता हूँ कि उस जमाने का मैट्रिक भी वह अंग्रेजी लिखता था फरटि की, कि आजकल के एम.ए. भी मुकाबिला नहीं कर सकते।

रामस्वरूप : जी हाँ, जी हाँ! यह तो है ही।

गोपालप्रसाद : माफ कीजिएगा बाबू रामस्वरूप, उस जमाने की जब याद आती है, अपने को जब्त करना मुश्किल हो जाता है।

रामस्वरूप हैं-हँ-हैं!... जी हाँ वह तो रंगीन जमाना था, रंगीन जमाना। हैं-हैं-हैं! (शंकर भी ही-ही करता है।)

गोपालप्रसाद : (एक साथ अपनी आवाज़ और तरीका बदलते हुए) अच्छा तो साहब, फिर 'बिजनेस' की बातचीत हो जाए।

रामस्वरूप : (चौंककर) 'बिजनेस'? बिज... (समझकर) ओह!... अच्छा, अच्छा। लेकिन ज़रा नाश्ता तो कर लीजिए। (उठते हैं।)

गोपालप्रसाद : यह सब आप क्या तकल्लुफ़ करते हैं!

रामस्वरूप : हँ-हँ-हैं! तकल्लुफ़ किस बात का! हँ-हँ-हैं! यह तो मेरी बड़ी तकदीर है कि आप मेरे यहाँ तशरीफ़ लाए, वरना मैं किस काबिल हूँ। हैं-हैं!... माफ कीजिएगा ज़रा अभी हाजिर हुआ। (अंदर जाते हैं।)

गोपालप्रसाद : (थोड़ी देर बाद दबी आवाज़ में) आदमी तो भला है। मकान-वकान से हैसियत भी बुरी नहीं मालूम होती। पता चले, लड़की कैसी है।

शंकर : जी... (कुछ खुंखारकर इधर-उधर देखता है।)

गोपालप्रसाद : क्यों, क्या हुआ?

शंकर : कुछ नहीं।

गोपालप्रसादः झुककर क्यों बैठते हो? ब्याह तय करने आए हो, कमर सीधी करके बैठो। तुम्हारे दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर की 'बैकबोन'... (इतने में बाबू रामस्वरूप आते हैं, हाथ में चाय की ट्रे लिए हुए। मेज पर रख देते हैं)

गोपालप्रसाद : आखिर आप माने नहीं।

रामस्वरूप : (चाय प्याले में डालते हुए) हैं-हैं-हैं! आपको विलायती चाय पसंद है या हिंदुस्तानी?

गोपालप्रसाद : नहीं-नहीं साहब, मुझे आधा दूध और आधी चाय दीजिए। ज़रा चीनी भी ज्यादा डालिएगा। मुझे तो भई यह नया फैशन पसंद नहीं। एक तो वैसे ही चाय में पानी काफी होता है, फिर चीनी भी नाम के लिए डाली जाए तो जायका क्या रहेगा?

रामस्वरूप हैं-हैं, कहते तो आप सही हैं। (प्याला पकड़ाते हैं।)

शंकर : (खंखारकर) सुना है, सरकार अब ज्यादा चीनी लेने वालों पर 'टैक्स' लगाएगी।

गोपालप्रसाद : (चाय पीते हुए) हूँ। सरकार जो चाहे सो कर ले; पर अगर आमदनी करनी है तो सरकार को बस एक ही टैक्स लगाना चाहिए।

रामस्वरूप : (शंकर को प्याला पकड़ाते हुए) वह क्या?

गोपालप्रसादः खूबसूरती पर टैक्स! (रामस्वरूप और शंकर हँस पड़ते हैं।) मजाक नहीं साहब, यह ऐसा टैक्स है जनाब कि देने वाले चूँ भी न करेंगे। बस शर्त यह है कि हर एक औरत पर यह छोड़ दिया जाए कि वह अपनी खूबसूरती के 'स्टैंडर्ड' के माफ़िक अपने ऊपर टैक्स तय कर ले। फिर देखिए...

 

 

 

 

रामस्वरूप : (जोर से हँसते हुए) वाह-वाह ! खूब सोचा आपने! वाकई आजकल खूबसूरती का सवाल भी बेढब हो गया है। हम लोगों के जमाने में तो यह कभी उठता भी न था। (तश्तरी गोपालप्रसाद की तरफ बढ़ाते हैं) लीजिए।

गोपालप्रसाद : (समोसा उठाते हुए) कभी नहीं साहब, कभी नहीं।

रामस्वरूप : (शंकर की तरफ मुखातिब होकर) आपका क्या खयाल है, शंकर बाबू?

शंकर : किस मामले में?

रामस्वरूप : यही कि शादी तय करने में खूबसूरती का हिस्सा कितना होना चाहिए।

गोपालप्रसाद : (बीच में ही) यह बात दूसरी है बाबू रामस्वरूप, मैंने आपसे पहले भी कहा था, लड़की का खूबसूरत होना निहायत जरूरी है। कैसे भी हो, चाहे पाउडर वगैरह लगाए, चाहे वैसे ही। बात यह है कि हम-आप मान भी जाएँ, मगर घर की औरतें तो राजी नहीं होतीं। आपकी लड़की तो ठीक है?

रामस्वरूप जी हाँ, वह तो अभी आप देख लीजिएगा।

गोपालप्रसादः देखना क्या। जब आपसे इतनी बातचीत हो चुकी है, तब तो यह रस्म ही समझिए।

रामस्वरूप  हैं-हैं, यह तो आपका मेरे ऊपर भारी एहसान है। हैं-हैं!

गोपालप्रसाद : और जायचा (जन्मपत्र) तो मिल ही गया होगा?

रामस्वरूप : जी, जायचे का मिलना क्या मुश्किल बात है। ठाकुर जी के चरणों में रख दिया। बस, खुद-ब-खुद मिला हुआ समझिए।

गोपालप्रसाद : यह ठीक कहा आपने, बिल्कुल ठीक। (थोड़ी देर रुककर) लेकिन हाँ, यह जो मेरे कानों में भनक पड़ी है, यह तो गलत है न?

रामस्वरूप : (चौंककर) क्या?

गोपालप्रसाद : यह पढ़ाई-लिखाई के बारे में!... जी हाँ, साफ बात है साहब, हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। मेम साहब तो रखनी नहीं, कौन भुगतेगा उसके नखरों को। बस हद से हद मैट्रिक-पास होनी चाहिए... क्यों, शंकर?

शंकर : जी हाँ, कोई नौकरी तो करानी नहीं।

रामस्वरूप : नौकरी का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।

गोपालप्रसादः और क्या साहब! देखिए, कुछ लोग मुझसे कहते हैं कि जब आपने अपने लड़कों को बी.ए., एम.ए. तक पढ़ाया है तब उनकी बहुएँ भी ग्रेजुएट लीजिए। भला पूछिए इन अक्ल के ठेकेदारों से कि क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है। अरे, मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना। अगर औरतें भी वही करने लगीं, अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगीं और 'पालिटिक्स' वगैरह पर बहस करने लगीं तब तो हो चुकी गृहस्थी। जनाब, मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं; शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।

रामस्वरूप   जी हाँ, और मर्द के दाढ़ी होती है, औरत के नहीं...! हूँ... हँ... हँ...! (शंकर भी हँसता है, मगर गोपालप्रसाद गंभीर हो जाते हैं।)

 

गोपालप्रसाद : हाँ, हाँ। वह भी सही है। कहने का मतलब यह है कि कुछ बातें दुनिया में ऐसी हैं जो सिर्फ मर्दों के लिए हैं। और ऊँची तालीम भी ऐसी चीजों में से एक है।

(शंकर से) चाय और लीजिए। रामस्वरूप

शंकर : धन्यवाद। पी चुका।

रामस्वरूप : (गोपालप्रसाद से) आप?

गोपालप्रसाद : बस साहब, अब तो खत्म ही कीजिए।

रामस्वरूप : आपने तो कुछ खाया ही नहीं। चाय के साथ 'टोस्ट' नहीं थे, क्या बताएँ, वह मक्खन...

 

 

 

गोपालप्रसाद : नाश्ता ही तो करना था साहब, कोई पेट तो भरना था नहीं। और फिर टोस्ट-वोस्ट मैं खाता भी नहीं।

रामस्वरूप : हैं-हैं! (मेज को एक तरफ सरका देते हैं। फिर अंदर के दरवाजे की तरफ मुँह कर ज़रा जोर से) अरे, ज़रा पान भिजवा देना...।

(पान की तश्तरी हाथों में लिए उमा आती है। सादगी के कपड़े। गर्दन झुकी हुई। बाबू गोपालप्रसाद आँखें गड़ाकर और शंकर आँखें छिपाकर उसे ताक रहे हैं।)

रामस्वरूप : हँ-हँ!... यही, हैं-हैं, आपकी लड़की है। लाओ बेटी, पान मुझे दो।

(उमा पान की तश्तरी अपने पिता को देती है। उस समय उसका चेहरा ऊपर को उठ जाता है और नाक पर रखा हुआ सोने की रिम वाला चश्मा दीखता है। बाप-बेटे चौंक उठते हैं।)

शंकर : जी हाँ, कोई नौकरी तो करानी नहीं।

रामस्वरूप : नौकरी का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।

गोपालप्रसादः और क्या साहब! देखिए, कुछ लोग मुझसे कहते हैं कि जब आपने अपने लड़कों को बी.ए., एम.ए. तक पढ़ाया है तब उनकी बहुएँ भी ग्रेजुएट लीजिए। भला पूछिए इन अक्ल के ठेकेदारों से कि क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है। अरे, मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना। अगर औरतें भी वही करने लगीं, अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगीं और 'पालिटिक्स' वगैरह पर बहस करने लगीं तब तो हो चुकी गृहस्थी। जनाब, मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं; शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।

रामस्वरूप   जी हाँ, और मर्द के दाढ़ी होती है, औरत के नहीं...! हूँ... हँ... हँ...! (शंकर भी हँसता है, मगर गोपालप्रसाद गंभीर हो जाते हैं।)

गोपालप्रसाद :  हाँ, हाँ। वह भी सही है। कहने का मतलब यह है कि कुछ बातें दुनिया में ऐसी हैं जो सिर्फ मर्दों के लिए हैं। और ऊँची तालीम भी ऐसी चीजों में से एक है।

(शंकर से) चाय और लीजिए। रामस्वरूप

शंकर : धन्यवाद। पी चुका।

रामस्वरूप : (गोपालप्रसाद से) आप?

गोपालप्रसाद : बस साहब, अब तो खत्म ही कीजिए।

रामस्वरूप : आपने तो कुछ खाया ही नहीं। चाय के साथ 'टोस्ट' नहीं थे, क्या बताएँ, वह मक्खन...

गोपालप्रसाद : नाश्ता ही तो करना था साहब, कोई पेट तो भरना था नहीं। और फिर टोस्ट-वोस्ट मैं खाता भी नहीं।

रामस्वरूप : हैं-हैं! (मेज को एक तरफ सरका देते हैं। फिर अंदर के दरवाजे की तरफ मुँह कर ज़रा जोर से) अरे, ज़रा पान भिजवा देना...।

(पान की तश्तरी हाथों में लिए उमा आती है। सादगी के कपड़े। गर्दन झुकी हुई। बाबू गोपालप्रसाद आँखे गड़ाकर और शंकर आँखें छिपाकर उसे ताक रहे हैं।)

रामस्वरूप : हँ-हँ!... यही, हैं-हैं, आपकी लड़की है। लाओ बेटी, पान मुझे दो।

(उमा पान की तश्तरी अपने पिता को देती है। उस समय उसका चेहरा ऊपर को उठ जाता है और नाक पर रखा हुआ सोने की रिम वाला चश्मा दीखता है। बाप-बेटे चौंक उठते हैं।)

गोपालप्रसाद और शंकर : (एक साथ) चश्मा !!!

रामस्वरूप :

(ज़रा सकपकाकर) जी, वह तो... वह पिछले महीने में इसकी आँखें दुखनी आ गई थीं, सो कुछ दिनों के लिए चश्मा लगाना पड़ रहा है।

गोपालप्रसाद :

पढ़ाई-वढ़ाई की वजह से तो नहीं है कुछ?

रामस्वरूप : नहीं साहब, वह तो मैंने अर्ज किया न।

गोपालप्रसाद : हूँ... (संतुष्ट होकर कुछ कोमल स्वर में) बैठो, बेटी।

रामस्वरूप : वहाँ बैठ जाओ उमा, उस तख्त पर, अपने बाजे-वाजे के पास। (उमा बैठती है।)

गोपालप्रसाद : चाल में तो कुछ खराबी है नहीं। चेहरे पर भी छवि है।... हाँ कुछ गाना-बजाना सीखा है?

रामस्वरूप : जी हाँ, सितार भी और बाजा भी। सुनाओ तो उमा एकाध गीत सितार के साथ।

(उमा सितार उठाती है। थोड़ी देर बाद मीरा का मशहूर गीत 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई' गाना शुरू कर देती है। स्वर से जाहिर है कि गाने का अच्छा ज्ञान है। उसके स्वर में तल्लीनता आ जाती है, यहाँ तक कि उसका मस्तक उठ जाता है। उसकी आँखें शंकर की झेंपती-सी आँखों से मिल जाती हैं और वह गाते-गाते एक साथ रुक जाती है।)

रामस्वरूप : क्यों, क्या हुआ? गाने को पूरा करो उमा।

गोपालप्रसाद : नहीं-नहीं साहब, काफी है। लड़की आपकी अच्छा गाती है। (उमा सितार रखकर अंदर जाने को बढ़ती है।)

गोपालप्रसाद: अभी ठहरो, बेटी!

रामस्वरूप : थोड़ा और बैठी रहो, उमा! (उमा बैठती है।)

गोपालप्रसादः (उमा से) तो तुमने पेंटिंग-वेंटिंग भी सीखी है?

उमा :  (चुप)

रामस्वरूप : हाँ, वह तो मैं आपको बताना भूल ही गया। यह जो तसवीर टँगी हुई है, कुत्ते वाली, इसी ने खींची है। और वह उस दीवार पर भी।

गोपालप्रसाद : हूँ! यह तो बहुत अच्छा है। और सिलाई वगैरह?

रामस्वरूप : सिलाई तो सारे घर की इसी के जिम्मे रहती है, यहाँ तक कि मेरी कमीजें भी। हैं-हैं-हैं!

गोपालप्रसाद ठीक!... लेकिन हाँ बेटी, तुमने कुछ इनाम-विनाम भी जीते थे?

(उमा चुप। रामस्वरूप इशारे के लिए खाँसते हैं लेकिन उमा चुप है, उसी तरह गर्दन झुकाए। गोपालप्रसाद अधीर हो उठते हैं और रामस्वरूप सकपकाते हैं।)

रामस्वरूप : जवाब दो, उमा। (गोपालप्रसाद से) हैं-हैं, ज़रा शरमाती है। इनाम तो इसने...

गोपालप्रसाद : (ज़रा रूखी आवाज़ में) ज़रा मुँह तो खोलना चाहिए।

रामस्वरूप : उमा, देखो, आप क्या कह रहे हैं। जवाब दो न।

उमा : (हल्की लेकिन मजबूत आवाज़ में) क्या जवाब दूँ, बाबू जी ! जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है। पसंद आ गई तो अच्छा है, वरना...

रामस्वरूप : (चौंककर खड़े हो जाते हैं।) उमा, उमा!

उमा : अब मुझे कह लेने दीजिए, बाबूजी।... ये जो महाशय मेरे खरीदार बनकर आए हैं, इनसे ज़रा पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होता? क्या उनके चोट नहीं लगती? क्या वे बेबस भेड़-बकरियाँ हैं, जिन्हें कसाई अच्छी तरह दे…भालकर खरीदते हैं?

गोपालप्रसाद : (ताव में आकर) बाबू रामस्वरूप, आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहाँ बुलाया था?

उमा : (तेज आवाज़ में) जी हाँ, और हमारी बेइज्जती नहीं होती जो आप इतनी देर से नाप-तोल कर रहे हैं? और ज़रा अपने इन साहबजादे से पूछिए कि अभी पिछली फरवरी में ये लड़कियों के होस्टल के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे, और वहाँ से कैसे भगाए गए थे!

शंकर : बाबूजी, चलिए।

गोपालप्रसाद : लड़कियों के होस्टल में?... क्या तुम कालेज में पढ़ी हो? (रामस्वरूप चुप)

उमा : जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है। कोई पाप नहीं किया, कोई चोरी नहीं की, और न आपके पुत्र की तरह ताक-झाँककर कायरता दिखाई है। मुझे अपनी इज्जत अपने मान का खयाल तो है। लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह अपना मुँह छिपाकर भागे थे।

रामस्वरूप उमा, उमा !!

गोपालप्रसाद : (खड़े होकर गुस्से में) बस हो चुका। बाबू रामस्वरूप, आपने मेरे साथ दगा किया। आपकी लड़की बी.ए. पास है और आपने मुझको कहा था कि सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ी है। लाइए, मेरी छड़ी कहाँ है। मैं चलता हूँ। (छड़ी ढूँढ़कर उठाते हैं।) बी.ए. पास! उफ्फोह! गजब हो जाता ! झूठ का भी कुछ ठिकाना है। आओ, बेटे, चलें। (दरवाजे की ओर बढ़ते हैं।)

उमा : जी हाँ, जाइए, जरूर चले जाइए! लेकिन घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं- यानी बैकबोन, बैकबोन !

(बाबू गोपालप्रसाद के चेहरे पर बेबसी का गुस्सा है और उनके लड़के के रुलासापन। दोनों बाहर चले जाते हैं। बाबू रामस्वरूप कुर्सी पर धम से बैठ जाते हैं। उमा सहसा चुप हो जाती है। लेकिन उसकी खामोशी सिसकियों में तबदील हो जाती है।) (प्रेमा का घबराहट की हालत में आना।)

प्रेमा

रतन : उमा, उमा... रो रही है? (यह सुनकर रामस्वरूप खड़े होते हैं। रतन आता है।)

 

 

 

 

: बाबूजी, मक्खन !

(सब रतन की तरफ देखते हैं और परदा गिरता है।)

 

अभ्यास

 

रचना से संवाद

 

मेरे उत्तर मेरे तर्क

 

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

 

1. एकांकी 'रीढ़ की हड्डी' का शीर्षक किसका प्रतीक है?

(क) शरीर के एक आवश्यक अंग का

(ख) व्यक्ति की ऊँचाई के आधार का

(ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का

(घ) शारीरिक शक्ति और परिश्रम का

(ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का है।

यह एकांकी केवल शरीर की रीढ़ की हड्डी की बात नहीं करती, बल्कि आत्मसम्मान, साहस, स्वाभिमान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक प्रस्तुत करती है। उमा अपने स्वाभिमान और साहस के बल पर समाज की रूढ़ियों का विरोध करती है, जबकि शंकर नैतिक रूप से रीढ़विहीन दिखाई देता है। इसलिए 'रीढ़ की हड्डी' का वास्तविक अर्थ मजबूत चरित्र और आत्म-सम्मान है, न कि केवल शारीरिक शक्ति।

 

2. 'रीढ़ की हड्डी' एकांकी में किस पर व्यंग्य किया गया है?

(क) पात्रों की निर्धनता और लाचारी पर

(ख) पात्रों की भाषा और हास्य पर

(ग) विवाह और अशिक्षा पर

(घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर

(घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर।

इस एकांकी में लेखक ने समाज की रूढ़िवादी और अनुचित मान्यताओं पर तीखा व्यंग्य किया है। विशेष रूप से विवाह के समय लड़कियों को वस्तु की तरह परखने की प्रथा, दहेज, स्त्री-पुरुष के बीच असमानता तथा स्त्री-शिक्षा के प्रति संकीर्ण सोच की आलोचना की गई है। उमा के माध्यम से लेखक इन सामाजिक कुरीतियों का विरोध करते हैं और आत्मसम्मान तथा समानता का संदेश देते हैं।

3. "घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं"

यह वाक्य शंकर की किस छवि को उजागर करता है?

(क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता

(ख) अनुभव और विवेक की कमी

(ग) चारित्रिक दृढ़ता और शारीरिक दुर्बलता

(घ) उदासीनता और एकाकीपन

(क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता।

उमा का यह कथन शंकर की नैतिक कायरता, व्यक्तित्वहीनता और चारित्रिक दुर्बलता को उजागर करता है। शंकर अपने पिता के सामने अपनी बात रखने का साहस नहीं दिखाता और हर निर्णय में उन पर निर्भर रहता है। साथ ही, उसके पूर्व आचरण से भी उसके चरित्र की कमजोरी स्पष्ट होती है। यहाँ 'रीढ़ की हड्डी' का अर्थ आत्मसम्मान, नैतिक साहस और दृढ़ व्यक्तित्व से है, जो शंकर में नहीं है।

 

4. "जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है।" उमा की दृष्टि में शिक्षा प्राप्त करने का सही अर्थ है?

(क) बड़ी-बड़ी डिग्री प्राप्त करना

(ख) कॉलेज में पढ़ना और नौकरी पाना

(ग) माता-पिता और पति को प्रसन्न रखना

(घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना

 (घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना

नाटक में उमा एक सुशिक्षित, प्रगतिशील और स्वाभिमानी लड़की है। उसके लिए शिक्षा का सही अर्थ केवल किताबी ज्ञान या डिग्रियाँ बटोरना नहीं है, बल्कि शिक्षा से आत्मविश्वास (आत्मबल) जगाना और अपने स्वतंत्र विचार रखना है। वह विवाह के बाजार में खुद को एक 'वस्तु' की तरह पेश किए जाने का कड़ा विरोध करती है और रूढ़िवादी सोच के सामने डटकर अपनी बात रखती है। 

5. गोपालप्रसाद और रामस्वरूप में क्या-क्या समानताएँ हैं?

(क) दोनों प्रगतिशील हैं और रूढ़ियों को नकारते हैं।

(ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।

(ग) दोनों शिक्षा और रूढ़ियों के समर्थक हैं।

(घ) दोनों संगीत और स्वादिष्ट भोजन के प्रेमी हैं।

(ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं

  • गोपालप्रसाद और रामस्वरूप दोनों ही समाज की दकियानूसी परंपराओं और दिखावे के दबाव में जी रहे हैं।
    • रामस्वरूप आधुनिक विचारों के होने और बेटी को उच्च शिक्षा (B.A.) दिलाने के बावजूद, समाज के डर से उसकी पढ़ाई को छुपाते हैं। वे लड़के वालों के सामने अपनी सुशिक्षित बेटी को एक 'वस्तु' की तरह पेश करने के लिए विवश हैं।
    • गोपालप्रसाद खुद वकील हैं और उनका बेटा मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है, लेकिन वे बहू अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी चाहते हैं ताकि वह उनके नियंत्रण में रहे। वे विवाह को एक 'बिजनेस' (दिखावा और सौदा) मानते हैं। 
  •  

    6. इस एकांकी की संवाद शैली मुख्यतः कैसी है?

    (क) औपचारिक और शुष्क

    (ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण

    (ग) काव्यात्मक और प्रश्नात्मक

    (घ) भावुक और संक्षिप्त

     (ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण

     एकांकी की संवाद शैली आम बोलचाल की भाषा जैसी स्वाभाविक  है, जिससे पात्र बहुत जीवंत लगते हैं। इसके साथ ही, पूरी एकांकी में समाज की दोहरी मानसिकता और रूढ़िवादिता पर तीखा व्यंग्य किया गया है। विशेषकर उमा और गोपालप्रसाद के संवादों में व्यंग्य की प्रधानता है, जो समाज के खोखलेपन को उजागर करती है।

    मेरी समझ मेरे विचार

    नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

     

    1. बाबू रामस्वरूप समाज में आधुनिक व्यवहार का दिखावा करते हैं, जबकि उनके विचार रूढ़िवादी हैं। इस अंतद्वंद्व के उदाहरण एकांकी में से खोजकर लिखिए।

    (संकेत- उमा के साथ उनका व्यवहार, विवाह के लिए दिखावे करना किंतु इन प्रयासों को छिपाने की चेष्टा करना आदि।)

    उत्तर - बाबू रामस्वरूप का चरित्र आधुनिकता और रूढ़िवादिता के इसी अंतद्वंद्व का सबसे बड़ा उदाहरण है। वे समाज में खुद को प्रगतिशील दिखाना चाहते हैं, लेकिन जैसे ही रूढ़िवादी परंपराओं का दबाव आता है, वे उनके सामने झुक जाते हैं।

    एकांकी के आधार पर इस अंतद्वंद्व के मुख्य उदाहरण निम्नलिखित हैं:

    उच्च शिक्षा दिलाना बनाम उसे छिपाना (मुख्य विरोधाभास)

    ·       आधुनिक व्यवहार: उन्होंने अपनी बेटी उमा को कॉलेज भेजा, बी.ए. (B.A.) तक पढ़ाया और उसे संगीत व कला की शिक्षा भी दिलाई। वे स्त्री-शिक्षा के विरोधी नहीं हैं।

    ·       रूढ़िवादी विचार: जब लड़के वाले (गोपाल प्रसाद और शंकर) घर आते हैं, तो वे डर जाते हैं कि लड़के वालों को पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। इसलिए वे उमा की शिक्षा को छिपाते हैं और उसे सिर्फ 'मैट्रिक' (दसवीं) पास बताते हैं।

    2. उमा के साथ वस्तु जैसा व्यवहार और दिखावा करना

    ·       आधुनिक व्यवहार: मेहमानों के स्वागत के लिए वे घर को आधुनिक मेजपोश, ग्रामोफोन और हारमोनियम जैसी चीज़ों से सजाते हैं ताकि उनका परिवार सभ्य और मॉडर्न लगे।

    ·       रूढ़िवादी विचार: वे उमा को सख्त हिदायत देते हैं कि वह पाउडर लगाकर और सज-धजकर आए। वे अपनी बेटी के गुणों और आत्मसम्मान की परवाह किए बिना उसे लड़के वालों के सामने एक 'बिकने वाली वस्तु' या 'नुमाइश की चीज़' की तरह पेश करते हैं।

    3. प्रयासों को छिपाने की चेष्टा (ढोंग करना)

    ·       आधुनिक व्यवहार: वे जताते हैं कि वे अपनी मर्जी के मालिक हैं और एक सम्मानित घर के मुखिया हैं।

    ·       रूढ़िवादी विचार: जब उमा को देखने की तैयारी चल रही होती है, तो वे अपने नौकर रतन पर बात-बात पर गुस्सा करते हैं ताकि लड़के वालों के सामने उनकी कोई कमी न पकड़ी जाए। वे इस बात को छुपाने की पूरी कोशिश करते हैं कि वे लड़के वालों की दकियानूसी शर्तों के आगे लाचार हैं।

    4. चरित्रहीन लड़के के सामने आत्मसमर्पण

    ·       आधुनिक व्यवहार: वे एक पढ़े-लिखे समाज का हिस्सा हैं जहाँ सही और गलत की समझ होती है।

    ·       रूढ़िवादी विचार: वे जानते हैं कि गोपाल प्रसाद का बेटा शंकर चरित्रहीन है और उसकी खुद की कोई प्रतिष्ठा (रीढ़ की हड्डी) नहीं है। फिर भी, केवल अपनी बेटी की शादी कराने की रूढ़िवादी मजबूरी के कारण, वे गोपाल प्रसाद की हर गलत और बेतुकी बात पर "जी हाँ, जी हाँ" कहकर हाँ में हाँ मिलाते हैं

    निष्कर्ष: रामस्वरूप का चरित्र यह दिखाता है कि समाज में कई लोग आधुनिक होने का केवल बाहरी मुखौटा पहनते हैं, जबकि भीतर से वे आज भी पुरानी और दकियानूसी सोच के गुलाम होते हैं।

     

     

    2. 'रीढ़ की हड्डी' का संदर्भ दो अलग-अलग पात्रों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थों में आया है,उनकी पहचान कीजिए और लिखिए।

    उत्तर - जगदीशचंद्र माथुर द्वारा रचित एकांकी 'रीढ़ की हड्डी' में 'रीढ़ की हड्डी' शब्द का प्रयोग दो प्रमुख पात्रों—उमा और शंकरके लिए बिल्कुल भिन्न अर्थों में किया गया है।

    1. उमा के संदर्भ में – आत्मसम्मान, नैतिक साहस और चारित्रिक दृढ़ता का प्रतीक

     उमा एकांकी की मुख्य नायिका है। वह बी.ए. पास, शिक्षित, बुद्धिमान और प्रगतिशील विचारों वाली युवती है।

    उमा के लिए 'रीढ़ की हड्डी' का अर्थ आत्मसम्मान, नैतिक साहस और मजबूत चरित्र है। वह समाज की रूढ़िवादी परंपराओं के सामने झुकने से इंकार करती है। विवाह के नाम पर लड़कियों को वस्तु की तरह परखे जाने का वह साहसपूर्वक विरोध करती है। अन्याय और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस ही उसकी वास्तविक 'रीढ़' है।

    2. शंकर के संदर्भ में – व्यक्तित्वहीनता और नैतिक दुर्बलता का प्रतीक

     शंकर गोपाल प्रसाद का पुत्र है, जो उमा को देखने विवाह-प्रस्ताव लेकर आता है।

    शंकर के लिए 'रीढ़ की हड्डी' का प्रयोग शारीरिक कमजोरी और नैतिक रीढ़विहीनता के अर्थ में किया गया है।

    शारीरिक रूप से: उसकी पीठ झुकी हुई है, इसलिए वह ठीक प्रकार से सीधा बैठ या चल नहीं पाता।

    मानसिक एवं चारित्रिक रूप से: उसका अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं है। वह हर बात में  अपने पिता पर निर्भर रहता है। इसके अतिरिक्त, वह कॉलेज के समय लड़कियों के छात्रावास के आसपास घूमते हुए पकड़ा गया था और अपमानित होकर माफी माँगनी पड़ी थी। इससे स्पष्ट होता है कि उसमें नैतिक साहस और चरित्र की दृढ़ता का अभाव है इस प्रकार, एकांकी 'रीढ़ की हड्डी' में उमा सच्चे अर्थों में आत्मसम्मान, साहस और दृढ़ चरित्र की 'रीढ़' का प्रतीक है, जबकि शंकर शारीरिक तथा नैतिक दोनों दृष्टियों से रीढ़विहीन व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। लेखक ने इन दोनों पात्रों के माध्यम से यह संदेश दिया है कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके चरित्र, आत्मसम्मान और नैतिक साहस से होती है, न कि केवल उसके बाहरी रूप या सामाजिक प्रतिष्ठा से।

    3. "मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं।" प्रेमा की इस सोच से उस समय की स्त्री-शिक्षा की स्थिति के विषय में क्या पता चलता है?

    उत्तर - प्रेमा का यह कथन उस समय के भारतीय समाज में स्त्री-शिक्षा के प्रति रूढ़िवादी और संकीर्ण सोच को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। उस समय अधिकांश लोगों का मानना था कि लड़कियों के लिए अधिक पढ़ाई-लिखाई आवश्यक नहीं है। उन्हें केवल घर-गृहस्थी संभालने और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ निभाने तक सीमित रखा जाता था।

    प्रेमा स्वयं भी पढ़ाई-लिखाई को 'जंजाल' मानती है, जिससे पता चलता है कि महिलाओं में शिक्षा के महत्व के प्रति पर्याप्त जागरूकता नहीं थी। समाज में स्त्री-शिक्षा को अधिक महत्व नहीं दिया जाता था और शिक्षित लड़कियों को कई बार संदेह या आलोचना की दृष्टि से देखा जाता था।

    निष्कर्ष:
    प्रेमा की सोच उस समय के रूढ़िवादी समाज का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ स्त्रियों की शिक्षा की उपेक्षा की जाती थी और उन्हें शिक्षा के बजाय घरेलू कार्यों तक ही सीमित रखने की मानसिकता प्रचलित थी।

     

    4. लेखक ने 'रीढ़ की हड्डी' शब्द को एकांकी के शीर्षक के रूप में क्यों चुना होगा? यदि आप इस एकांकी का दूसरा शीर्षक रखना चाहें, जो इसकी मुख्य बात को दर्शाए, तो वह क्या होगा और क्यों?

    उत्तर- लेखक ने 'रीढ़ की हड्डी' शीर्षक इसलिए चुना है क्योंकि यह केवल शरीर के एक अंग का नाम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, नैतिक साहस, स्वाभिमान और दृढ़ व्यक्तित्व का प्रतीक है। एकांकी में उमा अपने साहस और स्पष्ट विचारों के कारण सच्ची 'रीढ़' वाली पात्र सिद्ध होती है, जबकि शंकर शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टियों से रीढ़विहीन दिखाई देता है। इस प्रकार यह शीर्षक पूरे नाटक के केंद्रीय विचार को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है।

    यदि मुझे इस एकांकी का दूसरा शीर्षक रखना हो, तो मैं "नारी का स्वाभिमान" रखूँगी।

    कारण: जहाँ 'रीढ़ की हड्डी' समाज की कमजोरी पर व्यंग्य करती है, वहीं नारी का स्वाभिमान ' नारी सशक्तिकरण और समाज में बदलाव की एक मजबूत प्रेरणा देता है।
    यह शीर्षक एकांकी के मुख्य संदेश को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है। पूरी कहानी उमा के आत्मसम्मान, साहस और सामाजिक कुरीतियों के विरोध पर आधारित है। वह विवाह के नाम पर होने वाले अपमान और दिखावे का विरोध करती है तथा यह सिद्ध करती है कि नारी कोई वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान और समान अधिकारों की अधिकारी है। इसलिए "नारी का स्वाभिमान" इस एकांकी का उपयुक्त वैकल्पिक शीर्षक हो सकता है।

     


    Comments