शेखर जोशी-

 

शेखर जोशी का जन्म सन् 1932 में अल्मोड़ा, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका पहला कहानी संग्रह कोसी का घटवार सन् 1958 में प्रकाशित हुआ। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं- साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, आदमी का डर, डांगरी वाले, मेरा पहाड़ (कहानी संग्रह), एक पेड़ की याद (शब्दचित्र-संग्रह), स्मृति में रहें वे (संस्मरण), न रोको उन्हें शुभ्रा (कविता संग्रह), मेरा ओलिया गाँव (आत्मवृत्त)। उनकी कहानियों का संग्रह शेखर जोशी कथा समग्र शीर्षक से प्रकाशित है। शेखर जोशी ने ग्रामीण-शहरी मध्यवर्गीय समाज के जीवन-मूल्यों तथा कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के जीवन-संघर्षों को अपनी कहानियों में प्रमुखता से उभारा है।

उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 'महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार' तथा 'साहित्य भूषण सम्मान', मध्य प्रदेश शासन द्वारा 'अखिल भारतीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान' तथा 'श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। सन् 2022 में उनका निधन हो गया।

'संवादहीन' कहानी ग्रामीण वृद्ध स्त्री के अकेलेपन की संवेदनशील कहानी है। कहानी के दो मुख्य पात्र ताई और मिट्ठू हैं। मिठू ताई के लिए केवल एक तोता नहीं बल्कि संवाद का माध्यम और ममता का केंद्र है। इन दोनों के बीच कभी प्रेमपूर्ण संवाद है तो कभी नोक-झोंक भी रहती है। मनुष्य और पशु-पक्षी के संबंधों को दर्शाने के साथ ही यह कहानी समकालीन जीवन-यथार्थ की विसंगतियों, जैसे- पलायन, अकेलेपन और आदर्श एवं यथार्थ के द्वंद्व को अभिव्यक्त करती है।

 

 

 

 

 

संवादहीन – सारांश

लेखक : शेखर जोशी

विधा : कहानी

संवादहीन’ कहानी आधुनिक जीवन में बढ़ते अकेलेपन, पारिवारिक विघटन और घटते मानवीय संबंधों की मार्मिक अभिव्यक्ति है। कहानी की मुख्य पात्र ताई हैं, जो गाँव में अकेली रहती हैं। उनके परिवार के सदस्य रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में शहरों में बस चुके हैं, जिसके कारण उनका घर सूना और जीवन नीरस हो गया है।

ताई के पास अपनी भावनाएँ साझा करने वाला कोई नहीं है। ऐसे में उनका पालतू तोता मिट्ठू ही उनका एकमात्र साथी बन जाता है। वे उससे बातें करती हैं और अपने सुख-दुःख उसी के साथ बाँटती हैं। मिट्ठू उनके लिए केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि स्नेह, अपनत्व और संवाद का माध्यम है।

एक दिन जगन मास्टर पक्षियों को स्वतंत्र रखने के विचार से मिट्ठू को पिंजरे से मुक्त कर देते हैं। मिट्ठू के उड़ जाने के बाद ताई पूरी तरह अकेली हो जाती हैं। उनके जीवन का अंतिम भावनात्मक सहारा भी छिन जाता है।

कहानी के माध्यम से लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि भौतिक प्रगति और व्यस्त जीवनशैली के कारण परिवारों में भावनात्मक दूरी बढ़ रही है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव बुज़ुर्गों पर पड़ता है। मनुष्य को केवल सुविधाओं की नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान, अपनापन और निरंतर संवाद की भी आवश्यकता होती है।

मुख्य संदेश

परिवार के बुज़ुर्गों के साथ समय बिताना, उनकी भावनाओं को समझना और उनसे नियमित संवाद बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

संवादहीनता रिश्तों को कमजोर करती है, जबकि प्रेम और अपनापन उन्हें सुदृढ़ बनाते हैं।

 

 

संवादहीन-

 

गहरी साँस लेकर ताई कहतीं, "भगवान! कैसे नैया पार लगेगी?" और बंद पिंजड़े में अपने पंखों को फड़फड़ाता, उछल-कूद मचाता मिट्ठू उत्तर देता, "राम-राम कहो, सीताराम कहो।"

ताई दुहरातीं- सीताराम ! सीताराम !

ताई और मिट्टू

मिठू और ताई।

अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे। ताई ने अपने जीवन में अच्छे दिन भी देखे थे। पूत-परिवार, बहू-बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, क्या नहीं था बड़े घर में! देखते ही देखते क्या से क्या हो गया! बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए। बेटियाँ अपने-अपने हाथ पीले कराकर अपनी गृहस्थी में रम गईं, किसके भरोसे कारबार संभलता। धीरे-धीरे सब पराए हाथों में चला गया। जब खेती-बाड़ी नहीं, कारबार नहीं, तो नौकर-चाकर किस दम पर टिकते ! अपनी अकेली जान के लिए ताई दो जून का एक जून चूल्हा फूँक लेतीं, व्रत-उपवास के बहाने चौका-चूल्हा टाल जातीं, पेट की समस्या उनके लिए कभी समस्या नहीं रही, पर सूने घर की भाँय-भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।

भला हो गनपत का, जिसने ताई के सूनेपन को सहारा दे दिया था, वह न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था। ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी। वह रात-दिन मिठू को लेकर ही बेचैन रहने लगीं। जो ताई अपनी खातिर चूल्हा जलाने में आलस्य कर जाती थीं, वही अब नियमपूर्वक मिठू के लिए दाल-भात बनातीं। मिठू के वक्त-बेवक्त के तकाजों के लिए रोटी बचाकर रखतीं। अब ताई को इस बात की पूरी जानकारी रहने लगी थी कि किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हो गई हैं और किस पेड़ में फसल के आखिरी अमरूद बचे हैं।

कुशाग्र बुद्धि छात्र की तरह मिठू ताई के पढ़ाए पाठ को न केवल हू-ब-हू दुहरा देता बल्कि एक-दो बार सुनकर याद भी रख लेता था और मौके बे-मौके ताई के सवालों का सटीक उत्तर दे देता। बड़े घर का सूनापन धीरे-धीरे मिट्ठू की बातचीत से अब रौनक में बदल गया था, अड़ोस-पड़ोस की बहू-बेटियाँ बच्चों को गोदी में उठाकर मिट्ठू से उनका मन बहलाने के लिए आ जुटीं और घर गुलजार हो जाता। सुबह पौ फटने लगती, पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं तो मिट्ठ भी जैसे ताई को भोर की झपकी से जगाने के लिए ही अपना पाठ शुरू कर देते-

हर हर गंगे!

हर हर गंगे !!

सीताराम बोल !

 

 

सीताराम बोल !!

मिठू राम राम !

मिठू राम राम !!

ताई अचकचाकर उठ बैठतीं। लाड़ से मिट्ठू को निहारकर आशीष देतीं- "जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ" और मिट्ठू भी बदले की निहारकर डू भी बदले में अपनी बुजुर्गी दिखाकर कहते-

खुश रहो !

खुश रहो!!

ताई निहाल हो जातीं। वृद्धावस्था का शरीर और उस पर नई गृहस्थी का भार, काम-काज से थककर ताई जब कभी पिंजरे को बगल में रखकर सुस्ताने लगतीं तो अनायास ही मिठू से सवाल कर बैठतीं, "मिट्ठू! अब कैसे कटेगी?" और नौजवान मिट्ठू ताई के बुढ़ापे का सहारा बनकर दम-खम के साथ उन्हें दिलासा देते-

कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!!

ताई के थके शरीर में प्राण लौट आते, और तब उस अलस दोपहरी में ताई मिट्ठू को अपनी राम-कहानी सुनाने लगतीं। वैभव और सत्ता के बीते दिनों की गाथा। काल की अतल गहराइयों से झाँकता एक-एक चेहरा ताई को नए-नए प्रसंगों की याद दिला देता - जमींदारसाहब का रोबीला चेहरा, उनके उपकारों से दबी प्रजा के अनगिनत चेहरे, वे हाथी, वे घोड़े, वे खेल-तमाशे, वे ब्याह-शादियाँ, तीज-त्योहार, जन्म और मृत्यु-पर्व, वे भोज, वे दावतें, जमींदार साहब के दरबार की रौनक, उनकी गुणग्राहकता, उनकी तुनकमिजाजी, उनका गुस्सा, उनके इशारे पर मर मिटने वाले लोग... ताई घंटों तक मिट्ठू को अपनी जीवन-गाथा सुनाती रहतीं और वह अपनी गर्दन टेढ़ी कर कभी

 

 

 

 

धैर्यवान श्रोता बना रहता और कभी अपनी समझ के अनुसार बीच-बीच में कुछ टीका-टिप्पणी कर देता।

ऐसा नहीं कि ताई और मिट्ठू का संवाद हमेशा प्रेमपूर्ण ही रहता हो, कभी-कभी ताई थकी-माँदी लेटी होतीं और अपनी किसी जिद को मनवाने के लिए मिट्ठू पिंजड़े में तूफान खड़ा कर देते। पानी और दाने की कटोरियों को जान-बूझकर उलटा देते, तो खीझकर ताई कोसतीं, "मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!" और मिट्ठू भी उतनी ही खीझ के साथ हमला बोल देते, "मर जा! मर जा! मर जा!" फिर मान-मनौवल का दौर चलता और ताई और मिठू की दुनिया पहले की तरह प्रेम से चलने लगती।

ताई को घड़ी-भर के लिए भी मिट्ठू का वियोग सहन नहीं हो सकता था। कभी-कभार गाँव में थोड़ी देर के लिए भी न्यौते-बुलावे में जातीं, तो दस बार खिड़की-दरवाजों की साँकलें टोहकर देखतीं, कंजूस के धन की तरह मिट्ठू को छिपाकर रखतीं और जल्दी लौट आने का दिलासा देकर देहरी से पाँव बाहर निकालतीं। लेकिन एक संयोग आ पड़ा कि ताई धर्म-संकट में पड़ गईं। इस लोक में ताई ने बहुत ऊँच-नीच देख लिए थे, अब कभी-कभी परलोक की चिंता भी मन में घर कर जाती। गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे, अच्छा साथ बन रहा था। प्रयाग में कुंभ-स्नान का लोभ जहाँ उन्हें अपनी ओर खींच रहा था, वहीं मिट्ठू की चिंता अपनी ओर खींच रही थी। हँसी-हँसी में किसी ने सलाह दी, "ताई, मिठू को भी साथ ले चलो, उसे भी गंगा-स्नान करा देना।" किसी दूसरे ने टोक दिया कि रेलगाड़ी में उसका भी टिकट लगेगा, आखिर वह भी तो बोलता-बतियाता प्राणी है। ताई पशोपेश में पड़ गईं। टिकट का पैसा भी वह मिठू की खातिर खर्च कर देतीं लेकिन मेले-ठेले, भीड़-भाड़ में उसकी सुरक्षा के बारे में उन्हें पूरा भरोसा नहीं था, अंत में जगन मास्टर की घरवाली ने उनकी चिंता दूर कर दी। वह ताई के लौटने तक मिट्ठू को अपने पास रखने के लिए सहमत हो गई थी। विदा के दिन ताई की आँसुओं की धार रुके नहीं रुकती थी। बार-बार वह मिठू को पुचकारतीं, जल्दी लौट आने का दिलासा देतीं। मिट्ठू भी उनकी बातों के उत्तर में 'हर हर गंगे', 'राम राम सीताराम' कहकर उन्हें भरोसा देते रहे कि वह जगन मास्टर की घरवाली के साथ प्रेम से रह लेंगे।

 

ताई तो कुंभ-स्नान के लिए चल दीं। लेकिन जगन मास्टर के घर में महाकुंभ हो गया।

अपने पति से सलाह लिए बिना मास्टराइन ने ताई का भार अपना लिया था। जगन मास्टर दूसरे मिजाज के आदमी थे। उन्होंने अपने कुछ नियम-सिद्धांत बना रखे थे और भरसक कोशिश करते थे कि उनके कारण किसी को कोई कष्ट न पहुँचे। स्वतंत्र विचारों के आदमी थे। दूसरों की स्वतंत्रता पर बाधा नहीं डालना चाहते थे। पिंजड़े में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होने

 

 

लगती। जब-जब मिठू को देखते, अपनी पत्नी की बुद्धि पर तरस खाते और अपने आप को भी भी दोषी अनुभव करते।

जगन मास्टर के लिए जब मिठू की यातना असह्य हो गई तो उन्होंने एक दिन कमरा बंदकर मिट्ठू के पिंजरे को जमीन पर रखा और उसका दरवाजा खोल दिया, ताकि उसे कुछ देर के लिए ही सही, खुली हवा में आने का मौका देकर अपने पाप का थोड़ा प्रायश्चित कर लें। मिट्ठू अब पिंजरे में रहने के इतने आदी हो चुके थे कि उन्होंने बाहर आने की कोई इच्छा नहीं प्रकट की। जगन मास्टर भी अपनी धुन के पक्के थे। निकट ही अनाज का थैला पड़ा हुआ था। उन्होंने मुट्ठी में थोड़ा अनाज लेकर पिंजरे के दरवाजे से लेकर बाहर तक बिखेर दिया और स्वयं अलग हटकर उसे देखते रहे। मिट्टू धीरे-धीरे दाना चुगते हुए बाहर आ गए तो जगन मास्टर ने संतोष की साँस ली। मिठू फिर पिंजरे की छत पर बैठ गए। एक दो घंटे बाद जगन मास्टर ने उन्हें पकड़कर फिर पिंजरे में बंद कर दिया और चैन की साँस लेकर पिंजरे को बरामदे में टाँग दिया।

 

अब जगन मास्टर हर रोज कमरा बंद करते। मिट्ठू को बाहर आने का आमंत्रण और उनकी आजादी का सुख स्वयं भोगते। यह क्रम तीन-चार दिन तक चला ही था कि एक दिन मिठू की नजर ऊपर खुले रोशनदान पर पड़ गई और सहज कौतूहलवश वह पिंजरे की छत से तिरछी आँख अपने लक्ष्य की ओर देखकर रोशनदान पर पहुँच लिए। जगन मास्टर का ध्यान अचानक 'गीता-रहस्य' से हटकर मिठू के पंखों की फड़फड़ाहट पर गया, फिर रोशनदान पर बैठे मिठू पर। जगन मास्टर हाथ में अनाज लेकर 'आ-आ' की गुहार लगा ही रहे थे कि मिठू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और ये गए। वो गए!! अकेले मिट्ठू क्या

 

 

 

उड़े, आदर्शवादी जगन मास्टर के हाथों के सभी तोते उड़ गए। ढीली धोती को दोनों हाथों से सँभालते हुए वह बाग में एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पास, 'मिट्ठू आ! मिट्ठू आ!!' पुकारते हुए पसीना-पसीना होते रहे और मिट्ठू एक डाल से दूसरी डाल पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने पंख तौलने में मशगूल रहे।

ताई के लौटने का दिन निकट आ रहा था। गाँव में सभी के मन में इस अनहोनी घटना ने एक गहरी आशंका को जन्म दे दिया था। ताई के तेज स्वभाव के अतिरिक्त मिट्टू के प्रति उनके लगाव को सभी जानते थे और लौटकर मिट्ठू को न पाने पर उनकी क्या दशा हो सकती है,

 

 

 

इसका अनुमान वे भली-भाँति लगा सकते थे। बहुत सोच-विचार के बाद आखिर गनपत ने ही एक सुझाव दिया कि मिठू की ही सूरत-शक्ल का एक दूसरा तोता ले आया जाए, ताकि ताई को भ्रम में रखा जा सके और दूसरे दिन सच ही वह तोता लेकर हाजिर हो गया।

अब जगन मास्टर की जिंदगी का एक नया दौर शुरू हुआ। वह तोते को पिंजरे में रखकर पाठ पढ़ाने लगे, ताकि ताई के आने तक वह भी दो अक्षर सीख ले। यह एक संयोग ही है कि जगन मास्टर ने अंतिम दिन ताई के मिठू को गीता के दो-चार श्लोक रटाने की कल्पना की थी, ताकि गंगा-स्नान का पुण्य अर्जन कर लौटी हुई ताई अपने मिट्ठू के मुँह से गीता सुन सकें, लेकिन वह अनहोनी हो गई और अब जगन मास्टर अपनी फिक्र के मारे खाना-पीना छोड़कर घंटों पिंजरे के सामने बैठकर रटते-

मिट्टू, राम राम

सीताराम सीताराम हर गंगे, हर गंगे

राम राम, सीताराम

बोलते-बोलते उनका गला सूख जाता, मास्टराइन भोजन ठंडा होने की शिकायत करतीं, तो आग्नेय दृष्टि से उनकी ओर देखकर पानी पीकर फिर दुहराते

राम राम

सीताराम, हर गंगे...

फिर खीझकर कहते मर जा! मर जा!!

पर वह पिंजरे के अंदर से टुकुर-टुकुर उन्हें देखता रहता या शायद उनकी बेवकूफी पर हँसता रहता हो।

कुंभ-स्नान से लौटकर सभी तीर्थयात्री अपने-अपने घरों की ओर चल दिए लेकिन ताई सीधे बड़े घर की ओर न जाकर जगन मास्टर के दरवाजे पहुंचीं। ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिठू 'राम राम सीताराम' की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा, पिंजड़े में कूद-फाँद

 

 

 

मचाकर तूफान खड़ा कर देगा, लेकिन वहाँ बैठे एवजी मिठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की, वह केवल इधर-उधर ताकता रहा। ताई अपने मिठू को गुहार कर थक गई लेकिन उनके सूनेपन का साथी न जाने किन अमराइयों में घूम रहा होगा।

 

अभ्यास

रचना से संवाद-

 

मेरे उत्तर मेरे तर्क

 

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

1. कहानी में ताई और मिट्ठू का संबंध किस भाव को दर्शाता है?

(क) परोपकार और त्याग

(ख) ममता और स्नेह

(ग) करुणा और क्रोध

(घ) जिज्ञासा और सहायता

(ख) ममता और स्नेह : कहानी 'संवादहीन' में ताई के अकेलेपन और परिवार से दूरी के कारण उनके जीवन में एक गहरा शून्य आ गया था। जब मिट्ठू (तोता) उनके जीवन में आता है और उनसे बातें करता है, तो ताई का दबा हुआ मातृत्व भाव और प्रेम जाग उठता है। वे उसे अपने बेटे की तरह प्यार करती हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि दोनों का संबंध शुद्ध ममता और गहरे स्नेह पर आधारित है।

 

 2. जगन मास्टर द्वारा मिट्ठू को पिंजरे से बाहर निकालना देता है?

(क) अनुशासन और परंपरा

(ख) उदासीनता और असावधानी

(ग) आत्मगौरव और विद्रोह

(घ) करुणा और नैतिकता

(घ) करुणा और नैतिकता : शेखर जोशी की कहानी 'संवादहीन' में जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों के और संवेदनशील व्यक्ति थे। वे किसी भी जीव को कैद में देखना पसंद नहीं करते थे। पिंजरे में बंद मिट्ठू को देखकर वे बेचैन हो उठते थे, इसलिए उसे आजाद करना उनकी जीवों के प्रति करुणा (दया) और स्वतंत्रता के प्रति उनकी नैतिकता (सही मूल्य) को दर्शाता है।

3. मिट्ठ का उड़ जाना किस विचार को प्रस्तत करता है?

(क) भोजन की खोज

(ख) प्रेम की आकांक्षा

(ग) स्वतंत्रता की चाह

(घ) पक्षियों में सम्मान की प्रवृत्ति

(ग) स्वतंत्रता की चाह : शेखर जोशी की कहानी 'संवादहीन' में मिट्ठू का रोशनदान से बाहर उड़ जाना यह दर्शाता है कि दुनिया का हर जीव स्वाभाविक (नैसर्गिक) रूप से आजाद रहना चाहता है| भले ही उसे पिंजरे में हर तरह की सुख-सुविधा और ताई का गहरा स्नेह मिल रहा था, लेकिन आज़ादी का सुख किसी भी अन्य सुख से बड़ा होता है|

 4. ताई के जीवन के दुख का मुख्य कारण क्या था?

(क) सम्मान और प्रतिष्ठा में कमी आना

(ख) परिवार से दूरी और संवाद का अभाव

 (ग) आर्थिक विपन्नता और निर्धनता

(घ) मिट्ठू के प्रति प्रेम और संवाद

(ख) परिवार से दूरी और संवाद का अभाव : शेखर जोशी की कहानी 'संवादहीन' में ताई के जीवन का सबसे बड़ा कष्ट उनका अकेलापन था। उनके परिवार के सदस्य (जैसे बेटे-बहू) उनसे दूर रहते थे और उनके बीच बातचीत (संवाद) पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। इस मानसिक अकेलेपन और अपनों से दूरी ने ही उनके जीवन में सबसे गहरा दुख भर दिया था।

5. कहानी में मानव-समाज में व्याप्त किस विसंगति को उजागर किया गया है?

(क) मजबूरी

(ख) कर्मपरायणता

(ग) अकेलापन

(घ) संवादधर्मिता

(ग) अकेलापन : शेखर जोशी की कहानी 'संवादहीन' के माध्यम से आज के आधुनिक मानव-समाज की एक बड़ी विसंगति—महानगरीय अकेलापन और अलगावको उजागर किया गया है। समाज में लोग एक ही परिवार या परिवेश में रहते हुए भी एक-दूसरे से कट चुके हैं। बुजुर्गों का एकाकीपन और अपनों से बातचीत का न होना इस कहानी का केंद्रीय विषय है, जो समाज के सूनेपन और खोखलेपन को दर्शाता है।

मेरी समझ मेरे विचार-

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

1."भगवान ! कैसे नैया पार लगेगी?" ताई इस वाक्य में किस 'नैया' की बात कर रही हैं? वे यह बात क्यों कह रही हैं?

उत्तर- इस वाक्य में ताई अपने जीवन रूपी नैया (जीवन की गाड़ी) की बात कर रही हैं। वे यह बात अपने अत्यधिक असहाय अकेलेपन और भविष्य की चिंता के कारण कह रही हैं।

इस कथन के पीछे के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  संवादहीनता की पीड़ा: घर में कोई ऐसा सदस्य नहीं है जिससे वे अपने मन की बात कह सकें या सुख-दुख बाँट सकें। इस मानसिक बोझ के कारण उनका मन हताश हो जाता है।

·       भविष्य की असुरक्षा: ताई को लगता है कि इस अकेलेपन और संवादहीन माहौल में उनका आगे का जीवन कैसे बीतेगा।

2."धीरे-धीरे सब पराए हाथ में चला गया।" इस वाक्य में किस घटना की ओर संकेत किया गया है?

उत्तर-इस वाक्य में ताई के घर के अधिकार, संपत्ति और पारिवारिक नियंत्रण के छिन जाने की घटना की ओर संकेत किया गया है।

कहानी के संदर्भ में इस घटना के मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं:

1. पारिवारिक नियंत्रण का बदलना-

·       बेटे-बहू का वर्चस्व: ताई के बूढ़े होने पर घर की सारी बागडोर धीरे-धीरे उनके बेटे और बहू के हाथों में चली गईं।

·       निर्णय लेने का अधिकार खत्म होना: घर की मालकिन होने के बावजूद, अब घर के किसी भी छोटे या बड़े फैसले में ताई की राय नहीं ली जाती थी।

2. खुद के ही घर में बेगाना हो जाना-

·       आर्थिक और मानसिक निर्भरता: ताई की अपनी संपत्ति और व्यवस्था पर अब उनका कोई अधिकार नहीं रह गया था। वे पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो चुकी थीं।

·       उपेक्षा का शिकार: परिवार में ताई की अहमियत कम हो गई और वे केवल एक कोने में सिमट कर रह गईं।

इस तरह यह वाक्य ताई के उस गहरे दर्द को दिखाता है जहाँ उन्होंने अपने ही सामने अपनी बनाई गृहस्थी से अपना हक खो दिया।

 

3."ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी।" क्यों?

उत्तर- ताई की सारी ममता मिट्ठू पर इसलिए बरस पड़ी क्योंकि उसने उनके जीवन के अकेलेपन को दूर कर दिया था। परिवार से उपेक्षित ताई को मिट्ठू में एक सच्चा साथी मिला। वह उनसे बातें करता , उनके साथ रहता और उनके जीवन में खुशियाँ भरता था। इसलिए ताई का सारा प्यार, स्नेह और ममता मिट्ठू पर उमड़ पड़ी।

4."अब ताई को इस बात की पूरी जानकारी रहने लगी थी कि किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हो गई हैं और किस पेड़ में फसल के आखिरी अमरूद बचे हैं।" इस वाक्य द्वारा ताई के व्यक्तित्व में आए परिवर्तनों के विषय में क्या-क्या पता चलता है?

उत्तर- इस वाक्य द्वारा ताई के व्यक्तित्व और उनकी मानसिक स्थिति में आए महत्वपूर्ण परिवर्तनों का पता चलता है कि मिट्ठू के आने से ताई के जीवन में नया उत्साह और उद्देश्य आ गया था। वे अब अकेलेपन और निराशा में डूबी नहीं रहती थीं। मिट्ठू की देखभाल करते हुए वे सक्रिय हो गईं और अपने आसपास के वातावरण से फिर जुड़ गईं।इस तरह मिट्ठू के प्रेम ने ताई के भीतर जीने की इच्छा को दोबारा जगा कर उनके जीवन को उत्साह से भर दिया था।

5."जगन मास्टर दूसरे मिजाज के आदमी थे।" जगन मास्टर का व्यक्तित्व कैसा था? कहानी में से उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- शेखर जोशी की कहानी 'संवादहीन' में जगन मास्टर एक स्वतंत्र, नैतिक, संवेदनशील और आदर्शवादी विचारों के व्यक्ति थे। वे लीक पर चलने वाले या संकीर्ण सोच के इंसान नहीं थे, बल्कि वे हर जीव की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे।

 कहानी से प्राप्त उदाहरणों के आधार पर उनके व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं:

1. स्वतंत्रता प्रेमी और संवेदनशील-

जगन मास्टर किसी भी जीव को कैद में रखना पाप समझते थे। जब वे ताई के घर में पिंजरे में बंद तोते (मिट्ठू) को देखते थे, तो उनके मन में उसके प्रति गहरी सहानुभूति और दया पैदा होती थी। उन्हें लगता था कि पिंजरा चाहे सोने का ही क्यों न हो, वह किसी भी जीव के लिए एक अभिशाप है।

2. धार्मिक एवं दार्शनिक स्वभाव-

 वे गंभीर और ज्ञानी स्वभाव के व्यक्ति थे, जो जीवन के गहरे सत्यों को समझते थे।

उदाहरण: कहानी में उल्लेख आता है कि जब तोता पंख फड़फड़ा रहा था, तब जगन मास्टर बाल  'गीता रहस्य' पढ़ रहे थे। इससे पता चलता है कि वे केवल एक शिक्षक ही नहीं, बल्कि एक प्रबुद्ध और विचारशील पाठक भी थे।

3. आदर्शवादी और साहसी

वे रूढ़ियों या दूसरों की नाराज़गी की परवाह किए बिना वही कदम उठाते थे जिसे उनका विवेक सही मानता था।

उदाहरण: जब उन्होंने देखा कि मिट्ठू पिंजरे में छटपटा रहा है, तो उन्होंने बिना किसी झिझक या डर के पिंजरे का दरवाजा खोल दिया। उन्हें पता था कि ताई मिट्ठू से बहुत प्यार करती हैं और उनके इस कदम से ताई नाराज़ हो सकती हैं, फिर भी एक जीव को आज़ाद कराने के अपने नैतिक कर्तव्य के आगे उन्होंने सब कुछ दरकिनार कर दिया।

 

6.कहानी का शीर्षक 'संवादहीन' किसके लिए सबसे अधिक सार्थक प्रतीत होता है- ताई, जगन मास्टर, मिठू या नया तोता? कारण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- कहानी का शीर्षक संवादहीन’ ताई के लिए सबसे अधिक सार्थक है क्योंकि उनके जीवन की सबसे बड़ी समस्या अकेलापन और संवाद का अभाव था। परिवार के सदस्य उनसे दूरी बनाए रखते थे। मिठू के आने से उनके जीवन में बातचीत, अपनापन और खुशी लौट आई। लेकिन उसके उड़ जाने पर वे फिर उसी गहरी संवादहीनता और मानसिक पीड़ा में डूब गईं।

अन्य पात्रों के संदर्भ में यह शीर्षक कम सार्थक क्यों है?

·       जगन मास्टर: वे अपनी वैचारिक दुनिया में जीते हैं और 'गीता रहस्य' जैसी पुस्तकें पढ़ते हैं। वे समाज या परिवार से कटे हुए नहीं हैं, बल्कि उनके पास अपने विचार और सिद्धांत हैं।

·       मिठू: मिठू एक पक्षी है। वह पिंजरे में रहते हुए भी ताई से संवाद करता है और उड़ने के बाद अपनी प्राकृतिक दुनिया से जुड़ जाता है।   

न नया तोता: नया तोता स्वयं संवादहीन नहीं है, बल्कि वह ताई के जीवन की संवादहीनता को गहरा करने का एक माध्यम मात्र है।

निष्कर्ष:
अतः 'संवादहीन' शीर्षक पूरी तरह से ताई के आंतरिक सूनेपन, अपनों की बेरुखी और मानसिक एकाकीपन को दर्शाता है। यह कहानी आज के आधुनिक समाज में बुजुर्गों के प्रति बढ़ती जा रही संवादहीनता पर एक गहरा प्रहार करती है, जिसका सबसे बड़ा शिकार ताई जैसी वृद्ध महिलाएँ होती हैं।

7."अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे।" ताई के बड़े से घर को सूना खंडहर क्यों कहा गया होगा?

उत्तर- इस वाक्य में ताई के बड़े और पक्के घर को "सूना खंडहर" कहना लेखक शेखर जोशी की एक गहरी और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है [संवादहीन]। इसके पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:

1. आत्मीयता और मनुष्यता का अभाव

2. संवादहीनता का सन्नाटा

3. रौनक और जीवन का खो जाना

इसलिए वह जीवंत घर न होकर एक उजाड़ खंडहर जैसा प्रतीत होता था, जहाँ केवल ताई और मिट्ठू एक-दूसरे का सहारा थे।

 

 

 

मेरे अनुभव मेरे विचार-

नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभवों के आधार पर दीजिए-

1."कभी-कभार गाँव में थोड़ी देर के लिए भी न्यौते-बुलावे में जातीं, तो दस बार खिड़की-दरवाजों की साँकलें टोहकर देखतीं..." ताई की तरह जब आप अपने घर या परिवार से दूर होते हैं, तो किसी वस्तु या व्यक्ति की चिंता आपको भीतर से कैसे परेशान करती है?

उत्तर - ताई की यह स्थिति उनके गहरे अकेलेपन, असुरक्षा की भावना और लगाव को दर्शाती है। जब हम भी ऐसी स्थिति से गुजरते हैं, तो यह चिंता हमें भीतर से निम्नलिखित तरीकों से परेशान करती है:

मानसिक अशांति और एकाग्रता की कमी-

बार-बार अनहोनी के विचार आना: मन में लगातार यह डर बना रहता है कि कहीं पीछे कोई दुर्घटना न हो जाए।

वर्तमान कार्य से ध्यान भटकना: हम जहाँ मौजूद होते हैं, वहाँ के माहौल या काम का आनंद नहीं ले पाते हैं।

काल्पनिक दृश्यों का बनना: दिमाग अपने आप ताले टूटने, आग लगने या किसी के बीमार होने की कल्पना करने लगता है।

भावनात्मक और शारीरिक प्रभाव-

भीतर से घबराहट होना: दिल की धड़कन बढ़ जाना या अजीब सी बेचैनी महसूस होना।

बार-बार जाँच करने की आदत: ताई की तरह ही, बार-बार फोन चेक करना या घर के सदस्यों को कॉल करके उनका हाल पूछना।

असुरक्षा का भाव: जब तक हम वापस अपने घर नहीं पहुँच जाते या अपनों से बात नहीं कर लेते, तब तक मन को सुकून नहीं मिलता।

2. "आखिर वह भी तो बोलता-बतियाता प्राणी है।" क्या आप मानते हैं कि पशु-पक्षियों में भी संवेदनाएँ होती हैं? अपने किसी अनुभव का वर्णन करते हुए लिखिए।

 

 

 

 

उत्तर - हाँ, मैं पूरी तरह से मानती हूँ कि पशु-पक्षियों में भी इंसानों की तरह ही गहरी संवेदनाएँ, भावनाएँ और दर्द महसूस करने की क्षमता होती है। वे भले ही हमारी तरह भाषा न बोल सकें, लेकिन उनका व्यवहार, आँखों की चमक और आवाज की टोन उनके सुख-दुख को साफ बयां करती है।

पशु-पक्षियों में संवेदना के मुख्य रूप

·       दुख और वियोग की भावना: साथी या मालिक से दूर होने पर वे खाना-पीना छोड़ देते हैं और उदास बैठ जाते हैं।

·       प्रेम और वफादारी: जब हम उनके प्रति प्यार दिखाते हैं, तो वे अपनी पूंछ हिलाकर या पास आकर अपना स्नेह प्रकट करते हैं।

·       खतरे का अहसास: वे आने वाले संकट को पहले ही भांप लेते हैं और अपनी आवाज से दूसरों को सचेत करते हैं।

मेरा एक व्यक्तिगत अनुभव

एक बार मेरे घर की खिड़की के छज्जे पर एक कबूतर के जोड़े ने घोंसला बनाया और उसमें दो अंडे दिए। कुछ दिनों बाद उनमें से छोटे-छोटे चूजे निकल आए। एक दिन अचानक तेज आंधी आई, जिससे एक चूहा घोंसले की तरफ बढ़ने लगा। कबूतर का जोड़ा उस समय वहाँ नहीं था।

जैसे ही मादा कबूतर वापस आई, उसने खतरे को भांप लिया। वह डरकर भागने के बजाय उस चूहे के सामने पंख फैलाकर खड़ी हो गई और तेजी से गुटर-गूं करने लगी। उसकी आवाज में अपने बच्चे को खोने का गहरा डर और गुस्सा साफ महसूस हो रहा था। मैंने तुरंत आगे बढ़कर उस चूहे को भगाया।

इसके बाद जो हुआ, वह सचमुच दिल छू लेने वाला था:

राहत की सांस: मादा कबूतर ने तुरंत अपने बच्चे को पंखों के नीचे छुपा लिया।

आभार व्यक्त करना: वह खिड़की पर बैठकर कुछ देर तक मुझे शांत नजरों से देखती रही, मानो वह अपनी भाषा में मेरा धन्यवाद कर रही हो।

गहरी समझ: उस दिन के बाद से जब भी मैं खिड़की के पास जाता, वह डरकर उड़ती नहीं थी। उसने समझ लिया था कि मैं उसे नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी।

 इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि भाषा न होने के बावजूद, उनके दिल में ममता, डर और आभार की भावनाएँ इंसानों जैसी ही तीव्र होती हैं।

 

3. 'गनपत ने ही एक सुझाव दिया कि मिट्टू की ही सूरत-शक्ल का एक दूसरा तोता ले आया जाए ताकि ताई को भ्रम में रखा जा सके..." ताई को भ्रम में रखना उचित था या नहीं? तर्क सहित अपने विचार लिखिए।

उत्तर - ताई को भ्रम में रखना अनुचित था। कोई भी नया तोता रूप-रंग में समान होने पर भी मिट्टू जैसी आत्मीयता और यादें नहीं ला सकता था। ताई को धोखे में रखना उनकी सच्ची भावनाओं का अनादर था। सच्चाई का पता चलने पर उनका दिल और अधिक टूट जाता। झूठ कभी आत्मीय रिश्ते का स्थान नहीं ले सकता।

 

4. "ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्ठू 'राम राम सीताराम' की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा।" क्या कभी ऐसा हुआ कि आपने सोचा कुछ और, हुआ कुछ और? उस अनुभव को लिखिए।

उत्तर - हाँ, मेरे साथ भी ऐसा हुआ है जब मेरी सोच के विपरीत परिणाम सामने आया।

पिछले वर्ष मेरे जन्मदिन पर, मुझे लगा कि परीक्षा के कारण परिवार में सब मेरा जन्मदिन भूल गए हैं। मैं दिनभर उदास रही और किसी से कुछ नहीं कहा। लेकिन शाम को जैसे ही मैं कमरे में गई, अचानक बत्तियाँ जल उठीं। सामने पूरा परिवार केक और उपहारों के साथ खड़ा था। उन्होंने मेरे लिए एक अनपेक्षित उत्सव की तैयारी की थी। मैं जिसे उनकी बेरुखी समझ रही थी, वह असल में मुझे चौंकाने की उनकी तैयारी थी।

 

5. "मिठू अब पिंजरे में रहने के इतने आदी हो चुके थे कि उन्होंने बाहर आने की कोई इच्छा नहीं प्रकट की।" क्या प्राणी सचमुच पिंजरे में रहने के आदी हो सकते हैं? अपने उत्तर के समर्थन में अपने आस-पास से उदाहरण भी दीजिए।

 उत्तर - हाँ, प्राणी लंबे समय तक कैद में रहने के बाद पिंजरे के आदी हो जाते हैं, क्योंकि वे अपनी प्राकृतिक स्वतंत्रता और उड़ने का साहस भूल जाते हैं। इसे 'सीखी हुई लाचारी' कहते हैं, जहाँ पिंजरा ही उनका सुरक्षित संसार बन जाता है।

मेरे पड़ोस में एक पालतू तोता है। एक दिन उसका पिंजरा खुला रह गया और वह बाहर निकलकर पेड़ पर बैठ गया। लेकिन जंगली पक्षियों के डर और खुद भोजन न ढूंढ पाने के कारण, वह शाम को वापस अपने पिंजरे में लौट आया। वह आज़ादी से ज्यादा पिंजरे की सुरक्षा का आदी हो चुका था।

विधा से संवाद-

कहानी का अंत

आपके अनुसार 'संवादहीन' कहानी के अंत को किस श्रेणी में रखा जा सकता है? अपने उत्तर के कारण भी बताइए। आप इस कहानी का नया अंत किस प्रकार करना चाहेंगे?

उत्तर- संवादहीन’ कहानी का अंत दुखांत और विवशतापूर्ण माना जा सकता है। कहानी के अंत में ताई का एकमात्र सहारा और साथी मिट्ठू (तोता) रोशनदान से उड़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप ताई का अकेलापन और भी बढ़ जाता है तथा उनके जीवन की संवादहीनता समाप्त होने के बजाय और गहरी हो जाती है। यह मार्मिक अंत पाठकों के मन में करुणा, संवेदना और उदासी की गहरी भावना छोड़ जाता है।

कहानी का एक नया (सुखांत) अंत

मैं इस कहानी का अंत एक आशावादी और सुखांत रूप में करना चाहूँगी, जो इस प्रकार है:

रोशनदान से उड़ने के बाद मिट्ठू असल में ताई को छोड़कर हमेशा के लिए नहीं गया था। वह उड़कर सीधे गाँव के उसी बरगद के पेड़ पर जा बैठा, जहाँ उसका पुराना झुंड रहता था। वहाँ पहुँचकर भी वह ताई के स्नेह और 'राम राम सीताराम' की सीख को भूल नहीं पाया।

शाम होते ही, मिट्ठू अपने साथ दो अन्य तोतों को लेकर वापस ताई की खिड़की पर आ गया। ताई जो मिट्ठू के जाने से निढाल बैठी थीं, अचानक आँगन में 'राम राम सीताराम' की चहचहाहट सुनकर उठ खड़ी हुईं। उन्होंने देखा कि मिट्ठू आज़ाद होने के बाद भी अपनी ममता के कारण

 

 

लौट आया था। ताई ने अब पिंजरा हमेशा के लिए हटा दिया और खिड़की पर दाना-पानी रख दिया। अब मिट्ठू रोज अपने दोस्तों के साथ आता, ताई से बतियाता और उनका अकेलापन हमेशा के लिए दूर हो गया।

 

1. "बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए।"

अपना घर छोड़कर नए स्थान पर बस जाना आसान नहीं होता है। ताई के बहू-बेटों ने गाँव क्यों छोड़ा होगा? गाँव छोड़ते समय क्या-क्या सोचा होगा? अपना घर छोड़ने के लिए स्वयं को कैसे तैयार किया होगा?

उत्तर- गाँव छोड़ते समय और स्वयं को तैयार करते समय उन्होंने निम्नलिखित बातें सोची होंगी:

गाँव छोड़ने का कारण: गाँव में उच्च शिक्षा, अच्छी नौकरियों और चिकित्सा सुविधाओं की कमी रही होगी।

गाँव छोड़ते समय के विचार: वे अपने पीछे छूट रहे माता-पिता (ताई), बचपन के दोस्तों, खेती-बाड़ी और खुले माहौल को लेकर भावुक और चिंतित हुए होंगे। शहर के नए और अजनबी माहौल में तालमेल बिठाने का डर भी उनके मन में रहा होगा।

स्वयं को तैयार करने का तरीका: उन्होंने अपने बच्चों के बेहतर भविष्य का वास्ता देकर अपने दिल को कड़ा किया होगा। 'आर्थिक रूप से समृद्ध होकर गाँव की मदद करेंगे'—इसी व्यावहारिक सोच के साथ उन्होंने खुद को मानसिक रूप से मजबूत किया होगा।

 

2. "वहाँ बैठे एवजी मिठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की"

ताई सोच रही थीं कि मिट्ठू 'राम राम सीताराम' कहेगा, लेकिन एवजी मिट्ठू चुप था। कल्पना कीजिए कि एक दिन असली मिट्टू वापस आ गया। मिट्टू ने नए तोते को देखकर क्या कहा होगा? आगे की कहानी लिखिए।

संकेत- प्रारंभ कीजिए "एक दिन आकाश में वही हरे पंख चमके...")

उत्तर- एक दिन आकाश में वही हरे पंख चमके... और असली मिट्ठू उड़कर सीधा ताई की खिड़की पर आ बैठा। पिंजरे में अपने जैसी सूरत के 'एवजी मिट्ठू' को देखकर वह चौंक गया।

 असली मिट्ठू ने गर्दन तिरछी की और तीखी आवाज में कहा, "राम राम सीताराम! अरे भाई, तुम कौन हो जो मेरी जगह घेरे बैठे हो? क्या तुम भी ताई के अकेलेपन को दूर करने आए हो?" एवजी मिट्ठू ने जब अपने ही जैसी जानी-पहचानी आवाज सुनी, तो उसने पहली बार पिंजरे में पंख फड़फड़ाए।

ताई ने जैसे ही यह चिर-परिचित रट सुनी, उनकी आँखों में चमक आ गई। उन्होंने देखा कि खिड़की पर असली मिट्ठू बैठा था और पिंजरे वाला तोता भी अब चहक रहा था। ताई की संवादहीनता पल भर में टूट गई। उन्होंने आगे बढ़कर पिंजरे का दरवाजा खोल दिया। असली मिट्ठू उड़कर ताई के कंधे पर जा बैठा और दूसरा तोता भी खिड़की पर आकर बैठ गया। ताई को अब अपना घर फिर से भरा-पूरा लगने लगा था।

 

4. “मिट्ठू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और ये गए। वो गए!!"

मान लीजिए कि जगन मास्टर ने मिट्ठू की खोज के लिए एक विज्ञापन प्रकाशित किया है। अपनी कल्पना से वह विज्ञापन बनाइए।

(संकेत- आप समाचार पत्रों में प्रकाशित खोया-पाया या तलाश संबंधी विज्ञापन देख सकते हैं।)

उत्तर- खोया है! खोया है! खोया है! 📢

सभी नगरवासियों से विनम्र निवेदन है:
कल सुबह हमारा पालतू तोता 'मिट्ठू' रोशनदान से उड़कर कहीं चला गया है। वह केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारे घर के बुजुर्ग सदस्य का एकमात्र सहारा है।

 मिट्ठू की पहचान:

·       रंग-रूप: गहरा हरा रंग, गले में गहरी लाल कंठी।

·       विशेष आदत: वह 'राम राम सीताराम' की रट लगाता है।

 

·       व्यवहार: इंसानों से बहुत जल्दी घुल-मिल जाता है।

यदि आपको यह तोता कहीं भी दिखाई दे या इसके बारे में कोई सूचना मिले, तो कृपया तुरंत नीचे दिए गए पते पर सूचित करें।

उचित सूचना देने वाले को उचित पुरस्कार दिया जाएगा।

संपर्क करें:
👤 जगन मास्टर
🏠 मुख्य बाजार, (गाँव का नाम)
📞 दूरभाष: 98XXXXXXXX

 

 

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