दुःख का अधिकार || Dukh Ka Adhikar || कक्षा 9 || स्पर्श || गद्य || सार, प्रश्न उत्तर || Class 9 || Knowing Hindi
दुःख का अधिकार
- मानवीय दुःख: कहानी दिखाती है कि दुःख एक सार्वभौमिक भावना है जो सभी मनुष्यों द्वारा अनुभव की जाती है, भले ही उनकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।
- सामाजिक असमानता: कहानी समाज में मौजूद असमानताओं को दर्शाती है और कैसे ये असमानताएं लोगों के दुःख व्यक्त करने के तरीके को प्रभावित कर सकती हैं।
- सहानुभूति की आवश्यकता: कहानी दूसरों के प्रति सहानुभूति और समझ रखने के महत्व पर जोर देती है, खासकर उन लोगों के प्रति जो कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
- विवशता और मजबूरी: कहानी उन विवशताओं और मजबूरियों को दर्शाती है जो गरीब लोगों को अपने दुःख को व्यक्त करने से रोक सकती हैं।
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए-
प्रश्न 1.
किसी व्यक्ति की पोशाक को देखकर
हमें क्या पता चलता है?
उत्तर-
किसी व्यक्ति की पोशाक देखकर
हमें उसका दर्जा तथा उसके अधिकारों का पता चलता है।
प्रश्न 2.
खरबूज़े बेचनेवाली स्त्री से
कोई खरबूजे क्यों नहीं खरीद रहा था?
उत्तर-
खरबूजे बेचने वाली स्त्री अपने
पुत्र की मृत्यु का एक दिन बीते बिना खरबूजे बेचने आई थी। सूतक वाले घर के खरबूजे
खाने से लोगों को अपना धर्म भ्रष्ट होने का भय सता रहा था तथा वह घुटनों पर सिर रखकर
फफक-फफक कर रो रही थी इसलिए
उससे कोई खरबूजे नहीं खरीद रहा था।
प्रश्न 3.
उस स्त्री को देखकर लेखक को
कैसा लगा?
उत्तर-
उस स्त्री को फुटपाथ पर रोता
देखकर लेखक के मन में व्यथा उठी। वह उसके दुःख को जानने के लिए बेचैन हो उठा।
प्रश्न 4.
उस स्त्री के लड़के की मृत्यु
का कारण क्या था?
उत्तर-
उस स्त्री के लड़के की मृत्यु
का कारण था-साँप द्वारा डॅस लिया जाना।जब वह मुंह-अँधेरे खेत में खरबूजे तोड़ रहा
था। उस समय खेत की मेड़ की तरावट में विश्राम करते समय उसका पैर एक साँप पर पड़ गया था।
प्रश्न 5.
बुढ़िया को कोई भी क्यों उधार
नहीं देता?
उत्तर-
स्त्री का कमाऊ बेटा मर चुका
था। अतः पैसे वापस न मिलने की आशंका के कारण कोई उसे उधार नहीं देता।
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-
प्रश्न 1. मनुष्य के जीवन में पोशाक का
क्या महत्त्व है?
उत्तर-मनुष्य के जीवन में पोशाक का बहुत महत्व है क्योंकि जब हम अपने से निम्न श्रेणी के या गरीब व्यक्ति के दुख को साझा करना चाहते हैं ।यह समाज में उनका स्तर और अधिकार निश्चित करती है।पोशाक ही यह तय करती है कि व्यक्ति को समाज में कितना सम्मान मिलेगा। यह समाज के लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में बाँट देती है और कभी-कभी ऊँची पोशाक हमें नीचे झुककर साधारण या गरीब लोगों के दुख में शामिल होने से रोकने वाली अड़चन बन जाती है।
प्रश्न 2. पोशाक हमारे लिए कब बंधन और अड़चन बन जाती है?
उत्तर- लेखक के अनुसार, पोशाक हमारे लिए तब बंधन और अड़चन बन जाती हैजब हम अपने से निम्न श्रेणी के या गरीब व्यक्ति के दुख को साझा करना चाहते हैं। समाज में अपनी प्रतिष्ठा और ऊँची पोशाक के कारण हम चाहकर भी फुटपाथ पर बैठकर उनके दुख को नहीं सुन पाते। हमारी पोशाक हमें नीचे झुकने से रोक देती है, जिससे हम मानवता की स्वाभाविक अनुभूति प्रकट नहीं कर पाते।
प्रश्न 3. लेखक उस स्त्री के रोने का कारण
क्यों नहीं जान पाया?
उत्तर- रोती हुई स्त्री को
देखकर लेखक के मन में व्यथा उठी पर अपनी
अच्छी और उच्चकोटि की पोशाक के कारण वह फुटपाथ पर बैठी उस स्त्री के दुःख का कारण
नहीं जान पाया |
प्रश्न 4. भगवाना अपने परिवार का निर्वाह कैसे करता था?
उत्तर- भगवाना अपने परिवार का निर्वाहअपनी डेढ़ बीघा जमीन पर खेती करके करता था। वह खेत में खरबूजे और सब्जियां उगाता था। उन खरबूजों को वह खुद बाजार में जाकर बेचता था जिससे होने वाली आय से उसके परिवार (बूढी मां, पत्नी और बच्चों) का गुजारा चलता था।
उत्तर - बेटे की मृत्यु के अगले ही दिन बुढ़िया की खरबूजे बेचने निकलने के पीछेउसकी भयानक गरीबी और पारिवारिक विवशता थी। लड़के का उपचार तथा अंतिम संस्कार करने मे सब खर्च हो गया था | घर मे पोता पोती भूख से परेशान थे ,बहू बुखार से तप रही थी तथा उसके घर में अनाज का एक दाना भी न बचा था |
प्रश्न 6.
बुढ़िया के दुख को देखकर लेखक को अपने पड़ोस की संभ्रांत महिला की याद
क्यों आई?
उत्तर- बुढ़िया के दुख को देखकर लेखक को अपने पड़ोस की संभ्रांत (अमीर) महिला की याद इसलिए आई क्योंकि दोनो ने अपने जवान बेटो को खोया था। लेखक ने देखा कि अमीर महिला के पास दुख मनाने के लिए धन, समय और समाज की सहानुभूति थी, जबकि गरीब बुढ़िया को अपनी गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारी के कारण शोक मनाने का अधिकार भी नहीं मिल पा रहा था। लेखक इसी विरोधाभास को स्पष्ट करना चाहते थे।
ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए-
प्रश्न 1.
बाज़ार के लोग खरबूजे बेचनेवाली स्त्री के बारे में क्या-क्या कह रहे थे? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-बाज़ार के लोग खरबूजे बेचने वाली स्त्री के प्रति अत्यंत संवेदनहीन और क्रूर थे। वे उसकी विवशता को समझे बिना उस पर निम्नलिखित कटाक्ष कर रहे थे:
- धर्म और ईमानदारी पर सवाल: कुछ लोग कह रहे थे कि इन लोगों का कोई धर्म-ईमान नहीं होता, इनके लिए रोटी का टुकड़ा ही सब कुछ है।
- सूतक का उल्लंघन: एक दुकानदार का कहना था कि बेटे की मृत्यु के कारण इसके घर में 'सूतक' (अशुद्धि) है और यह बाज़ार में सामान बेचकर दूसरों का धर्म भ्रष्ट कर रही है।
- पत्थर दिल कहना: लोग उसे 'बेहया' और 'पत्थर दिल' कह रहे थे क्योंकि वह बेटे की मौत के अगले ही दिन बाज़ार में खरबूजे बेचने बैठ गई थी।
- घृणा का भाव: राहगीर उसे नफरत की नज़रों से देख रहे थे और उसके चरित्र पर उंगली उठा रहे थे।प्रश्न 2. पास पड़ोस की दुकानों से पूछने पर लेखक को क्या पता चला?
उत्तर-
पास पड़ोस की दुकानों से पूछने पर लेखक को पता चला कि बुढ़िया का एकमात्र
कमाऊ जवान पुत्र था - भगवाना। वह तेईस साल का था। वह शहर के पास डेढ़
बीघे जमीन पर सब्जियाँ उगाकर बेचा करता था। एक दिन पहले सुबह -सवेरे वह पके हुए खरबूजे तोड़ रहा था कि उसका पैर
एक साँप पर पड़ गया। साँप ने उसे डस लिया, जिससे उसकी मौत हो गई। घर का सारा समान बेटे को
बचाने तथा उसके मरने के बाद अंतिम संस्कार करने मे खर्च हो गया ।घर मे पोता पोती
भूख से परेशान थे ,बहू बुखार से तप रही थी तथा उसके घर में अनाज का एक दाना भी न
बचा था अतः आर्थिक विवशता के कारण अगले ही दिन वह खरबूजे बेचने के लिए बाज़ार में आई
थी ।
प्रश्न 3.
लड़के को बचाने के लिए बुढ़िया माँ ने क्या-क्या उपाय किए?
उत्तर-
लड़के को बचाने के लिए बुढ़िया ने वह सब उपाय किए जो उसके द्वारा किए जा सकते थे । साँप का विष उतारने के लिए ओझा से झाड फूँक करवाया, नागदेवता की पूजा कराई ,घर का आटा और अनाज भी दान-दक्षिणा में दे दिया तथा अपने बेटे के पैर पकड़कर विलाप भी किया |
लेखक ने बुढ़िया के दुख का अंदाज़ा कैसे लगाया?
प्रश्न 5.
इस पाठ का शीर्षक ‘दुख का अधिकार’ कहाँ तक सार्थक है?
स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-दुख का अधिकार कहानी का शीर्षक पूर्णतः सार्थक है क्योंकि यह समाज की संवेदनहीनता पर प्रहार करता है। कहानी स्पष्ट करती है कि दुःख मनाने के लिए भी धन और समय जैसी सुविधाओं की आवश्यकता होती है। गरीब महिला के पास शोक मनाने का अधिकार नहीं है, क्योंकि उसकी गरीबी उसे विलाप करने के बजाय जीवन-निर्वाह के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर देती है।
दीर्घ उत्तर-
दुख का अधिकार कहानी का शीर्षक
यह अभिव्यक्त करता है कि दु:ख प्रकट करने का अधिकार भी व्यक्ति की स्थिति के अनुसार होता है। यद्यपि दु:ख का अधिकार सभी को है तथा सुख-दुःख
की अनुभूति सभी को होती है किंतु यह हमारे समाज की विडंबना है कि दुःख के अधिकार
को भी वह संपन्न तथा संभ्रांत लोगों तक सीमित कर देती है|समाज के निर्धन वर्ग से वह जैसे दुःख का अधिकार भी छीन लेती है,लोग न केवल उनसे घृणा करते हैं अपितु तरह- तरह की बातें बनाकर उन पर
कटाक्ष भी करते हैं, मानो
गरीब को दुख मनाने का कोई अधिकार ही न हो,किंतु
वही समान दुःख संभ्रांत वर्ग के लिए ज्यादा भारी हो जाता है। उन्हें दु ख व्यक्त
करने का अधिकार व समय तो मिलता ही है ,साथ ही
साथ उनके दुख को देखकर आसपास के लोग भी केवल दुखी ही नहीं होते हैं, बल्कि उनके प्रति सहानुभूति भी व्यक्त करते हैं।
इस प्रकार यह शीर्षक पूर्णतया सार्थक है।
उत्तर: लेखक का मानना है कि जिस प्रकार कटी हुई पतंग एकदम से नीचे नहीं गिरती, बल्कि धीरे-धीरे डोलती हुई गिरती है, उसी प्रकार समाज की पोशाकें और मर्यादाएँ मनुष्य को एकदम से नीचे गिरने या झुकने नहीं देतीं। वे हमें समाज की निचली श्रेणियों के दुख समझने में बाधा डालती हैं।
उत्तर: भगवाना की मृत्यु के बाद घर की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी। घर का सारा अनाज और जेवर झाड़-फूँक व अंतिम संस्कार में खत्म हो चुके थे। छोटे बच्चे भूख से तड़प रहे थे और भगवाना की पत्नी तेज़ बुखार में तप रही थी। घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा था।
उत्तर: परचून की दुकान वाले के तर्क से समाज की रूढ़िवादी और संवेदनहीन सोच का पता चलता है। वह महिला के दुख को समझने के बजाय इस बात पर ज़ोर दे रहा था कि 'सूतक' (अशुद्धि) के समय सामान बेचकर वह दूसरों का धर्म भ्रष्ट कर रही है। यह दिखाता है कि समाज कर्मकांडों को मानवीय संवेदनाओं से ऊपर रखता है।
उत्तर: पाठ के अनुसार, दुख मनाने के लिए 'सहूलियत' (सुविधा) और 'समय' की आवश्यकता होती है। अमीर वर्ग के पास धन है, जिससे वे काम छोड़कर महीनों शोक मना सकते हैं। उनके पास सहानुभूति दिखाने वाले लोग और इलाज के लिए डॉक्टर होते हैं। इसके विपरीत, गरीब को अगले वक्त की रोटी की चिंता सताती है। यदि वह काम न करे, तो परिवार भूखा मर जाएगा। समाज भी गरीब के दुख का उपहास उड़ाता है, जबकि अमीर के दुख को सम्मान की दृष्टि से देखता है।
उत्तर: लेखक ने मुख्य रूप से तीन बुराइयों पर प्रहार किया है:
- वर्ग-भेद: समाज मनुष्य को उसकी पोशाक और धन के आधार पर सम्मान देता है।
- संवेदनहीनता: लोग किसी गरीब की मजबूरी समझे बिना उस पर कटाक्ष करते हैं।
- अंधविश्वास: सांप के काटने पर डॉक्टर के बजाय ओझा को बुलाना और दान-पुण्य में घर की जमा-पूँजी लुटा देना समाज की अज्ञानता को दर्शाता है।
उत्तर: इसका आशय यह है कि समाज में दुःख व्यक्त करना भी एक विलासिता (Luxury) बन गया है। निर्धन व्यक्ति के जीवन में संघर्ष इतना अधिक है कि वह अपने प्रियजन की मृत्यु पर शांति से दो आँसू भी नहीं बहा सकता। उसकी गरीबी और समाज की निष्ठुरता उससे शोक मनाने का समय और अधिकार दोनों छीन लेती है।


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Great mam...ur content is superb
ReplyDeleteMam Boht Acche Q/Ans Hai Ma'am Maze Agye Par Ma'am Ye Exam Mein Mat Dedena 😊
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