Manushyta || मनुष्यता || Saar || सार || प्रश्न अभ्यास (महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर) || Question Answers ||



मनुष्यता

कवि परिचय

कवि – मैथिलीशरण गुप्त
जन्म – 1886( चिरगाँव )
मृत्यु – 1964

 

मनुष्यता पाठ प्रवेश

 

प्रकृति के अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य में सोचने की शक्ति अधिक होती है। वह अपने ही नहीं दूसरों के सुख – दुःख का भी ख्याल रखता है और दूसरों के लिए कुछ करने में समर्थ होता है। जानवर जब चरागाह में जाते हैं तो केवल अपने लिए चर कर आते हैं, परन्तु मनुष्य ऐसा नहीं है। वह जो कुछ भी कमाता है ,जो कुछ भी बनाता  है ,वह दूसरों के लिए भी करता है और दूसरों की सहायता से भी करता है।

 

प्रस्तुत पाठ का कवि अपनों के सुख – दुःख की चिंता करने वालों को मनुष्य तो मानता है परन्तु यह मानने को तैयार नहीं है कि उन मनुष्यों में मनुष्यता के सारे गुण होते हैं। कवि केवल उन मनुष्यों को महान मानता है जो अपनों के सुख – दुःख से पहले दूसरों की चिंता करते हैं। वह मनुष्यों में ऐसे गुण चाहता है जिसके कारण कोई भी मनुष्य इस मृत्युलोक से चले जाने के बाद भी सदियों तक दूसरों की यादों में रहता है अर्थात वह मृत्यु के बाद भी अमर रहता है|

 

भाषा - मानक खडी बोली का प्रयोग किया है।

      अनुप्रास अलंकार व तुकांत शैली प्रयुक्त हुई है।

      सरस,प्रवाहपूर्ण तथा सारगर्भित है।

     

 

सार

 

प्रस्तुत कविता मे कवि ने मनुष्य को स्वार्थ और अहंकार का त्याग कर 'वसुधैव कुटुंबकम्' (पूरी धरती एक परिवार है) की भावना को अपनाने की सीख देते है। कवि के अनुसार, धन और शक्ति केवल बाहरी वस्तुएं हैं, वास्तविक पूँजी तो 'सहानुभूति' और 'परोपकार' है। इस प्रकार कवि के अनुसार केवल वही व्यक्ति मनुष्य है जो अपनी उन्नति के साथ-साथ समाज के पिछड़े और दुखी लोगों का भी कल्याण करे।

 

मनुष्यता की पाठ व्याख्या


1. 
विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,

मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।
हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।
वही पशु- प्रवृति  है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ

मर्त्य – मृत्यु
यों – ऐसे
वृथा – बेकार
प्रवृति – आदत


व्याख्या -: 


इस पद्यांश में कवि मनुष्य को जीवन और मृत्यु की सच्चाई बताते हुए परोपकार की प्रेरणा दे रहे हैं। कवि कहते हैं कि मनुष्य को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि यह शरीर नश्वर है (मर्त्य है), इसलिए मृत्यु से कभी डरना नहीं चाहिए। मृत्यु तो एक दिन आनी ही है, लेकिन हमें ऐसी मृत्यु प्राप्त करनी चाहिए जिसे लोग हमारे मरने के बाद भी याद रखें। कवि इसे 'सुमृत्यु' कहते हैं। यदि व्यक्ति दूसरों के लिए कुछ किए बिना मर जाता है, तो उसका जीना और मरना दोनों व्यर्थ (वृथा) है। कवि के अनुसार, वह व्यक्ति वास्तव में कभी नहीं मरता जो दूसरों के हित के लिए जीता है। स्वार्थ की भावना केवल पशुओं में होती है (पशु-प्रवृत्ति), जो केवल अपने चारे या भोजन की चिंता करते हैं। इसके विपरीत, सच्चा मनुष्य वही है जो अपने स्वार्थ को त्यागकर दूसरे मनुष्यों के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दे।

मुख्य संदेश:

सच्ची मनुष्यता परोपकार और त्याग में है।

केवल अपने लिए जीना पशु के समान है।

सार्थक जीवन वही है जो दूसरों की सेवा में बीते।


 

2.

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

 

शब्दार्थ
उदार – महान ,श्रेष्ठ
बखानती – गुण गान करना

धरा – धरती
कृतघ्न – ऋणी , आभारी
सजीव – जीवित
कूजती – करना
अखण्ड – जिसके टुकड़े न किए जा सकें
असीम – पूरा

 

व्याख्या -: इस पद्यांश में कवि एक उदार (दयानू और परोपकारी) मनुष्य के महत्व का वर्णन कर रहे हैं। कवि कहते हैं कि जो मनुष्य उदार हृदय का होता है और दूसरों के लिए अपना जीवन समर्पित कर देता है, स्वयं विद्या की देवी 'सरस्वती' उसकी महिमा का गुणगान अपनी पुस्तकों में करती हैं। पूरी धरती (धरा) ऐसे परोपकारी मनुष्य का आभार मानती है और खुद को धन्य महसूस करती है। ऐसे महान व्यक्ति का यश (कीर्ति) युगों-युगों तक जीवित रहता है और पूरी दुनिया (सृष्टि) उसकी पूजा करती है। कवि के अनुसार, सच्चा मनुष्य वही है जो पूरे विश्व को अपना परिवार मानते हुए सभी के प्रति 'अखंड आत्मभाव' (एकता और अपनेपन की भावना) रखता है। अंत में कवि पुनः दोहराते हैं कि वास्तविक मनुष्य वही है जो स्वार्थ त्यागकर दूसरों के हित के लिए जीता और मरता है।

मुख्य बिंदु:

सरस्वती बखानती: उदार व्यक्ति का नाम इतिहास में अमर हो जाता है।

कृतार्थ भाव: समाज और पृथ्वी ऐसे व्यक्ति की ऋणी रहती है।

अखंड आत्मभाव: संपूर्ण विश्व में भाईचारे और एकता का संदेश देना ही सच्ची मनुष्यता है।


3.

क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया।
अनित्य देह के  लिए अनादि जीव क्या डरे?
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के  लिए मरे।।

 

शब्दार्थ

क्षुधार्त – भूख से परेशान
करस्थ – हाथ की
परार्थ – पूरा
अस्थिजाल – हड्डियों का समूह
उशीनर क्षितीश – उशीनर देश के राजा शिबि
सहर्ष – ख़ुशी से
शरीर चर्म – शरीर का कवच

 

व्याख्या -: इस पद्यांश में कवि ने प्राचीन काल के महान और दानवीर महापुरुषों के उदाहरण देकर 'परम त्याग' का संदेश दिया है। कवि बताते हैं कि राजा रंतिदेव ने स्वयं भूखा होने के बावजूद अपने हाथ की भोजन की थाली एक भूखे व्यक्ति को दे दी। महर्षि दधीचि ने मानवता और देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियों का दान (अस्थि-जाल) कर दिया ताकि असुरों का नाश हो सके। इसी प्रकार, राजा उशीनर (शिबि) ने एक कबूतर के प्राण बचाने के लिए अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया और वीर कर्ण ने अपनी रक्षा की परवाह किए बिना अपना कवच और कुंडल (शरीर-चर्म) खुशी-खुशी दान कर दिया। इन उदाहरणों के माध्यम से कवि कहना चाहते हैं कि जब हमारी आत्मा अमर (अनादि) है, तो फिर इस नश्वर (अनित्य) शरीर के नष्ट होने से क्या डरना? सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के भले के लिए अपने शरीर और स्वार्थ का त्याग करने से पीछे न हटे।

मुख्य उदाहरण:

रंतिदेव: भूख की अवस्था में भी भोजन का दान।

दधीचि: लोक कल्याण के लिए हड्डियों का दान।

राजा उशीनर (शिबि): शरणागत की रक्षा के लिए मांस का दान।

कर्ण: दानवीरता का परिचय देते हुए कवच-कुंडल का दान।

राजा रंतिदेव (क्षुधार्त रंतिदेव):

राजा रंतिदेव अपनी अत्यधिक उदारता और दानवीरता के लिए जाने जाते थे। कथा के अनुसार, एक बार राज्य में भारी अकाल पड़ा। राजा ने कई दिनों तक उपवास किया। जब 48 दिनों के बाद उनके सामने भोजन की थाली आई, तो उसी समय उनके द्वार पर एक भूखा ब्राह्मण, फिर एक शूद्र और फिर कुत्तों के साथ एक चांडाल आया। राजा रंतिदेव ने स्वयं भूखा रहते हुए अपने हिस्से का सारा भोजन (करस्थ थाल - हाथ की थाली) उन अतिथियों को दे दिया। उन्होंने संदेश दिया कि भूखे की प्यास बुझाना और सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।

महर्षि दधीचि (परार्थ अस्थि-जाल):

महर्षि दधीचि का उदाहरण सर्वोच्च आत्म-बलिदान का प्रतीक है। जब वृत्रासुर नामक राक्षस ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली, तो इंद्र को बताया गया कि केवल दधीचि की हड्डियों से बने 'वज्र' से ही उस राक्षस का वध संभव है। जब देवता दधीचि के पास गए, तो उन्होंने लोक कल्याण और मानवता की रक्षा के लिए जीवित अवस्था में ही योग विद्या से अपना शरीर त्याग दिया और अपनी हड्डियाँ (अस्थि-जाल) दान कर दीं। इन्हीं हड्डियों से बने वज्र से असुर का नाश हुआ। 

राजा उशीनर/शिबि (स्वमांस दान):

राजा उशीनर (जिन्हें राजा शिबि के नाम से भी जाना जाता है) अपनी शरणागत वत्सलता के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार एक कबूतर बाज के डर से उनकी गोद में आ गिरा। बाज ने अपना शिकार वापस माँगा, लेकिन राजा ने शरणागत कबूतर को देने से मना कर दिया। बदले में बाज को भूखा न रखने के लिए राजा ने अपने शरीर का मांस (स्वमांस) काटकर तराजू में रखना शुरू किया। अंत में जब मांस कम पड़ा, तो वे खुद तराजू पर चढ़ गए। यह उनके दयालु और त्यागी स्वभाव का चरम उदाहरण था।

वीर कर्ण (शरीर-चर्म):

कर्ण को इतिहास का सबसे बड़ा दानवीर माना जाता है। उनके पास जन्मजात कवच और कुंडल थे, जो उनके प्राणों की रक्षा करते थे। जब देवराज इंद्र ब्राह्मण का भेष धरकर उनसे दान माँगने आए, तो कर्ण यह जानते हुए भी कि कवच-कुंडल देने से उनकी मृत्यु निश्चित है, उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें काटकर (शरीर-चर्म) दान कर दिया। उनकी इस दानवीरता ने उन्हें अमर बना दिया।


इन उदाहरणों का उद्देश्य: कवि इन उदाहरणों के माध्यम से हमें यह समझाना चाहते हैं कि मनुष्य का शरीर नश्वर है, जबकि उसके द्वारा किए गए परोपकारी कार्य अमर रहते हैं। इसलिए हमें स्वार्थ छोड़कर दूसरों की सहायता करनी चाहिए।

4.

सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धभाव बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा ?
अहा ! वही उदार है परोपकार जो करे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

 

शब्दार्थ

सहानुभूति – दया,करुणा
महाविभूति – सब से बड़ी सम्पति
वशीकृता – वश में करने वाला
मही – ईश्वर
विरुद्धवाद – खिलाफ होना

 

व्याख्या -: इस पद्यांश में कवि सहानुभूति (दूसरों के दुःख को समझने की भावना) को मनुष्य का सबसे बड़ा गुण बताते हैं। कवि कहते हैं कि मनुष्य के भीतर दूसरों के प्रति करुणा और दया होनी चाहिए, यही मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी या 'महाविभूति' है। जिस व्यक्ति में यह गुण होता है, उसके वश में पूरी पृथ्वी (मही) और स्वयं ईश्वर भी हो जाते हैं। कवि महात्मा बुद्ध का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि बुद्ध ने अपने समय की कुरीतियों और परंपराओं का विरोध किया था, लेकिन उनकी करुणा और दया इतनी महान थी कि उनका सारा विरोध उनके 'दया-प्रवाह' में बह गया। अंततः पूरा संसार (लोक-वर्ग) उनके सामने श्रद्धा से झुक गया। अतः वही व्यक्ति उदार और महान है जो निस्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई (परोपकार) करता है।

मुख्य बिंदु:

महाविभूति: सहानुभूति और दया ही संसार की सबसे बड़ी शक्ति है।

वशीकृता मही: दयालु व्यक्ति के सामने पूरी दुनिया नतमस्तक रहती है।

बुद्ध का उदाहरण: प्रेम और करुणा के माध्यम से बुद्ध ने बड़े से बड़े विरोध को भी शांत कर दिया और लोगों का दिल जीत लिया।


5.

रहो न भूल के कभी मदांघ तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीन बन्धु के बड़े विशाल हाथ हैं।
अतीव भाग्यहीन है अधीर भाव जो करे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

 

शब्दार्थ

मदांघ – घमण्ड
तुच्छ – बेकार
सनाथ – जिसके पास अपनों का साथ हो
अनाथ – जिसका कोई न हो
चित्त – मन में
त्रिलोकनाथ – ईश्वर
दीनबंधु – ईश्वर
अधीर – उतावलापन

 

व्याख्या -: इस पद्यांश में कवि मनुष्य को अहंकार (घमंड) से बचने का संदेश दे रहे हैं। कवि कहते हैं कि मनुष्य को भूलकर भी थोड़े से धन (वित्त) या संपत्ति के मद में अंधा (मदांध) नहीं होना चाहिए। अपने पास सुख-सुविधाएँ और परिवार देखकर स्वयं को 'सनाथ' (स्वामी वाला) मानकर अपने मन (चित्त) में गर्व या अहंकार नहीं करना चाहिए। कवि प्रश्न करते हैं कि इस दुनिया में 'अनाथ' कौन है? यहाँ कोई भी अकेला नहीं है क्योंकि ईश्वर (त्रिलोकनाथ) सबके साथ हैं। उस दयालु और दीन-दुखियों के रक्षक ईश्वर के हाथ बहुत विशाल हैं, वे सबको अपनी शरण में लेते हैं और सबकी सहायता करते हैं। कवि के अनुसार, वह व्यक्ति अत्यंत भाग्यहीन और धैर्यहीन है जो मन में व्याकुलता या असुरक्षा का भाव रखता है और दूसरों के प्रति 'अंधेर' (अन्याय या भेदभाव) करता है। सच्चा मनुष्य वही है जो ईश्वर पर विश्वास रखते हुए सभी को समान समझे और दूसरों के हित के लिए अपना जीवन समर्पित करे।

मुख्य बिंदु:

धन का अहंकार: संपत्ति को तुच्छ समझना चाहिए, क्योंकि यह स्थायी नहीं है। 

सनाथ का गर्व: अपनों के होने का घमंड न करें, क्योंकि असली रक्षक ईश्वर है। 

ईश्वर की सर्वव्यापकता: 'त्रिलोकनाथ' सभी की रक्षा के लिए तत्पर हैं। 


भाग्यहीन व्यक्ति: जो व्यक्ति ईश्वर की सत्ता पर विश्वास न कर दूसरों से बुरा व्यवहार करता है, वह सबसे बड़ा अभागा है। 


6.

अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े,
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े।
परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी,
अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
रहो न यां कि एक से न काम और का सरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ

अनंत – जिसका कोई अंत न हो
अंतरिक्ष – आकाश
समक्ष – सामने
परस्परावलंब – एक दूसरे का सहारा
अमर्त्य -अंक — देवता की गोद
अपंक – कलंक रहित

 

व्याख्या -: इस पद्यांश में कवि मनुष्य को परस्पर सहयोग और एकता के साथ प्रगति करने की प्रेरणा दे रहे हैं। कवि कहते हैं कि उस असीमित आकाश (अनंत अंतरिक्ष) में अनगिनत देवता खड़े हैं, जो परोपकारी और दयालु मनुष्यों का स्वागत करने के लिए अपनी बाहें (स्वबाहु) फैलाए हुए हैं। अतः, हमें एक-दूसरे का सहारा (परस्परावलंब) बनकर उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। कवि आह्वान करते हैं कि तुम निष्कलंक (अपंक) और पवित्र बनकर देवताओं की गोद (अमर्त्य-अंक) में स्थान पाओ, अर्थात ऐसे कर्म करो कि मृत्यु के बाद तुम्हें स्वर्ग या श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो। जीवन में कभी भी ऐसे नहीं रहना चाहिए कि हमारे होने से किसी दूसरे का कोई काम सिद्ध न हो या हम किसी के काम न आ सकें। जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम समाज के हर व्यक्ति की सहायता करें। सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दे।

मुख्य बिंदु:

देवताओं का स्वागत: अच्छे कर्म करने वालों का सम्मान स्वयं ईश्वर और देवता करते हैं।

परस्परावलंब: जीवन की उन्नति के लिए एक-दूसरे का सहयोग अनिवार्य है।

अपंक होना: ईर्ष्या, द्वेष और स्वार्थ से मुक्त होकर पवित्र जीवन जीना।



7.

मनुष्य मात्रा बन्धु हैं’ यही बड़ा विवेक है,
पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद हैं,

 

परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बन्धु ही न बन्धु की व्यथा हरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ

बन्धु – भाई बंधु
विवेक – समझ
स्वयंभू – परमात्मा,स्वयं उत्पन्न होने वाला
अंतरैक्य – आत्मा की एकत, अंतःकरण की एकता
प्रमाणभूत – साक्षी
व्यथा – दुःख,कष्ट

व्याख्या -: इस पद्यांश में कवि विश्व-बंधुत्व (Universal Brotherhood) और एकता का संदेश दे रहे हैं। कवि कहते हैं कि सबसे बड़ी बुद्धिमानता (विवेक) इसी बात को समझने में है कि संसार के सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई (बंधु) हैं। हमारे पुराणों में भी स्पष्ट है कि हम सबका पिता एक ही है—वह ईश्वर (पुराणपुरुष स्वयंभू)। यह सच है कि मनुष्य के अलग-अलग कर्मों के कारण उनके बाहरी रूप और स्थितियाँ अलग-अलग दिखती हैं (बाह्य भेद), लेकिन हमारी आत्मा एक ही है। वेदों में भी इस बात के प्रमाण (अंतैक्य) मिलते हैं कि भीतर से हम सब एक हैं। कवि कहते हैं कि यह बहुत बड़ा 'अनर्थ' या पाप है कि एक भाई दूसरे भाई के कष्टों (व्यथा) को दूर न करे। जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम आपसी भेदभाव भुलाकर एक-दूसरे की मदद करें।

मुख्य बिंदु:

सबसे बड़ा विवेक: सभी मनुष्यों को अपना भाई समझना ही सच्ची समझदारी है।

पुराणपुरुष स्वयंभू: हम सब एक ही परमात्मा की संतान हैं, इसलिए हम सब समान हैं।

अंतैक्य: बाहरी भिन्नता के बावजूद सबके भीतर एक ही ईश्वरीय अंश विद्यमान है।

भ्रातृत्व का धर्म: एक भाई का कर्तव्य है कि वह दूसरे भाई का दुख दूर करे।



8.

चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए, 

विपत्ति,विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

 

अभीष्ट – इच्छित
मार्ग – रास्ता
सहर्ष -अपनी खुशी से
विपत्ति,विघ्न – संकट ,बाधाएँ
अतर्क – तर्क से परे
सतर्क – सावधान यात्री

 

व्याख्या -: कविता के इस अंतिम अंश में कवि मनुष्य को एकजुट होकर लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा दे रहे हैं। कवि कहते हैं कि तुमने अपने जीवन का जो भी इच्छित मार्ग (अभीष्ट मार्ग) चुना है, उस पर खुशी-खुशी (सहर्ष) आगे बढ़ो। रास्ते में जो भी मुश्किलें, संकट या बाधाएँ (विपत्ति-विघ्न) आएँ, उन्हें साहस के साथ दूर करते हुए आगे बढ़ते रहो। कवि विशेष रूप से इस बात पर जोर देते हैं कि इस यात्रा में हमारा आपसी तालमेल (हेलमेल) कम नहीं होना चाहिए और आपस में कभी भी भेदभाव (भिन्नता) नहीं बढ़ना चाहिए। हमें बिना किसी तर्क-वितर्क (अतर्क) के, एक-दूसरे का साथ देते हुए सावधानीपूर्वक (सतर्क) एक ही मार्ग पर चलना चाहिए। कवि के अनुसार, सफलता का 'समर्थ भाव' (असली सार्थकता) तभी है जब मनुष्य केवल अपनी उन्नति न करे, बल्कि दूसरों की भी उन्नति करे और उन्हें साथ लेकर चले ("तारता हुआ तरे")।

मुख्य बिंदु:

हर्ष और साहस: जीवन के संघर्षों का सामना खुशी-खुशी करना चाहिए।

एकता की रक्षा: प्रगति की दौड़ में आपसी प्रेम और भाईचारा कम नहीं होना चाहिए।

परोपकारी सफलता: वही व्यक्ति समर्थ है जो स्वयं सफल होने के साथ-साथ दूसरों को भी सफल बनाए।

निष्कर्ष: पूरी कविता का निचोड़ यही है कि मानवता ही सर्वोपरि धर्म है।



मनुष्यता प्रश्न अभ्यास (महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर)

क)निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिये –

प्रश्न 1 -: कवि ने कैसी मृत्यु को समृत्यु कहा है?

उत्तर-: कवि ने मनुष्यता को धारण करने वाले उस व्यक्ति की मृत्यु को समृत्यु कहा है जिसका जीना मरना परोपकार के लिए होता है,जो अपना हित-चिंतन से पहले दूसरो के हित चिंतन के बारे मे सोचता है तथा जिसे मरने के बाद भी याद किया जाता है।


प्रश्न 2 -: उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है?

उत्तर -: उदार व्यक्ति की पहचान उसके सत्कार्यो,उसकी परोपकारिता तथा  दूसरो के लिए अपना सर्वस्व त्यागने की प्रवृत्ति  देखकर की जा सकती है अर्थात् उदार व्यक्ति के मन,वचन व कर्म से सम्बन्धित कार्य मानव मात्र की भलाई के लिए ही होते है वह अपने से पहले दूसरों की चिंता करता है और लोक कल्याण के लिए अपना जीवन त्याग देता है।


प्रश्न 3 -: कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तिओं के उदाहरण दे कर ‘मनुष्यता ‘ के लिए क्या उदाहरण दिया है?

उत्तर -: कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तिओं के उदाहरण दे कर ‘मनुष्यता ‘ के लिए यह सन्देश दिया है कि परोपकार करने वाला ही असली मनुष्य कहलाने योग्य होता है इसलिए प्रत्येक मनुष्य को परोपकार करते हुए अपना सर्वस्व त्यागने से कभी पीछे नही हटना चाहिए। मानवता की रक्षा के लिए दधीचि ने अपने शरीर की सारी अस्थियां दान कर दी थी,कर्ण ने अपनी जान की परवाह किए बिना अपना कवच व कुंडल  दान मे दे दिया था जिस कारण उन्हें आज तक याद किया जाता है। कवि  इन उदाहरणों के द्वारा यही समझाना चाहते है कि परोपकार का भाव ही सच्ची मनुष्यता है।


प्रश्न 4 -: कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व – रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए?

उत्तर -: कवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में गर्व रहित जीवन व्यतीत करने की बात कही है-:
रहो न भूल के कभी मगांघ तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अर्थात सम्पति के घमंड में कभी नहीं रहना चाहिए और न ही इस बात पर गर्व करना चाहिए कि आपके पास आपके अपनों का साथ है क्योंकि इस दुनिया में कोई भी अनाथ नहीं है, सब उन परम पिता परमेश्वर की संतान हैं।


प्रश्न 5 -: ‘ मनुष्य मात्र बन्धु है ‘ से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर -: ‘ मनुष्य मात्र बन्धु है ‘ अर्थात हम सब मनुष्य एक ही परमपिता परमेश्वर की संतान हैं अतः हम सब भाई-भाई हैं। धर्म व कर्म के आधार पर बाह्य भेद है अन्यथा आंतरिक रूप से सब मनुष्य एक ही है ।भाई -बन्धु होने के नाते हमें भाईचारे के साथ रहना चाहिए और एक दूसरे का बुरे समय में साथ देना चाहिए।


प्रश्न 6 -: कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है ?

उत्तर -: कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा इसलिए दी है ताकि आपसी समझ न बिगड़े और न ही भेदभाव बढ़े । सब एक साथ एक होकर चलेंगे तो सारी बाधाएं मिट जाएगी और सबका कल्याण और समृद्धि होगी।


प्रश्न 7 -: व्यक्ति को किस तरह का जीवन व्यतीत करना चाहिए ?इस कविता के आधार पर लिखिए।

उत्तर -: मनुष्य को परोपकार का जीवन जीना चाहिए ,अपने से पहले दूसरों के दुखों की चिंता करनी चाहिए। केवल अपने बारे में तो जानवर भी सोचते हैं, कवि के अनुसार मनुष्य वही कहलाता है जो अपने से पहले दूसरों की चिंता करे।


प्रश्न 8 -: ‘ मनुष्यता ‘ कविता के द्वारा कवि क्या सन्देश देना चाहता है ?

उत्तर -: ‘मनुष्यता ‘ कविता के माध्यम से कवि यह सन्देश देना चाहते है कि संसार मे मनुष्य को स्वार्थ रहित होकर 
दीन-हीन,निर्बल और जरुरतबंद लोगो की सेवा करते हुए ऐसे सत्कर्म करने चाहिए जिससे मरने के बाद भी लोग 
उसे याद करे।अत: मनुष्य को स्वार्थ व भेदभाव से मुक्त होकर मानवता ,एकता,सहानुभूति,दया, करुणा,उदारता
तथा बंधुत्व आदि गुणों को अपनाते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए।

 


 

 

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