सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

 

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ। वे मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश के निवासी थे। निराला की औपचारिक शिक्षा नौवीं तक महिषादल में ही हुई। उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया।

उनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता और नए पत्तते। उपन्यास, कहानी, आलोचना और निबंध लेखन में भी उनकी ख्याति अविस्मरणीय है। निराला रचनावली के आठ खंडों में उनका संपूर्ण साहित्य प्रकाशित है। दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता और प्रकृति का विराट तथा उदात्त चित्र उनकी रचनाओं में उपस्थित है। छायावादी रचनाकारों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उपेक्षितों और पीड़ितों के प्रति उनकी कविताओं में गहरी सहानुभूति मिलती है। 'निराला' का निधन सन् 1961 में हुआ।

'भारति, जय, विजयकरे!' कविता 'निराला' की देशप्रेम से ओत-प्रोत एक प्रेरणादायक रचना है। कविता के आरंभ में ही कवि 'भारति, जय, विजयकरे!' कहकर भारत को विजयश्री प्राप्त करने की कामना करता है। वह भारतभूमि को 'कनक-शस्य कमलधरे!' कहकर संबोधित करता है जो भारत की कृषि-परंपरा और श्रम के सौंदर्य को दर्शाता है। कविता में भारत की भौगोलिक सुंदरता का ऐसा चित्र खींचा गया है मानो भारत कोई देवी हो, जिसके चरणों को समुद्र अपने जल से धोता है। नदी, वन, पुष्प, हिमालय, गंगा आदि प्राकृतिक शोभा को भारत के वस्त्राभूषण की तरह प्रस्तुत किया गया है। कवि भारत को एक चेतन सत्ता के रूप में देखता है, जिसकी दिशाओं में ओंकार' की गूंज हो रही है और जो अनेक तरह के स्वरों और विचारों से

 

भारति, जय, विजयकरे !

 

भारति, जय. विजयकरे !

कनक-शस्य-कमलधरे !

 शब्दार्थ: भारति = भारत माता / सरस्वती, विजयकरे = विजय दिलाने वाली, कनक = सोना, शस्य = फसलें/अनाज, कमलधरे = हाथ में कमल धारण करने वाली।

अर्थ- इन पंक्तियो मे कवि भारतमाता की वंदना करते हुए उनकी समृद्धि, सौंदर्य और गौरव का चित्रण करते हैं।  

 हे भारतमाता! आपकी जय हो, आप सदा विजयी रहें।

 "कनक-शस्य-कमलधरे!" — आप स्वर्ण जैसी लहलहाती फसलों और कमलों से सुशोभित हैं; अर्थात भारत धन-धान्य और प्राकृतिक सौंदर्य से सम्पन्न है।

व्याख्या-

कवि भारत माता को संबोधित करते हुए कहते है कि हे भारत माता! आपकी सदा जय हो और आप सदैव विजयी रहें। आपका स्वरूप अत्यंत मनोहर और वैभवशाली है। आपके आँचल में सोने के समान लहलहाती फसलें हैं, जो देश की कृषि-संपन्नता का प्रतीक हैं। कमल के फूल भारत की प्राकृतिक सुंदरता और पवित्रता को दर्शाते हैं। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से भारत की समृद्धि, गौरव और महिमा का गुणगान करते है तथा अपने देश के प्रति गहरी श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करते है।

भावार्थ-

भारत माता धन-धान्य, प्राकृतिक सौंदर्य और वैभव से परिपूर्ण हैं। कवि उनकी विजय और यश की कामना करते हुए उनके प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति प्रकट करता है।

 

लंका पदतल शतदल,

गर्जितोर्मि सागर-जल

धोता शुचि चरण युगल

स्तव कर बहु-अर्थ-भरे !

शब्दार्थ-

पदतल = चरणों के नीचे ,  शतदल = सौ पंखुड़ियों वाला कमल ,  गर्जितोर्मि = गर्जना करती हुई लहरें .  शुचि = पवित्र ,  चरण युगल = दोनों चरण ,  स्तव = स्तुति, प्रशंसा ,  बहु-अर्थ-भरे = गहन अर्थों से युक्त

अर्थ- इन पंक्तियों में कवि भारत माता के दिव्य स्वरूप का वर्णन करते है। भारत माता के चरणों के निकट स्थित लंका सौ पंखुड़ियों वाले कमल के समान प्रतीत होती है। समुद्र की गर्जना करती हुई लहरों का जल उनके पवित्र चरणों को धोता रहता है। ऐसा लगता है मानो समुद्र अपनी लहरों के माध्यम से गूढ़ और अर्थपूर्ण शब्दों में भारत माता की स्तुति कर रहा हो। व्याख्या-

कवि ने भारत माता की कल्पना एक दिव्य देवी के रूप में की है। उनके चरणों के पास स्थित लंका कमल के समान सुंदर दिखाई देती है। चारों ओर फैला विशाल समुद्र अपनी गर्जन करती लहरों के साथ भारत माता के पवित्र चरणों का अभिषेक करता रहता है। कवि को ऐसा अनुभव होता है कि समुद्र की लहरें केवल जल की ध्वनि नहीं हैं, बल्कि वे भारत माता की महिमा का गुणगान कर रही हैं। इस प्रकार कवि ने भारत की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक सौंदर्य और गौरव का अत्यंत भावपूर्ण चित्र प्रस्तुत किया है।

भावार्थ-

भारत माता अत्यंत महान, पवित्र और गौरवशाली हैं। समुद्र भी उनकी महिमा का गान करता हुआ प्रतीत होता है। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से भारत के वैभव, प्राकृतिक सौंदर्य और महत्ता को व्यक्त करता है तथा अपनी देशभक्ति और श्रद्धा प्रकट करता है।

तरु-तृण-वन-लता वसन,

अंचल में खचित सुमन;

गंगा ज्योतिर्जल-कण

धवल धार हार गले।

शब्दार्थ- तरु – वृक्ष ,  तृण – घास ,  वन – जंगल ,  लता – बेलें ,  वसन – वस्त्र ,  अंचल – साड़ी का पल्लू,  खचित – जड़ा हुआ, सुसज्जित,  सुमन – फूल ,  ज्योतिर्जल-कण – चमकते हुए जल की बूंदें ,  धवल – श्वेत, उज्ज्वल ,  धार – जलधारा ,  हार – माला

 अर्थ-इन पंक्तियों में कवि ने भारत माता का मानवीकरण करते हुए उनके प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि भारत भूमि की प्राकृतिक वनस्पति—यहाँ के विशाल वृक्ष (तरु), हरी-भरी घास (तृण), घने जंगल (वन) और फैली हुई बेलें (लता)—भारत माता के वस्त्र (वसन) हैं। प्रकृति ने अपने हरे-भरे आवरण से भारत माता को ढका हुआ है।

 भारत माता का आँचल रंग-बिरंगे फूलों (सुमन) से सजा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके आँचल पर सुंदर फूल काढ़े या जड़े गए हों।

भारत की पवित्र नदियाँ, विशेषकर गंगा, जिसका जल प्रकाशमय और निर्मल (ज्योतिर्जल) है, भारत माता के गले में सुशोभित हो रही हैं। गंगा की वह श्वेत, स्वच्छ और चमकदार धारा ऐसी लगती है मानो भारत माता ने अपने गले में सफेद मोतियों का एक सुंदर हार पहन रखा हो।

भावार्थ-

कवि ने इस वर्णन के माध्यम से भारत की प्राकृतिक संपदा, पवित्रता और भव्यता का गुणगान किया है। प्रकृति के विविध रूपों को भारत माता के आभूषण बनाकर कवि ने देश के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम को व्यक्त किया है।

 

मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,

प्राण प्रणव ओंकार,

 ध्वनित दिशाएँ उदार,

शतमुख-शतरव-मुखरे !

शब्दार्थ- मुकुट – ताज, सिर का आभूषण ,  शुभ्र – श्वेत, उज्ज्वल ,  हिम-तुषार – बर्फ और हिमकण

प्राण – जीवन शक्ति ,  प्रणव – ‘ॐ’ का पवित्र स्वर ,  ओंकार – ॐ की ध्वनि ,  ध्वनित – गूँजती हुई,  दिशाएँ – चारों ओर के क्षेत्र ,  उदार – विशाल, व्यापक ,  शतमुख – सैकड़ों मुखों वाला ,  शतरव – सैकड़ों स्वर या ध्वनियाँ ,  मुखरे – गुंजायमान, मुखरित

व्याख्या-

इन पंक्तियों में कवि ने भारत माता की महानता, आध्यात्मिकता और गौरव का चित्रण किया है। भारत के उत्तर में स्थित हिमालय की उज्ज्वल हिमाच्छादित चोटियाँ भारत माता के सिर पर मुकुट के समान शोभायमान हैं। कवि के अनुसार भारत की आत्मा में ‘ॐ’ का पवित्र नाद बसता है, जो भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का प्रतीक है।

यह दिव्य ध्वनि इतनी व्यापक है कि चारों दिशाएँ उससे गुंजायमान हो उठती हैं। प्रकृति और वातावरण मानो अनेक मुखों से एक साथ भारत की महिमा का गान कर रहे हों। इस प्रकार कवि ने भारत की प्राकृतिक भव्यता और आध्यात्मिक चेतना का अत्यंत प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया है।

काव्य-सौंदर्य-

  • रूपक अलंकार – हिमालय को भारत माता का मुकुट कहा गया है।
  • मानवीकरण अलंकार – भारत माता को जीवंत नारी के रूप में चित्रित किया गया है।
  • भारतीय संस्कृति और अध्यात्म की महिमा का वर्णन हुआ है।
  • भाषा संस्कृतनिष्ठ, ओजपूर्ण एवं भावप्रधान है।
  • देशभक्ति, गौरव और आध्यात्मिक चेतना की भावना व्यक्त हुई है।रचना से संवाद-

 

मेरे उत्तर मेरे तर्क-

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

1. "भारति, जय, विजयकरे" कविता में विशेष रूप से-

(क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है।

(ख) भारत की सांस्कृतिक विविधता बताई गई है।

(ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।

(घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।

उत्तर- (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।

तर्क -कवि ने भारत माता की महिमा का वर्णन करते हुए भारत की प्राकृतिक सुंदरता, आध्यात्मिक ज्ञान और समृद्धि की प्रशंसा की है।

  • "तरु-तृण-वन-लता वसन" पंक्ति में भारत की प्राकृतिक शोभा का वर्णन है।
  • "गंगा ज्योतिर्जल-कण" में पवित्र गंगा की महिमा बताई गई है।
  • "प्राण प्रणव ओंकार" में भारत की आध्यात्मिक चेतना और ज्ञान का गुणगान किया गया है।
  • हिमालय, गंगा, वन और पुष्पों के माध्यम से भारत की संपन्नता और वैभव का चित्रण किया गया है।

2. "कनक-शस्य-कमल धरे" पंक्ति का भावार्थ है-

(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता

(ख) भारत की नदियों का सौंदर्य

(ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता

(घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास

उत्तर- (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता

कारण:

कवि भारत माता को ऐसी देवी के रूप में चित्रित करता है, जिसने स्वर्ण-सी लहलहाती फसलें और कमल धारण किए हुए हैं। यह भारत की उर्वर भूमि, कृषि-संपन्नता और समृद्धि का प्रतीक है।अतः इस पंक्ति का भाव यह है कि भारत धन-धान्य से परिपूर्ण और समृद्ध देश है।

3. समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं-

(क) गंगा ज्योतिर्जल-कण/ धवल धार हार गले

(ख) गर्जितोर्मि सागर-जल/धोता शुचि चरण युगल

(ग) भारति, जय, विजयकरे/कनक-शस्य-कमलधरे !

(घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/शतमुख-शतरव-मुखरे !

उत्तर- (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार / शतमुख-शतरव-मुखरे !

कारण:

इन पंक्तियों में कवि यह बताता है कि भारत की महिमा और गौरव की ध्वनि चारों दिशाओं में गूँज रही है। "ध्वनित दिशाएँ उदार" का अर्थ है कि सभी दिशाएँ भारत की कीर्ति से गुंजायमान हैं, और "शतमुख-शतरव-मुखरे" का भाव है कि मानो सैकड़ों मुखों से भारत की महानता का गुणगान किया जा रहा हो।

यह भारत के महत्व और यश के विश्वव्यापी प्रसार का संकेत देता है। इसलिए ये पंक्तियाँ समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करती हैं।

4. कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?

(क) सरल, बोल-चाल की भाषा

(ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त

(ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूर्ण

(घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक

उत्तर- (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त

कारण: भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों का अधिक प्रयोग हुआ है, जैसे— तरु, तृण, वसन, सुमन, प्रणव, ओंकार, धवल, शस्य आदि। साथ ही इसमें अनेक समासयुक्त पदों का प्रयोग हुआ है, जैसे—

  • हिम-तुषार
  • ज्योतिर्जल-कण
  • कनक-शस्य
  • शतमुख-शतरव

ये शब्द कविता को गंभीर, ओजपूर्ण और प्रभावशाली बनाते हैं।

 

5. भारत के वस्त्रों में 'तरु-तृण-वन-लता' और गले में 'गंगा-धारा' को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?

(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक

(ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम

(ग) ऐतिहासिक और भौगोलिक

(घ) सामाजिक और राजनीतिक

उत्तर- (ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम

कारण: कवि ने 'तरु-तृण-वन-लता' को भारत माता के वस्त्र तथा 'गंगा-धारा' को उनके गले का हार बताकर भारत की प्राकृतिक सुंदरता और पवित्रता का चित्रण किया है। इस चित्रण का उद्देश्य पाठकों के मन में अपने देश के प्रति गौरव, श्रद्धा और प्रेम की भावना उत्पन्न करना है।

कविता में भारत माता का मानवीकरण करके देश की महिमा का गुणगान किया गया है, जिससे राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति का संदेश मिलता है। यद्यपि प्रकृति और संस्कृति का वर्णन भी है, परंतु उसका मुख्य उद्देश्य देशप्रेम की भावना को जागृत करना है।

अर्थ और भाव-

नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए-

(क)"लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल!"

उत्तर- भारत माता के दक्षिण में स्थित लंका उनके पैरों के नीचे एक कमल के फूल के समान सुशोभित है। विशाल समुद्र का जल अपनी गर्जना करती हुई ऊँची लहरों के साथ निरंतर भारत माता के दोनों पवित्र चरणों को धो रहा है।

भाव- इस पंक्ति के माध्यम से कवि ने भारत की भौगोलिक स्थिति का अत्यंत सुंदर और सजीव चित्रण किया है:

·       चरणों में सागर: कवि स्पष्ट कर रहे हैं कि भारत भूमि इतनी पवित्र और महान है कि स्वयं विशाल समुद्र एक सेवक की तरह गर्जना करते हुए उसके चरणों की वंदना करता है और उन्हें धोता है।

·       लंका की स्थिति: कवि ने लंका को भारत माता के चरणों के पास स्थित एक सुंदर कमल के फूल की तरह दिखाया है, जो भारत के प्राकृतिक मानचित्र की भव्यता को दर्शाता है।

·       भक्ति और श्रद्धा: यहाँ प्रकृति को भारत माता की सेवा करते हुए दिखाकर कवि ने देश के प्रति गहरी श्रद्धा, गौरव और राष्ट्रप्रेम की भावना को जगाने का प्रयास किया है।

 

(ख) “प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!"

उत्तर- हे भारत माता! आप हमारे जीवन की शक्ति हैं और पवित्र 'ॐ' (ओंकार) की ध्वनि के समान हैं। आपकी इस पावन महिमा और ज्ञान से चारों विशाल दिशाएँ गूँज रही हैं। सैकड़ों मुखों और सैकड़ों सुरों-आवाजों (भारत की विविध भाषाओं, संस्कृतियों और यहाँ की नदियों के संगीत) से आपकी ही महिमा का गान लगातार गूँज रहा है।

भाव-

इस पंक्ति के माध्यम से कवि निराला जी ने भारत की आध्यात्मिक महानता और इसकी सांस्कृतिक विविधता को दर्शाया है:

·       आध्यात्मिक पहचान: भारत को 'प्रणव ओंकार' कहकर कवि ने यह स्पष्ट किया है कि भारत संसार में अध्यात्म, शांति और पवित्रता का केंद्र है। जैसे ॐ की ध्वनि मन को शांति देती है, वैसे ही भारत का ज्ञान संसार को सही राह दिखाता है।

·       अनेकता में एकता: 'शतमुख-शतरव' (सैकड़ों मुख और आवाजें) का अर्थ है कि भारत में भले ही सैकड़ों भाषाएँ, बोलियाँ, नदियाँ और संस्कृतियाँ हैं, लेकिन वे सब मिलकर अंत में एक ही सुर में भारत माता का गौरव गान करती हैं।

विश्व गुरु का रूप: भारत के ज्ञान और संस्कृति की गूँज केवल यहाँ तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया की सभी 'उदार दिशाओं' यानी पूरे विश्व में फैली हुई है।

 

 

मेरी समझ मेरे विचार-

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

1.कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?

उत्तर- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कविता "भारति, जय, विजय करे!" में कवि की देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम तथा मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और समर्पण की भावना की अभिव्यक्ति मिलती है। कवि भारत माता की जय, विजय और गौरव की कामना करते है तथा देश की उन्नति और समृद्धि के प्रति अपनी आशा व्यक्त करते है।

 

2. कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?

उत्तर- कवि ने कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन अत्यंत मनोहारी ढंग से किया है। कवि ने भारत की नदियों, हरियाली, पर्वतों, सागर और प्राकृतिक संपदा को देश की शोभा के रूप में प्रस्तुत किया है। इन प्राकृतिक दृश्यों से भारत की महानता और समृद्धि का चित्र उभरता है।

हाँ, मैं मानती हूँ कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का एक महत्वपूर्ण कार्य है, क्योंकि प्रकृति किसी भी देश की अमूल्य धरोहर होती है। पेड़-पौधों, नदियों, जंगलों और पर्यावरण की रक्षा करने से देश स्वच्छ, सुंदर और समृद्ध बनता है। इसलिए प्रकृति की रक्षा करना वास्तव में अपने देश की सेवा और देशप्रेम का प्रतीक है।

3. "कनक-शस्य-कमलधरे!" पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?

उत्तर- "कनक-शस्य-कमलधरे!" पंक्ति भारतभूमि की उर्वरता, समृद्धि और प्राकृतिक सुंदरता की ओर संकेत करती है। यहाँ "कनक-शस्य" का अर्थ है सोने के समान चमकती हुई धान्य (फसलें), जो भारत की कृषि-संपन्नता को दर्शाता है। "कमलधरे" का अर्थ है कमलों को धारण करने वाली, जो भारत की प्राकृतिक शोभा, पवित्रता और सौंदर्य का प्रतीक है।

इस प्रकार यह पंक्ति भारत की हरित-श्यामल भूमि, कृषि-समृद्धि, प्राकृतिक वैभव और सुंदरता का वर्णन करती है।

 

4. "मुकुट शुभ्र हिम-तुषार" पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?

उत्तर- "मुकुट शुभ्र हिम-तुषार" पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट इसलिए कहा गया है क्योंकि वह भारत के उत्तरी भाग में स्थित है और उसकी हिमाच्छादित (बर्फ से ढकी) ऊँची-ऊँची चोटियाँ मुकुट के समान दिखाई देती हैं। जिस प्रकार मुकुट किसी राजा की शोभा और गौरव को बढ़ाता है, उसी प्रकार हिमालय भारत की सुंदरता, गौरव और महिमा को बढ़ाता है। साथ ही, हिमालय देश की रक्षा करने वाले प्राकृतिक प्रहरी के रूप में भी कार्य करता है। इसलिए कवि ने हिमालय को भारत का शुभ्र (सफेद) मुकुट कहा है।

 

 

विषयों से संवाद

 

1. स्वतंत्रता-पूर्व लिखी इस कविता में भारत को ज्ञान, कृषि और संस्कृति के प्रतीक/परिचायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान संदर्भ में यदि आपको भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले तो आप भारत की किन विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करेंगे?

उत्तर- यदि मुझे वर्तमान संदर्भ में भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले, तो मैं भारत की वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास, अंतरिक्ष उपलब्धियों, डिजिटल क्रांति, लोकतांत्रिक मूल्यों, युवाशक्ति और महिला सशक्तिकरण को प्रमुखता से शामिल करूँगा/करूँगी। साथ ही, भारत की भाषाई, धार्मिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता में एकता को भी विशेष रूप से दर्शाऊँगा/दर्शाऊँगी।

मैं भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करूँगा/करूँगी जो अपनी प्राचीन संस्कृति और परंपराओं को संजोते हुए आधुनिक विज्ञान, शिक्षा, नवाचार और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। यही आधुनिक भारत की सबसे बड़ी विशेषता है।

 

1."शतमुख-शतरव-मुखरे!" पंक्ति में भारत के विविध पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज किस प्रकार 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की संकल्पना को साकार करते हैं?

उत्तर- "शतमुख-शतरव-मुखरे!" पंक्ति भारत की विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है। भारत में अनेक भाषाएँ, धर्म, पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज हैं, फिर भी सभी भारतीय आपसी प्रेम, सम्मान और भाईचारे के साथ रहते हैं। विभिन्न राज्यों के लोग एक-दूसरे के त्योहारों और परंपराओं का सम्मान करते हैं तथा उनमें भाग लेते हैं।

यही विविधता में एकता की भावना 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की संकल्पना को साकार करती है। भारत की सांस्कृतिक विविधता देश को और अधिक मजबूत, समृद्ध तथा श्रेष्ठ बनाती है। इसलिए अनेकता में एकता भारत की सबसे बड़ी विशेषता है।

 

 

2.भारत को सुदृढ़ करने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के महत्व को बताते हुए संक्षिप्त लेख लिखिए।

उत्तर- भारत की प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा उसकी सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं। हिमालय, नदियाँ, वन और उपजाऊ भूमि भारत को प्राकृतिक रूप से समृद्ध बनाते हैं। प्रकृति देश के आर्थिक विकास, कृषि और पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारत की संस्कृति विविधता में एकता का संदेश देती है। विभिन्न धर्म, भाषाएँ, पर्व और परंपराएँ भारतीय समाज को एक सूत्र में बाँधती हैं। इससे राष्ट्रीय एकता और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।

भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा विश्वभर में प्रसिद्ध है। वेद, उपनिषद, योग, आयुर्वेद तथा वैज्ञानिक और दार्शनिक विचार आज भी मानवता का मार्गदर्शन करते हैं। यह ज्ञान-परंपरा शिक्षा, नैतिकता और नवाचार को बढ़ावा देती है।

3.कविता में गंगा को भारत के स्वच्छ और श्वेत हार एवं हिमालय को मुकुट के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। वर्तमान संदर्भ में बताइए कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय को किस प्रकार प्रभावित किया है?

उत्तर- कवि निराला जी ने जिस गंगा को "श्वेत हार" और हिमालय को "मुकुट" कहा था, आज आधुनिक समय में प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण उनकी स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है।

वर्तमान संदर्भ में इनका प्रभाव इस प्रकार देखा जा सकता है:

1. गंगा (स्वच्छ और श्वेत हार) पर प्रभाव

·       प्रदूषण की मार: फैक्ट्रियों का केमिकल युक्त कचरा, शहरों का गंदा पानी और प्लास्टिक कचरा सीधे गंगा में बहाए जाने के कारण इसका पानी अब "स्वच्छ और श्वेत" नहीं रहा, बल्कि कई जगहों पर अत्यधिक प्रदूषित और काला हो चुका है।

 

·       जल संकट: अंधाधुंध पानी निकालने और प्रदूषण के कारण नदी का जलस्तर (Water level) लगातार घट रहा है, जिससे कई जगहों पर नदी सूखने की कगार पर है।

·       जलीय जीवों को खतरा: पानी के जहरीले होने से गंगा में रहने वाली दुर्लभ 'डॉल्फिन' और अन्य मछलियों का अस्तित्व खतरे में आ गया है।

2. हिमालय (मुकुट) पर प्रभाव-

·       ग्लेशियरों का पिघलना: जलवायु परिवर्तन (ग्लोबल वार्मिंग) के कारण हिमालय के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। इससे सदियों पुराने ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं, जो हमारी नदियों के पानी का मुख्य स्रोत हैं।

·       असमय आपदाएँ: तापमान बढ़ने और पहाड़ों पर अत्यधिक निर्माण (होटल, सड़कें) के कारण भूस्खलन

  • और केदारनाथ जैसी अचानक आने वाली बाढ़ (Flash floods) की घटनाएँ बहुत बढ़ गई हैं।
  • बर्फ की कमी: हिमालय का जो मुकुट हमेशा सफेद बर्फ से ढका रहता था, अब गर्मी बढ़ने के कारण कई पहाड़ गर्मियों में बिल्कुल सूखे और काले दिखाई देने लगे हैं।

निष्कर्ष-

यदि हिमालय के ग्लेशियर इसी तरह पिघलते रहे और नदियाँ प्रदूषित होती रहीं, तो आने वाले समय में भारत को पीने के पानी के भयंकर संकट का सामना करना पड़ेगा। इसलिए, आज के समय में गंगा को साफ रखना और हिमालय के पर्यावरण को बचाना ही हमारी सबसे बड़ी देशभक्ति और कर्तव्य है।

 

 

 

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