राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद-




          

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद-

प्रस्तुत पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकांड से ली गई हैं। जब भगवान परशुराम जी का आगमन होता है, तब के वातावरण और उपस्थित लोगों की स्थिति का यहाँ अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है-

 

देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला ।।

शाब्दिक अर्थ-

·       देखत: देखते ही या देखकर।

·       भृगुपति: भृगु वंश के स्वामी, अर्थात भगवान परशुराम

·       बेषु: वेष (पहनावा/रूप)।

·       कराला: कराल, अर्थात भयानक, उग्र या डरावना।

·       उठे: उठ खड़े हुए।

·       सकल: सभी या सारे।

·       भय: डर।

·        बिकल: विकल, अर्थात व्याकुल, परेशान या बेचैन होकर।

·        भुआला: राजा लोग।

 

·  अर्थ: परशुरामजी (भृगुपति) के इस अत्यंत भयानक और डरावने रूप को देखते ही सभा में उपस्थित सभी राजा भय के मारे व्याकुल होकर अपने-अपने आसनों से खड़े हो गए।

·  व्याख्या: धनुष टूटने के बाद जब परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर सभा में आते हैं, तो उनका रौद्र रूप देखकर वहां मौजूद सभी राजा डर से कांप उठते हैं।

पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।।

शाब्दिक अर्थ-

·       पितु: पिता।

·       कहि कहि: कह-कहकर (उच्चारण कर-करके)।

·       निज: अपना

 

·       अर्थ: वे सभी राजा अपने-अपने पिताओं के नाम के साथ अपना नाम ले-लेकर परशुरामजी को साष्टांग (दंडवत) प्रणाम करने लगे।

·       व्याख्या: परशुरामजी का क्रोध इतना भीषण था कि राजाओं को अपनी जान का डर सताने लगा। इसलिए वे अत्यंत सम्मान और विनम्रता दिखाने के लिए अपने वंश और पिता का नाम लेकर उनके चरणों में गिर गए।

 

जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी।।

शाब्दिक अर्थ-

·       जेहि: जिसकी ओर भी या जिसे।

·       सुभायँ: स्वभाववश या सहज भाव से।

·       चितवहिं: देखते हैं (चितवन/दृष्टि डालना)।

·       हितु: हितैषी, मित्र या अपना भला चाहने वाला।

·       जानी: जानकर।

·       सो: वह (राजा/व्यक्ति)।

·       जानइ: समझता है या मानता है।

·       जनु: मानो (उत्प्रेक्षा अलंकार के लिए प्रयुक्त शब्द)।

·       आइ खुटानी: आ खड़ी हुई या समाप्त हो गई (यहाँ इसका अर्थ "आयु का समाप्त हो जाना" या "मृत्यु आ जाना" है)

 

·       अर्थ: परशुरामजी सहज स्वभाव से भी जिसकी ओर देख लेते थे, वह राजा यही समझता था कि मानो उसकी मौत ही निकट आ गई है।

·       व्याख्या: उनके क्रोध की अग्नि इतनी तीव्र थी कि अगर वे किसी को सामान्य रूप से भी देखते, तो उस व्यक्ति को लगता कि उसका अंत समय आ गया है और उसकी आयु समाप्त हो गई है।

 

जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा ।।

शाब्दिक अर्थ-

·       जनक: राजा जनक (सीता जी के पिता)।

·       बहोरि: फिर से, दोबारा या उसके बाद (राजाओं के प्रणाम करने के बाद)।

·       आइ: आकर (पास आकर)।

·       सिरु: सिर।

·       नावा: नवाया या झुकाया।

·       सीय: सीया, अर्थात माता सीता

·       बोलाइ: बुलाकर।

·       प्रनामु: प्रणाम या चरण स्पर्श।

·       करावा: करवाया।  

 

·       अर्थ: इसके बाद राजा जनक ने आगे आकर परशुरामजी के चरणों में सिर झुकाया और फिर सीताजी को बुलाकर उनसे भी प्रणाम कराया।

·       व्याख्या: एक कुशल राजा और पिता के नाते, जनकजी ने स्थिति को संभालने के लिए स्वयं मुनि का स्वागत किया और अपनी पुत्री सीता का परिचय करवाकर उनका आशीर्वाद दिलाया।

 

आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं।।

शाब्दिक अर्थ

·       आसिष: आशीष (आशीर्वाद)।

·       दीन्हि: दिया (परशुराम जी ने आशीर्वाद दिया)।

·       सखीं: सखियाँ (सीता जी की सहेलियाँ)।

·       हरषानीं: हर्षित हुईं या अत्यधिक प्रसन्न हो गईं।

·       निज: अपने।

·       समाज: समाज, समूह या सहेलियों की टोली।

 

·       अर्थ: परशुरामजी ने सीताजी को (अविचल सौभाग्य का) आशीर्वाद दिया, जिसे सुनकर उनकी सखियां प्रसन्न हो गईं और चतुर सखियां सीताजी को अपने समूह में वापस ले गईं।

·       व्याख्या: सीताजी को सुखी वैवाहिक जीवन का वरदान मिला। माहौल की गंभीरता और परशुराम के क्रोध को देखते हुए सखियां समझदारी दिखाते हुए सीताजी को वहां से दूर ले गईं।

 

बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।

शाब्दिक अर्थ

·       बिस्वामित्रु: महर्षि विश्वामित्र।

·       मिले: आकर मिले।

·       पुनि: फिर या दोबारा।

·       आई: आकर।

·       पद: पैर या चरण।

·       सरोज: कमल (यहाँ 'पद सरोज' का अर्थ है कमल रूपी चरण)।

·       मेले: डाल दिए, अर्पित किए (या झुका दिए)।

 

·  अर्थ: फिर विश्वामित्रजी आकर परशुरामजी से मिले और उन्होंने दोनों भाइयों (श्रीराम और लक्ष्मण) को उनके चरण कमलों में प्रणाम करवाया।

·  व्याख्या: विश्वामित्रजी ने आगे बढ़कर मुनि परशुराम का अभिवादन किया और अपने दोनों शिष्यों, राम और लक्ष्मण, को परंपरा के अनुसार उनके चरणों में प्रणाम करने के लिए कहा।

रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।।

शाब्दिक अर्थ-

·       रामु: श्री रामचंद्र जी।

·       लखनु: लक्ष्मण जी।

·       दसरथ: राजा दशरथ।

·       के: के।

·       ढोटा: पुत्र, लड़के या बालक (यह अवधी भाषा का शब्द है)।

·       दीन्हि: दिया।

·       असीस: आशीष या आशीर्वाद।

·       देखि: देखकर।

·       भल: भली, सुंदर या बहुत अच्छी।

·       जोटा: जोटा, अर्थात जोड़ी (दोनों भाइयों की जोड़ी)।

 

·       अर्थ: राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण की सुंदर जोड़ी को देखकर परशुरामजी ने उन्हें हृदय से आशीर्वाद दिया।

·       व्याख्या: 'ढोटा' का अर्थ पुत्र होता है। दोनों भाइयों की तेजस्वी और सुगठित जोड़ी को देखकर परशुरामजी का मन भीतर से पिघल गया और उन्होंने दोनों को कल्याण का आशीष दिया।

 

रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन ।।

शाब्दिक अर्थ-

·       रामहि: श्री राम को।

·       चितइ: देखकर या निहारकर।

·       रहे थकि: एकटक देखते रह गए या पलक झपकाना भूल गए।

·       लोचन: आँखें या नेत्र।

·       रूप: रूप-सौंदर्य।

·       अपार: असीम, जिसकी कोई सीमा न हो।

·       मार: कामदेव (जिन्हें सुंदरता का देवता माना जाता है)।

·       मद: घमंड या अहंकार।

·       मोचन: छुड़ाने वाला, शांत करने वाला

 

अर्थ: श्रीराम के उस अनुपम रूप को देखकर, जो कामदेव के भी घमंड को चूर करने वाला था, परशुरामजी के नेत्र थके से रह गए (यानी वे एकटक देखते रह गए)।

·  व्याख्या: भगवान श्रीराम का सौंदर्य इतना दिव्य और असीम था कि करोड़ों कामदेवों का अभिमान भी उसके सामने फीका पड़ जाए। परशुरामजी श्रीराम के उस शांत और मनमोहक स्वरूप को देखकर चकित रह गए।

 

    बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।

        पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।।

शाब्दिक अर्थ-

·       बहुरि: फिर से या दोबारा।

·       बिलोकि: देखकर (टूटे हुए धनुष को देखकर)।

·       बिदेह सन: विदेह से, अर्थात राजा जनक से (जनक जी का एक नाम विदेह भी था)।

·       कहहु: कहो या बताओ।

·       काह: क्या या क्यों।

·       अति: अत्यधिक या बहुत भारी।

·       भीर: भीड़।

  • पूछत: पूछते हैं।
  • जानि अजान जिमि: जानते हुए भी अनजान की तरह (सब कुछ मालूम होने पर भी ऐसे पूछना जैसे कुछ पता ही न हो)।
  • ब्यापेउ: व्याप्त हो गया या फैल गया।
  • कोपु: कोप या भयंकर क्रोध।
  • सरीर: शरीर।

 

अर्थ:

"फिर राजा जनक की ओर देखकर उन्होंने पूछा— 'यहाँ इतनी बड़ी सभा क्यों लगी है?' यद्यपि वे सब जानते थे, फिर भी अनजान बनकर पूछ रहे थे और उनके पूरे शरीर में क्रोध समा गया था।"

व्याख्या:
श्रीराम के शांत और दिव्य रूप को एकटक देखने के बाद, परशुरामजी का ध्यान वापस सभा की ओर जाता है। वे राजा जनक से प्रश्न करते हैं कि स्वयंवर सभा में चारों ओर इतनी व्याकुलता और राजाओं की भीड़ जुटने का क्या कारण है।

परशुराम जी राम द्वारा शिव धनुष तोड़े जाने की बात जानते हुए भी राजा जनक से अनजान बनकर प्रश्न कर रहे हैं। इस दौरान, शिव धनुष के टूटने के विचार से उनके पूरे शरीर में तीव्र क्रोध और गुस्से का संचार हो जाता है। इस चौपाई में परशुराम जी के दिखावटी अज्ञान, आंतरिक क्रोध और गंभीर व्यक्तित्व का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया गया है।

 

समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।।

शाब्दिक अर्थ-

·       समाचार: समाचार, वृत्तांत, पूरी बात या घटनाक्रम।

·       कहि: कहकर या बोलकर।

·       जनक: राजा जनक।

·       सुनाए: सुनाया (परशुराम जी को सुनाया)।

·       जेहि: जिस।

·       कारन: कारण या वजह से।

·       महीप: राजा लोग

अर्थ-

राजा जनक ने परशुराम जी को पूरी घटना सुनाई और बताया कि जिस कारण से सभी राजा यहाँ एकत्र हुए थे, वह कारण क्या था।

व्याख्या-

जब परशुमान  ने क्रोध से भरे हुए राजा जनक से पूछा कि यहाँ इतनी बड़ी सभा क्यों लगी है, तब राजा जनक ने विनम्रता से पूरी घटना का विवरण दिया। उन्होंने बताया कि अपनी पुत्री सीता  के स्वयंवर के लिए उन्होंने एक शर्त रखी थी—जो वीर शिवजी के दिव्य धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही सीता का वरण करेगा।

इसी कारण अनेक राजा और राजकुमार जनकपुर आए थे। सभी ने धनुष उठाने का प्रयास किया, परंतु कोई सफल नहीं हुआ। अंततः भगवान राम ने धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया और धनुष टूट गया। इस चौपाई में तुलसीदास जी राजा जनक की विनम्रता, सत्यनिष्ठा और स्पष्टवादिता का चित्रण करते हैं। वे परशुराम जी से कोई बात छिपाते नहीं, बल्कि पूरी घटना यथार्थ रूप में बता देते हैं।

सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे।।

शाब्दिक अर्थ-

·       सुनत: सुनते ही.

·       बचन: वचन या बातें (राजा जनक की बातें)

·       फिरि: फिरकर, पलटकर या घुमाकर

·       अनत: अन्यत्र या दूसरी ओर

·       निहारे: देखा या दृष्टि डाली

·       देखे: देखे

·       चापखंड: चाप (धनुष) के खंड (टुकड़े)

·       महि: पृथ्वी या जमीन पर

·       डारे: डाले हुए या पड़े हुए

अर्थ-

राजा जनक की बात सुनकर परशुराम जी ने इधर-उधर दृष्टि डाली। तब उन्होंने भूमि पर पड़े हुए शिवधनुष के टूटे हुए टुकड़ों को देखा।

व्याख्या-

जब राजा जनक  ने परशुराम जी को पूरी घटना बता दी, तब परशुराम जी ने स्वयं स्थिति का निरीक्षण करना चाहा। उन्होंने सभा में चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। उनकी नज़र उस स्थान पर पड़ी जहाँ भगवान राम द्वारा तोड़ा गया शिवधनुष टुकड़ों में बिखरा पड़ा था।

शिवधनुष केवल एक साधारण धनुष नहीं था; वह भगवान शिव का पवित्र और दिव्य आयुध था। परशुराम जी भगवान शिव के परम भक्त थे। इसलिए जैसे ही उन्होंने धनुष के टूटे हुए खंडों को भूमि पर पड़ा देखा, उनका दुःख और क्रोध और भी बढ़ गया। इस दृश्य ने उनके हृदय में शिवजी के प्रति श्रद्धा और धनुष के प्रति सम्मान के कारण तीव्र क्रोध उत्पन्न कर दिया।

 

अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।।

शाब्दिक अर्थ-

·       अति: अत्यधिक या बहुत ज़्यादा।

·       रिस: रिस, अर्थात भयंकर क्रोध या गुस्सा।

·       बोले: बोले।

·       बचन: वचन या बातें।

·       कठोरा: कठोर, कड़वे या तीखे।

·       कहु: कहो या बताओ।

·       जड़: जड़, अर्थात मूर्ख या बुद्धिहीन

 

अर्थ-

शिवधनुष के टूटे हुए टुकड़े देखकर परशुराम जी अत्यंत क्रोधित हो गए। क्रोध में उन्होंने कठोर वचन कहे और राजा जनक से पूछा—

"हे मूर्ख जनक! बताओ, इस धनुष को किसने तोड़ा है?"

व्याख्या-

जब परशुराम , ने अपनी आँखों से भगवान शिव के दिव्य धनुष के टूटे हुए टुकड़े देखे, तो उनका क्रोध चरम पर पहुँच गया। वे भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उस धनुष को अत्यंत पवित्र मानते थे। इसलिए धनुष की यह स्थिति देखकर वे अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सके। क्रोध में उन्होंने राजा जनक से कठोर शब्दों में पूछा कि शिवधनुष को तोड़ने वाला कौन है। इस चौपाई में परशुराम जी के शिवभक्ति-जनित क्रोध और उनके उग्र स्वभाव का सशक्त चित्रण किया गया है।

बेगि देखाउं मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू ।

अर्थ-

परशुराम जी क्रोध में राजा जनक से कहते हैं—

"हे मूर्ख! शीघ्र मुझे उस व्यक्ति को दिखाओ। यदि आज ऐसा नहीं किया, तो जहाँ तक तुम्हारा राज्य फैला हुआ है, मैं उस पूरी पृथ्वी को उलट-पुलट कर दूँगा।"

व्याख्या-

इस चौपाई में परशुराम जी का उग्र स्वभाव, शिवभक्ति और न्याय के प्रति उनकी कठोर भावना प्रकट होती है। वे धनुष तोड़ने वाले को गंभीर अपराधी मानते हैं और राजा जनक को आदेश देते हैं कि उसे तुरंत उनके सामने प्रस्तुत किया जाए, अन्यथा वे पूरे राज्य को विनाश की ओर धकेल देंगे। यह चौपाई परशुराम जी के क्रोध की चरम अवस्था का प्रभावशाली चित्रण करती है।

अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।

शाब्दिक अर्थ

·       अति: अत्यधिक या बहुत ज़्यादा।

·       डरु: डर या भय।

·       उतरु: उत्तर या जवाब।

·       देत: देते।

·       नृपु: नृप, अर्थात राजा जनक

·       नाहीं: नहीं (उत्तर नहीं दे पा रहे थे)।

·       कुटिल: कुटिल, अर्थात दुष्ट या कपटी स्वभाव के।

·       भूप: राजा लोग (स्वयंवर में आए अन्य राजा)।

·       हरषे: हर्षित हुए या प्रसन्न हुए।

·       मन माहीं: मन के भीतर या मन ही मन।

 

अर्थ-

परशुराम जी के अत्यंत क्रोधित वचन सुनकर राजा जनक बहुत भयभीत हो गए और कोई उत्तर न दे सके। यह देखकर वहाँ उपस्थित कुछ कुटिल (दुष्ट या ईर्ष्यालु) राजा अपने मन में प्रसन्न होने लगे।

व्याख्या-

जब परशुराम जी ने क्रोध में भरकर राजा जनक को कठोर शब्द कहे और उनके राज्य को नष्ट करने की धमकी दी, तब जनक जी अत्यंत चिंतित और भयभीत हो गए। वे परशुराम जी के तेज, तप और पराक्रम से परिचित थे। इसलिए उस समय उन्हें कोई उचित उत्तर नहीं सूझा और वे मौन रह गए।

दूसरी ओर, स्वयंवर में आए हुए कुछ राजा ऐसे थे जो पहले से ही असफल होकर अपमानित महसूस कर रहे थे। वे भगवान Rama की सफलता और सीता जी के स्वयंवर के परिणाम से प्रसन्न नहीं थे। जब उन्होंने देखा कि परशुराम जी क्रोधित होकर जनक और सभा को डाँट रहे हैं, तो वे मन ही मन खुश होने लगे।

"कुटिल भूप" शब्द उन राजाओं के लिए प्रयुक्त हुआ है जिनके मन में ईर्ष्या, द्वेष और कुटिलता थी। वे बाहर से शांत थे, पर भीतर ही भीतर यह सोचकर प्रसन्न हो रहे थे कि अब कोई बड़ा विवाद खड़ा होगा और शायद राम की विजय में बाधा उत्पन्न होगी।

परशुराम जी के भयंकर क्रोध के कारण राजा जनक भय से मौन हो गए। वहीं ईर्ष्यालु और कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न होने लगे, क्योंकि उन्हें लगा कि अब सभा में संकट उत्पन्न होगा और राम की सफलता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। इस चौपाई में एक ओर जनक जी की चिंता और दूसरी ओर दुष्ट राजाओं की ईर्ष्यापूर्ण मानसिकता का सुंदर चित्रण किया गया है।

सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।

शाब्दिक अर्थ-

·       सुर: देवता (जो अदृश्य रूप से स्वयंवर देख रहे थे)।

·       मुनि: ऋषि-मुनि।

·       नाग: नागलोक के निवासी या नागगण।

·       नगर: जनकपुर नगर के।

·       नर: पुरुष।

·       नारी: स्त्रियाँ।

·       सोचहिं: सोच-विचार करने लगे या चिंता करने लगे।

·       सकल: सभी के सभी।

·       त्रास: अत्यंत भय या डर।

·       उर: हृदय या मन में।

·       भारी: बहुत बड़ा या अत्यधिक

अर्थ-

देवता, ऋषि-मुनि, नाग, नगर के पुरुष और स्त्रियाँ—सभी चिंता करने लगे। परशुराम जी के क्रोध के कारण उनके हृदय में भारी भय और आतंक भर गया।

व्याख्या-

जब परशुराम जी का प्रचंड क्रोध सभा में प्रकट हुआ, तब केवल राजा जनक ही नहीं, बल्कि वहाँ उपस्थित और इस घटना को देख रहे सभी लोग भयभीत हो गए।

तुलसीदास जी इस भय की व्यापकता को दिखाने के लिए विभिन्न लोकों के प्राणियों का उल्लेख करते हैं—

  • सुर = देवता
  • मुनि = ऋषि और तपस्वी
  • नाग = नागलोक के प्राणी
  • नगर नर नारी = जनकपुर के स्त्री-पुरुष

अर्थात् तीनों लोकों के प्राणी इस घटना को लेकर चिंतित हो उठे। सभी जानते थे कि परशुराम जी अत्यंत तेजस्वी, पराक्रमी और क्रोधी हैं। उन्होंने पूर्व में अनेक बार क्षत्रियों का संहार किया था। इसलिए उनके क्रोध का परिणाम क्या होगा, यह सोचकर सबके मन में भय उत्पन्न हो गया।

"त्रास उर भारी" का अर्थ है कि उनके हृदय में गहरा आतंक और चिंता भर गई। सभी को आशंका थी कि कहीं यह विवाद किसी बड़े विनाश या संघर्ष का रूप न ले ले।

भावार्थ-

परशुराम जी के उग्र क्रोध को देखकर देवता, ऋषि, नाग तथा जनकपुर के सभी स्त्री-पुरुष भय और चिंता से भर गए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या होगा। सबके मन में एक ही आशंका थी कि यदि परशुराम जी का क्रोध शांत न हुआ, तो कोई बड़ी विपत्ति आ सकती है।

काव्य-सौंदर्य

इस चौपाई में तुलसीदास जी ने अतिशयोक्ति और सामूहिक भाव-चित्रण का सुंदर प्रयोग किया है। देवताओं से लेकर सामान्य नागरिकों तक सभी के भयभीत होने का वर्णन करके उन्होंने परशुराम जी के तेज, प्रभाव और क्रोध की महत्ता को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

 

मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी ॥

शाब्दिक अर्थ

·       मन: मन ही मन।

·       पछिताति: पछता रही हैं।

·       सीय: सीता जी की।

·       महतारी: महतारी, अर्थात माता (रानी सुनयना)

·       बिधि: विधि, अर्थात विधाता या ब्रह्मा (ईश्वर)।

·       अब: अब (इस अंतिम समय पर)।

·       सँवरी: सँवरी हुई, बनी-बनाई या सफल हुई।

 

अर्थ-

सीता जी की माता मन-ही-मन पछताने लगीं और सोचने लगीं—

"विधाता ने जो कार्य अब तक अच्छी तरह सँवार दिया था, उसे अब बिगाड़ दिया है।

व्याख्या-

जब परशुराम जी का भयंकर क्रोध सभा में फैल गया और सभी लोग भयभीत हो गए, तब सीता    की माता (रानी सुनयना) के मन में भी चिंता उत्पन्न हुई।

अभी कुछ समय पहले ही उनकी पुत्री सीता का विवाह राम भगवान  से निश्चित हुआ था। शिवधनुष भंग होने के बाद स्वयंवर सफलतापूर्वक संपन्न हो गया था और सब ओर हर्ष का वातावरण था। परंतु अचानक परशुराम जी के आगमन और उनके प्रचंड क्रोध ने इस आनंदमय वातावरण को भय और चिंता में बदल दिया।

रानी सुनयना सोचने लगीं कि विधाता (भाग्य) ने इतनी सुंदर व्यवस्था की थी—सीता को योग्य वर मिल गया, स्वयंवर सफल हो गया—लेकिन अब यह नया संकट उत्पन्न करके मानो सारी बनी-बनाई बात बिगाड़ दी है।

यह एक माँ के हृदय की स्वाभाविक चिंता है। जब संतान का सुख सामने दिखाई देता है और अचानक कोई बाधा आ जाती है, तो माता का मन व्याकुल हो उठता है।

 

भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।

शाब्दिक अर्थ-

·       भृगुपति: भृगुवंश के स्वामी, अर्थात भगवान परशुराम

·       कर: का।

·       सुभाउ: स्वभाव (क्रोधित और क्षत्रियों का नाश करने वाला स्वभाव)।

·       सुनि: सुनकर (या याद करके)।

·       सीता: माता सीता।

·       अरध: आधा।

·       निमेष: पलक झपकने का समय (क्षण/सेकंड का एक छोटा हिस्सा)।

·       कलप: कल्प (शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा जी का एक दिन, जो लगभग 4 अरब 32 करोड़ वर्षों का होता है, अर्थात अनंत समय)।

·       सम: समान या बराबर।

 

संपूर्ण भावार्थ

 

अर्थ-

भृगुवंश के स्वामी परशुराम जी के क्रोधी स्वभाव के बारे में सुनकर सीता जी अत्यंत चिंतित हो गईं। उनके लिए आधा निमेष (पलभर का समय) भी एक कल्प के समान लंबा प्रतीत होने लगा।

व्याख्या-

जब सभा में परशुराम जी का प्रचंड क्रोध प्रकट हुआ, तब सभी लोग भयभीत हो गए। सीता जी भी उनके स्वभाव और पराक्रम से परिचित थीं। उन्होंने सुन रखा था कि परशुराम जी अत्यंत तेजस्वी, क्रोधी और अजेय योद्धा हैं, जिन्होंने अपने क्रोध में अनेक बार क्षत्रियों का संहार किया था।

अब सीता जी के मन में यह चिंता उत्पन्न हुई कि कहीं उनके प्रिय वर राम जी  को कोई कष्ट न पहुँचे। परशुराम जी का क्रोध देखकर उनका हृदय आशंका से भर गया।

तुलसीदास जी कहते हैं कि "अरध निमेष कलप सम बीता"। यह एक सुंदर अतिशयोक्ति है। इसका अर्थ यह नहीं कि वास्तव में समय बदल गया था, बल्कि सीता जी की चिंता इतनी बढ़ गई थी कि पलभर का समय भी उन्हें बहुत लंबा लग रहा था। जब मन भय, चिंता या प्रेम से व्याकुल होता है, तब समय की अनुभूति भी बदल जाती है।

भावार्थ-

परशुराम जी के उग्र स्वभाव और क्रोध को देखकर सीता जी अत्यंत चिंतित हो उठीं। उन्हें श्रीराम की चिंता सताने लगी। व्याकुलता के कारण उनके लिए एक क्षण भी बहुत लंबा प्रतीत होने लगा। इस चौपाई में सीता जी के प्रेम, चिंता और कोमल हृदय का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है।

काव्य-सौंदर्य

  • "अरध निमेष कलप सम" में अतिशयोक्ति अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
  • सीता जी के मन की व्याकुलता और प्रेम का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण हुआ है।
  • चौपाई में करुण और प्रेम-भाव की प्रधानता है।

 

      सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।

      हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।॥

शाब्दिक अर्थ-

·       सभय: भय सहित, अर्थात डर के मारे या भयभीत।

·       बिलोके: देखा (श्री राम ने देखा)।

·       लोग सब: सभा में उपस्थित सभी लोगों और राजाओं को।

·       जानि: जानकर या समझकर।

·       जानकी: जनकपुत्री, अर्थात माता सीता

·       भीरु: डरी हुई या भयभीत।

·       हृदयँ: हृदय में या मन के भीतर।

·       न हरषु: न कोई हर्ष (खुशी या गर्व था)।

·       बिषादु कछु: न कोई विषाद (चिंता, दुःख या डर था)।

अर्थ-

सभी लोगों को भयभीत देखकर और यह जानकर कि जानकी स्वभाव से अत्यंत कोमल और संकोची हैं, श्रीराम के हृदय में न तो अत्यधिक प्रसन्नता हुई और न ही निराशा। वे शांत और धैर्यपूर्वक बोले।

व्याख्या- यह प्रसंग उस समय का है जब राजा जनक के दरबार में शिवधनुष उठाने और उसे प्रत्यंचा चढ़ाने की चुनौती दी गई थी। अनेक राजा और वीर प्रयास कर चुके थे, लेकिन कोई भी सफल नहीं हुआ।

दरबार में उपस्थित सभी लोग चिंतित थे। उन्हें लग रहा था कि यदि कोई भी धनुष नहीं उठा पाया, तो सीता का विवाह कैसे होगा? दूसरी ओर, श्रीराम जानते थे कि जानकी अत्यंत विनम्र, कोमल और लज्जाशील हैं।

ऐसी स्थिति में भी श्रीराम ने असाधारण धैर्य, संतुलन और आत्मसंयम का परिचय दिया। उनके मन में न सफलता का अहंकार था और न असफलता का भय। वे परिस्थितियों से विचलित हुए बिना शांत रहे।

 

 

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।

शब्द अर्थ-

·       नाथ: स्वामी या हे स्वामी (परशुराम जी के लिए आदरसूचक शब्द)।

·       संभुधनु: शंभु (भगवान शिव) का धनुष।

·       भंजनिहारा: भंजन करने वाला, अर्थात तोड़ने वाला

·       होइहि: होगा।

·       केउ: कोई।

अर्थ-

हे प्रभु! भगवान शिव के इस महान धनुष को तोड़ने वाला अवश्य ही आपका कोई सेवक या भक्त होगा।

व्याख्या-

यह वचन सीता जी की प्रार्थना का भाव व्यक्त करता है। सीता जी मन ही मन देवी से प्रार्थना करती हैं कि जो वीर भगवान शिव के धनुष को तोड़ने में समर्थ होगा, वह अवश्य ही उनके आराध्य प्रभु का भक्त और योग्य पुरुष होगा।

इस पंक्ति में सीता जी का गहरा विश्वास, समर्पण और दिव्य आस्था प्रकट होती है। उन्हें पूर्ण विश्वास है कि उनके जीवनसाथी का चयन केवल बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा और भक्ति से होगा।

आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।

शब्दार्थ-

·       आयसु: आयसु, अर्थात आज्ञा या आदेश।

·       काह: क्या है।

·       कहिअ: कहिए या बताइए।

·       किन: क्यों नहीं।

·       मोही: मुझसे।

·       रिसाइ: गुस्सा होकर या क्रोधित होकर।

अर्थ- मुझे आदेश देने की आवश्यकता ही क्या है?"

यह बात सुनकर क्रोधी मुनि परशुराम क्रोधित होकर बोले।

व्याख्या-

यह प्रसंग उस समय का है जब भगवान राम द्वारा शिवधनुष टूट जाने के बाद परशुराम जी जनक सभा में पहुँचते हैं। वे अत्यंत क्रोधित होते हैं और धनुष तोड़ने वाले के बारे में पूछते हैं।

जब किसी ने उन्हें शांत करने या निर्देश देने का प्रयास किया, तब परशुराम जी ने क्रोध में यह वचन कहा—"मुझे आदेश देने वाला कौन है, और मुझे क्या आज्ञा दी जा रही है?"

इस पंक्ति में परशुराम जी के तेजस्वी, स्वाभिमानी और उग्र स्वभाव का चित्रण हुआ है। वे स्वयं महान तपस्वी और पराक्रमी योद्धा थे, इसलिए किसी के आदेश को सहजता से स्वीकार नहीं करते थे।

सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।।

शब्दार्थ-

  • सेवकु = सेवक
  • सो = वही
  • जो = जो
  • करै = करता है
  • सेवकाई = सेवा

·  अरि = शत्रु

      ·  करनी = आचरण / व्यवहार

      ·  करि = के अनुसार

      ·  करिअ = करनी चाहिए

         लराई = लड़ाई / युद्ध

अर्थ-

वही सच्चा सेवक है जो सेवा का कार्य करे। यदि कोई शत्रु जैसा व्यवहार करे, तो उसके साथ युद्ध करना उचित है।

व्याख्या-

यह प्रसंग शिवधनुष भंग के बाद का है। परशुराम जी अत्यंत क्रोधित होकर सभा में आते हैं। उस समय लक्ष्मण जी निर्भीकता से उत्तर देते हैं।

लक्ष्मण जी कहते हैं कि एक सेवक का धर्म सेवा करना है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति शत्रुता का व्यवहार करे, तो उसके साथ उसी प्रकार व्यवहार करना चाहिए। अर्थात् संबंधों और व्यवहार का आधार व्यक्ति के आचरण पर होना चाहिए।

यहाँ लक्ष्मण जी संकेत करते हैं कि यदि परशुराम जी स्वयं को गुरु या पूजनीय मानते हैं, तो उन्हें शांत और मर्यादित व्यवहार करना चाहिए। परंतु यदि वे क्रोध और शत्रुता का मार्ग अपनाएँगे, तो उनका सामना भी उसी प्रकार किया जाएगा।

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सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।

शब्दार्थ-

सुनहु = सुनो
राम = हे राम
जेहिं = जिसने
सिवधनु = शिवजी का धनुष
तोरा = तोड़ा
सहसबाहु = सहस्रबाहु (हजार भुजाओं वाला राजा )

अर्थ-

हे राम! जिसने भगवान शिव के धनुष को तोड़ा है, वह मेरे लिए सहस्रबाहु के समान शत्रु है।

व्याख्या-

यह प्रसंग उस समय का है जब भगवान राम ने जनकपुरी में शिवधनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया और धनुष टूट गया। धनुष टूटने का समाचार सुनकर परशुराम जी क्रोधित होकर सभा में पहुँचे।

परशुराम जी भगवान शिव के परम भक्त थे और उस धनुष को अत्यंत पूजनीय मानते थे। इसलिए वे कहते हैं कि जिसने इस धनुष को तोड़ा है, वह उनके पुराने शत्रु सहस्रबाहु के समान है।

कार्तवीर्य अर्जुन, जिन्हें सहस्रबाहु कहा जाता है, वही राजा थे जिनका वध परशुराम जी ने किया था। सहस्रबाहु द्वारा परशुराम जी के पिता, महर्षि जमदग्नि, के साथ अन्याय किए जाने के कारण उनके बीच घोर शत्रुता उत्पन्न हुई थी।

सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।

शब्दार्थ-

  • सो = वह
  • बिलगाउ = अलग कर दो / पृथक कर दो
  • बिहाइ = छोड़कर
  • समाजा = सभा / समाज
  • न त = नहीं तो
  • मारे = मार डालूँगा
  • जैहहिं = जाएँगे

अर्थ-

जिस व्यक्ति ने शिवधनुष तोड़ा है, उसे इस सभा से अलग कर दो। अन्यथा, यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएँगे।

व्याख्या-

शिवधनुष टूटने के बाद परशुराम जी अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं। वे राजा जनक की सभा में उपस्थित सभी राजाओं को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि जिसने यह कार्य किया है, उसे तुरंत सामने लाया जाए।

परशुराम जी का क्रोध इतना प्रबल है कि वे घोषणा करते हैं कि यदि धनुष तोड़ने वाले व्यक्ति को अलग नहीं किया गया, तो वे पूरी सभा के राजाओं का संहार कर देंगे।

इस चौपाई में परशुराम जी के उग्र स्वभाव, शिवभक्ति और अटूट संकल्प का चित्रण हुआ है। उनके लिए भगवान शिव का धनुष केवल एक अस्त्र नहीं, बल्कि श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक था।

सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।

शब्दार्थ-

  • सुनि = सुनकर
  • मुनि = मुनि (परशुराम)
  • बचन = वचन / बात
  • लखन = लक्ष्मण
  • मुसुकाने = मुस्कुराए
  • बोले = कहा
  • परसुधरहि = परशु (फरसा) धारण करने वाले, अर्थात् परशुराम को

·       ·  लरिकाईंबचपन में / बाल्यावस्था में

·       ·  कबहुँकभी

·       ·  नहीं

·       ·  असिऐसी / इस प्रकार की

·       ·  रिसक्रोध / गुस्सा

·       ·  कीन्हिकिया / प्रकट किया

·       ·  गोसाईंस्वामी / प्रभु / पूज्य महोदय

अर्थ-

मुनि परशुराम के वचन सुनकर लक्ष्मण जी मुस्कुराए और कुछ व्यंग्यपूर्ण शब्दों में उनसे बोले।

बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।

शब्दार्थ-

·  लरिकाईंबचपन में / बाल्यावस्था में

·  कबहुँकभी

·  नहीं

·  असिऐसी / इस प्रकार की

·  रिसक्रोध / गुस्सा

·  कीन्हिकिया / प्रकट किया

·  गोसाईंस्वामी / प्रभु

हे स्वामी! बचपन में हमने बहुत से धनुष तोड़ दिए, पर आपने कभी इस प्रकार क्रोध नहीं किया।

एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥

·  एहिइस

·  धनुधनुष

·  परपर / के प्रति

·  ममतामोह / लगाव / आसक्ति

·  केहि हेतूकिस कारण / क्यों

·  सुनिसुनकर

केतूध्वज, प्रतीक या गौरव

अर्थ-

"इस धनुष के प्रति इतना मोह किस कारण है?" यह सुनकर भृगुवंश के गौरव परशुराम क्रोधित होकर बोले।

    रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।

    धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।

अर्थ-

·  रेअरे / हे

·  नृपराजा

·  बालकबालक / पुत्र

·  काल बसकाल के वश में / मृत्यु के प्रभाव में

·  बोलतबोल रहे हो / कह रहे हो

·  तोहितुम्हें / तुम

·  न सँभारअपने आपको सँभाल नहीं पा रहे हो

·  धनुही समसाधारण धनुष के समान

·  तिपुरारि धनुभगवान शिव का धनुष (त्रिपुरासुर का संहार करने वाले शिव का धनुष)

·  बिदितप्रसिद्ध / ज्ञात

·  सकलसमस्त / पूरा

·  संसारविश्व / जगत

अर्थ-

हे राजकुमार! तुम मानो काल के वश में होकर ऐसी बातें कर रहे हो और स्वयं को सँभाल नहीं पा रहे हो। क्या तुम भगवान शिव के धनुष को साधारण धनुष के समान समझते हो? यह तो पूरे संसार में प्रसिद्ध है।"

लक्ष्मणजी के व्यंग्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजी अत्यन्त क्रोधित हो उठते हैं। लक्ष्मणजी ने कहा था कि बचपन में उन्होंने अनेक धनुष तोड़े हैं, फिर इस धनुष के टूटने पर इतना क्रोध क्यों किया जा रहा है।

इस पर परशुरामजी कहते हैं—हे राजकुमार! तुम मानो काल के वश में होकर ऐसी बातें कर रहे हो, इसलिए अपने वचनों पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हो।

यहाँ काल बस’ का अर्थ है—मृत्यु या विनाश के प्रभाव में आकर विवेक खो देना। परशुरामजी का आशय है कि लक्ष्मणजी अपने अहित को स्वयं निमंत्रण दे रहे हैं।

इसके बाद वे कहते हैं कि भगवान शिव का धनुष कोई साधारण धनुष नहीं है।तिपुरारि’ भगवान शिव का एक नाम है, जिसका अर्थ है—त्रिपुरासुर का संहार करने वाले। उनका यह धनुष सम्पूर्ण संसार में प्रसिद्ध और पूजनीय है।

इस चौपाई में परशुरामजी की भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति, श्रद्धा और धनुष के प्रति सम्मान प्रकट होता है। साथ ही, यह भी दर्शाता है कि जब मनुष्य अत्यधिक क्रोध में होता है, तो वह बातों को शांतिपूर्वक समझने के बजाय भावनाओं के प्रभाव में प्रतिक्रिया देता है।

 

 

 

रामचरितमानस में यहाँ से आगे की कथा में परशुराम का आक्रोश, लक्ष्मण और परशुराम के दीच व्यंग्योक्तिपूर्ण संवाद और ऐसी स्थिति में भी राम के धीर-गंभीर शांत स्वरूप का वर्णन है। अंततः राम के विनय और विश्वामित्र के समझाने पर तथा राम की शक्ति की परीक्षा लेकर रशुराम का आक्रोश शांत होता है।

 

रचना से संवाद

 

मेरे उत्तर मेरे तर्क

 

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

 

1. "पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।।" यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?

 

(क) आदर और सम्मान

(ख) भक्ति और श्रद्धा

(ग) भय और शिष्टाचार

(घ) प्रेम और सहिष्णुता

उत्तर: (ग) भय और शिष्टाचार

व्याख्या:

पंक्ति "पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।।" में सभा में उपस्थित राजा और लोग अपना तथा अपने पिता का नाम बताकर परशुराम को दंडवत प्रणाम करने लगे।

यह व्यवहार दर्शाता है कि वे परशुराम के क्रोध और पराक्रम से भयभीत थे। साथ ही, वे उनके प्रति शिष्टाचार और सम्मान भी प्रकट कर रहे थे। इसलिए उनकी मनःस्थिति में भय और शिष्टाचार दोनों का भाव स्पष्ट दिखाई देता है।

 

 

2. "जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा" पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?

(क) संवेदनशीलता

(ख) शिष्टता

(ग) सहनशीलता

(घ) उदासीनता

उत्तर: (ख) शिष्टता

व्याख्या:

पंक्ति "जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥" में राजा जनक पुनः आकर परशुराम को प्रणाम करते हैं और सीता को बुलाकर उनसे भी प्रणाम करवाते हैं।

इस व्यवहार से राजा जनक की शिष्टता, विनम्रता और सम्मानपूर्ण आचरण प्रकट होता है। परशुराम के क्रोधित होने के बावजूद जनक ने उनके प्रति आदर बनाए रखा और उचित मर्यादा का पालन किया। अतः इस पंक्ति से राजा जनक के शिष्ट व्यवहार का उद्घाटन होता है।

 

 

3. "अति रिस बोले बचन कठोरा।" जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था-

(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना

(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना

(ग) शिव-धनुष का खंडित होना

(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति

उत्तर: (ग) शिव-धनुष का खंडित होना

व्याख्या:

पंक्ति "अति रिस बोले बचन कठोरा" में परशुराम अत्यधिक क्रोध में आकर राजा जनक से कठोर वचन कहते हैं। उनके क्रोध का मुख्य कारण भगवान शिव के धनुष का टूट जाना था।

परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे और शिव-धनुष को अत्यंत पवित्र एवं पूजनीय मानते थे। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि धनुष खंडित हो गया है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे और जनक से कठोर शब्दों में इसका कारण पूछने लगे।इसलिए उनके कठोर वचनों का मूल कारण था

 

4. राम का कथन "होइहि केउ एक दास तुम्हारा" उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?

(क) कूटनीति और चतुराई

(ख) विनम्रता और मर्यादा

(ग) त्याग और समर्पण

(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास

उत्तर: (ख) विनम्रता और मर्यादा

व्याख्या:

जब परशुराम क्रोधित होकर राम से प्रश्न करते हैं, तब राम अत्यंत विनम्रता से कहते हैं— "होइहि केउ एक दास तुम्हारा" अर्थात् "आपका कोई सेवक ही ऐसा करने वाला होगा।"

इस कथन से राम का विनम्र, शिष्ट और मर्यादित स्वभाव प्रकट होता है। वे जानते थे कि धनुष उन्होंने ही तोड़ा है, फिर भी अहंकार नहीं दिखाते और परशुराम के प्रति सम्मान बनाए रखते हैं।

इसलिए यह कथन राम के विनम्रता और मर्यादा के गुण को दर्शाता है।

 

 

5. "सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।" लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?

(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।

(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।

(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।

(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

उत्तर: (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

व्याख्या:

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद में जब भगवान राम द्वारा शिवधनुष टूट जाता है, तब परशुराम क्रोधित हो जाते हैं। उनके कठोर वचन सुनकर लक्ष्मण मुस्कराते हैं और व्यंग्यपूर्ण उत्तर देते हैं।

लक्ष्मण का मुस्कराना और उपहासपूर्ण वचन बोलना उनके निर्भीक स्वभाव का परिचायक है। वे परशुराम के क्रोध और अहंकार को चुनौती देना चाहते थे तथा अपने बड़े भाई राम का सम्मान बनाए रखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने ऐसे शब्द कहे जिनसे परशुराम स्वयं को अपमानित महसूस करने लगे।

 

 

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

1. "अरध निमेष कलप सम बीता" पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?

उत्तर- "अरध निमेष कलप सम बीता"का भाव यह है कि चिंता, भय और व्याकुलता की स्थिति में थोड़ा-सा समय भी बहुत लंबा प्रतीत होता है।

 यह पंक्ति सीता जी के संदर्भ में कही गई है। परशुराम के क्रोध और सभा के तनावपूर्ण वातावरण को देखकर सीता अत्यंत चिंतित हो उठीं। इसलिए आधा पल भी उन्हें कल्प के समान लंबा प्रतीत हुआ। यह पंक्ति सीता की व्याकुलता और राम के प्रति उनके प्रेम को दर्शाती है।

 

2. "सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।" पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर- इस पंक्ति सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।’’ में परशुराम क्रोधित होकर चेतावनी देते हैं कि अपराधी को सभा से अलग कर दिया जाए, अन्यथा वे वहाँ उपस्थित सभी राजाओं का वध कर देंगे।

सभा में उपस्थित राज-समाज पर इसका प्रभाव यह पड़ा होगा कि सभी राजा अत्यंत भयभीत और आतंकित हो गए होंगे। इसका कारण यह है कि परशुराम महान तपस्वी होने के साथ-साथ अत्यंत पराक्रमी योद्धा भी थे। वे पहले भी अनेक बार क्षत्रियों का संहार कर चुके थे, इसलिए उनकी चेतावनी को कोई हल्के में नहीं ले सकता था। उनके क्रोध और पराक्रम से परिचित राजाओं को अपने प्राणों की चिंता होने लगी होगी। परिणामस्वरूप सभा में सन्नाटा छा गया होगा और सभी लोग परशुराम के क्रोध को शांत करने का उपाय सोचने लगे होंगे।

 

3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का 'विनय' का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के 'तर्क' का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर- मेरी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का 'विनय' का मार्ग अधिक उचित है। जब कोई व्यक्ति अत्यधिक क्रोधित होता है, तब तर्क-वितर्क करने से उसका क्रोध और बढ़ सकता है, जबकि विनम्रता और शालीन व्यवहार उसके मन को शांत करने में सहायक होते हैं।

राम ने परशुराम के प्रति आदर और विनम्रता का व्यवहार किया। उन्होंने स्वयं को उनका सेवक बताते हुए शांतिपूर्वक बात की, जिससे परशुराम का क्रोध धीरे-धीरे कम हुआ। इसके विपरीत, लक्ष्मण ने तर्कपूर्ण और व्यंग्यात्मक उत्तर दिए, जिनसे परशुराम का क्रोध और भड़क उठा।

हालाँकि तर्क का अपना महत्व है, लेकिन क्रोध की स्थिति में पहले विनय और धैर्य से वातावरण को शांत करना अधिक आवश्यक होता है। इसलिए परशुराम जैसे क्रोधी और पराक्रमी व्यक्ति को शांत करने के लिए राम का विनम्र एवं संयमित व्यवहार अधिक प्रभावी और उचित सिद्ध हुआ।

 

 

4. 'हृदयं न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।' श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?

उत्तर- 'हृदयं न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।' पंक्ति से श्रीराम के व्यक्तित्व के अनेक श्रेष्ठ गुण प्रकट होते हैं।

यह पंक्ति दर्शाती है कि श्रीराम धैर्यवान, गंभीर, संयमी, विवेकशील और स्थितप्रज्ञ हैं। वे न तो सफलता या प्रशंसा मिलने पर अत्यधिक प्रसन्न होते हैं और न ही संकट या अपमान की स्थिति में दुःखी अथवा विचलित होते हैं। वे हर परिस्थिति में अपने मन और भावनाओं पर नियंत्रण बनाए रखते हैं।

इस पूरे पाठ में श्रीराम का भावनात्मक संतुलन उन्हें अन्य पात्रों से अलग बनाता है। एक ओर परशुराम क्रोध से उत्तेजित हैं और लक्ष्मण उनके कटु वचनों का तीखे तर्कों से उत्तर देते हैं, वहीं दूसरी ओर श्रीराम शांत, विनम्र और धैर्यपूर्ण बने रहते हैं। वे किसी भी परिस्थिति में आवेश में नहीं आते और सोच-समझकर मर्यादित भाषा में उत्तर देते हैं।

 

मेरी कल्पना मेरे अनुमान

 

नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर दीजिए-

 

1.कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर- मैं जनक की सभा में उपस्थित एक राजा था। जब शिवधनुष टूटने का समाचार सुनकर परशुराम जी सभा में आए, तो उनके तेज और क्रोध को देखकर सभी राजा भयभीत हो गए। उन्होंने धनुष तोड़ने वाले को दंड देने की बात कही। लक्ष्मण ने उनके प्रश्नों का निर्भीकता से उत्तर दिया, जिससे उनका क्रोध और बढ़ गया। तब श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता और शांति से उनसे संवाद किया। अंततः परशुराम जी को ज्ञात हुआ कि श्रीराम कोई साधारण राजकुमार नहीं, बल्कि दिव्य पुरुष हैं। उनका क्रोध शांत हो गया और वे श्रीराम की महिमा स्वीकार कर प्रसन्नतापूर्वक वहाँ से चले गए। यह दृश्य मेरे लिए अत्यंत अद्भुत और अविस्मरणीय था।

 

2. "अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।" जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?

 

(संकेत- सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)

उत्तर- "अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।" पंक्ति के अनुसार, राजा जनक परशुराम के क्रोध से भयभीत होकर कोई उत्तर नहीं दे सके। यह देखकर कुटिल राजा मन ही मन प्रसन्न हुए, क्योंकि वे जनक और श्रीराम की प्रतिष्ठा कम होते देखना चाहते थे। उन्हें लगा कि अब परशुराम के क्रोध के कारण जनक और उनके परिवार को अपमान का सामना करना पड़ेगा।

यह प्रसंग मनुष्य के व्यवहार की उस सच्चाई को उजागर करता है कि कुछ लोग दूसरों की कठिनाई, असफलता या अपमान में प्रसन्नता अनुभव करते हैं, विशेषकर जब वे ईर्ष्या या द्वेष से ग्रस्त हों। यह मानव स्वभाव के नकारात्मक पक्ष को दर्शाता है।

 

 

शब्द-संपदा

 

भृगुपति - भृगुकुल के स्वामी

कराला - भयानक, डरावना

भुआला - राजा, महीप, भूपाल

सुभायँ - स्वभाव, आदत, सहज प्रकृति

चितवहिं - देखना, निरखना

 खुटानी - पूरी होना, समाप्त होना

बहोरि - इकट्ठा करना, फिर, अनंतर, पीछे

आसिष/असीस - आशीर्वाद

ढोटा - पुत्र, बेटा, बालक

जोटा - जोड़ा, गोनी

लोचन - आँख, देखने की क्रिया

जहें - अन्यत्र, और कहीं 

रोष-क्रोध, गुस्सा

 बेगि-शीघ्र, जल्दी, वेगपूर्वक

 महि-जहाँ, जिस स्थान पर, जिस जगह

 


 

सृजन

 

1. परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।

 

2. सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए।

 

(संकेत- लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)

 

3. कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण बातों का पता चलता हो। 

यदि मुझे अपना परिचय देना हो, तो मैं राजाओं की तरह आत्म-प्रशंसा करने के बजाय शालीनता, मानवीय मूल्यों और निरंतर सीखने की भावना पर बल देना उचित समझूँगा। मैं स्वयं को एक सकारात्मक और संवेदनशील व्यक्ति मानता हूँ, जो जीवन की हर चुनौती का सामना धैर्य और सूझबूझ से करने में विश्वास रखता है। मेरी वास्तविक शक्ति मेरी मधुर वाणी, दूसरों के प्रति सम्मान और अपनी जिम्मेदारियों के प्रति ईमानदारी में निहित है। मैं सदैव अपने कर्म के प्रति निष्ठावान रहते हुए समाज में एक सकारात्मक योगदान देने और खुद को कल से बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहता हूँ।

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